सनातन धर्म में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का बहुत बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। शास्त्रों में इस पवित्र तिथि को व्यास पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन निष्ठापूर्वक उपवास रखकर देव पूजन करते हैं, उनके जीवन की समस्त अड़चनें और बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। इस खास अवसर पर देश भर में भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है, जबकि कई क्षेत्रों में भगवान विष्णु एवं धन की देवी माता लक्ष्मी की आराधना करने की परंपरा है। इसके साथ ही, आषाढ़ पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रदेव की उपासना का अत्यंत विशेष फल प्राप्त होता है, और इस दिन घर में भगवान सत्यनारायण की कथा आयोजित करवाना भी बेहद शुभ माना गया है।
29 जुलाई 2026 को रखा जाएगा आषाढ़ पूर्णिमा का व्रत
वर्ष 2026 में आषाढ़ मास के व्रत वाली पूर्णिमा की सही तारीख को लेकर यदि संशय है, तो स्पष्ट कर दें कि यह उपवास 29 जुलाई 2026 को ही रखा जाएगा। पंचांग की गणना के अनुसार, इस दिन पूर्णिमा तिथि रात्रि 8 बजकर 5 मिनट तक प्रभावी रहेगी। पूर्णिमा व्रत में चंद्र दर्शन और अर्घ्य का विशेष विधान होता है। इस दिन उपवास रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए संध्या काल में चंद्रोदय का समय शाम 07:21 बजे रहेगा। शाम को चंद्र दर्शन के बाद ही व्रती अपने नियम अनुसार पूजन संपन्न करते हैं।
आषाढ़ पूर्णिमा के दिन पूजा के सभी शुभ मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि पर शुभ चौघड़िया और मुहूर्त में पूजा-अर्चना करने से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। 29 जुलाई को दिन भर के प्रमुख शुभ समय निम्नलिखित हैं
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:17 बजे से प्रातः 04:59 बजे तक
- प्रातः सन्ध्या: प्रातः 04:38 बजे से प्रातः 05:41 बजे तक
- अमृत काल: प्रातः 08:34 बजे से प्रातः 10:20 बजे तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 02:43 बजे से दोपहर 03:37 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:14 बजे से शाम 07:35 बजे तक
- सायाह्न सन्ध्या: शाम 07:14 बजे से रात्रि 08:17 बजे तक
पूर्णिमा व्रत की संपूर्ण पूजा विधि और नियम
पूर्णिमा व्रत के दिन स्नान और ध्यान का विशेष नियम होता है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त या प्रातः काल में उठकर किसी पवित्र नदी, तीर्थ स्थल या सरोवर में स्नान करके तर्पण करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। यदि आपके लिए किसी पवित्र नदी में जाना संभव न हो, तो घर पर ही सामान्य जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करके हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प लेते समय इस प्रकार कहें, "मैं अपने संपूर्ण परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और कुशलता की कामना के साथ आषाढ़ पूर्णिमा का व्रत रखने का संकल्प लेता/लेती हूं। इस व्रत के निर्विघ्न संपन्न होने के लिए मैं प्रथम पूज्य भगवान गणपति और कलश देव का पूजन करूंगा/करूंगी।"
व्रत का संकल्प पूर्ण करने के बाद सबसे पहले शुभ दिशा में कलश की स्थापना करें। इसके बाद विघ्नहर्ता भगवान गणेश की विधिवत पूजा करें। गणेश पूजन के पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती की षोडशोपचार विधि से धूप, दीप, गंध, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करते हुए पूजा-अर्चना करें। जो श्रद्धालु भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के भक्त हैं, वे इस दिन श्रीहरि और लक्ष्मी जी की विधि-विधान से उपासना करें। दिन भर उपवास का पालन करते हुए संध्या काल में भक्ति भाव से आषाढ़ पूर्णिमा व्रत की कथा का पाठ करें अथवा श्रवण करें। तत्पश्चात रात्रि में चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजन संपन्न करें।
पूर्णिमा उपवास के दौरान खान-पान के नियम
पूर्णिमा के पावन व्रत में खान-पान की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस उपवास में केवल सात्विक पदार्थों का ही सेवन किया जाना चाहिए। व्रती पूरे दिन जल, ताजे फल और दूध से बनी सात्विक चीजों जैसे खीर और पनीर आदि का सेवन कर सकते हैं। वहीं कई श्रद्धालु अत्यधिक कठोर साधना का पालन करते हुए पूरे दिन केवल जल ग्रहण करके ही निराहार व्रत रखते हैं।
व्रत पारण का सही तरीका और दान का महत्व
पूर्णिमा व्रत का पारण करने का सबसे प्रचलित नियम यह है कि रात्रि में चंद्रदेव को विधिपूर्वक अर्घ्य अर्पित करने के बाद ही व्रत खोला जाता है। पारण करने से पूर्व दान का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। श्रद्धालुओं को अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार किसी योग्य ब्राह्मण को अन्न, तिल, चावल, वस्त्र और शुद्ध देशी घी आदि वस्तुओं का दान करना चाहिए। दान-दक्षिणा देने के पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करके व्रत का पारण करना शुभ फलदायक होता है।



















