सनातन परंपरा में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 22 अक्टूबर को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन उपवास रखने और जगत के पालनहार भगवान विष्णु की आराधना करने से साधक को अश्वमेध और सूर्य यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। महाभारत काल में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का माहात्म्य बतलाया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि यह एकादशी जीवन भर के पाप कर्मों का निरोध करने के साथ-साथ जीवात्मा को परम गति और मोक्ष प्रदान करती है।
विंध्य पर्वत के बहेलिए की पौराणिक कथा
धार्मिक ग्रंथों में पापांकुशा एकादशी से जुड़ी एक अत्यंत प्रेरक कथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक अत्यंत क्रूर बहेलिया निवास करता था। उसने अपने संपूर्ण जीवन में केवल हिंसा, लूटपाट, मदिरापान और अन्य अधर्म के कार्य किए थे। वन्य जीवों का वध करना और राहगीरों को लूटना ही उसका दैनिक नियम बन चुका था। जीवन पर्यंत उसने कभी किसी सत्कर्म या भक्ति का सहारा नहीं लिया था।
जब क्रोधन का अंतिम समय सन्निकट आया, तब यमराज के दूत उसके समक्ष प्रकट हुए। यमदूतों ने उसे चेतावनी दी कि कल उसके जीवन का अंतिम दिन है और वे अगले दिन उसकी आत्मा को लेने आएंगे। मृत्यु और नरक के दंड की बात सुनते ही वह बहेलिया भय से कांप उठा। अपने किए गए दुष्कर्मों का स्मरण कर उसे गहरा पश्चाताप हुआ और वह जीवन रक्षा की आस लेकर सीधे महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचा।
महर्षि अंगिरा का मार्गदर्शन और पापमुक्ति
महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचकर क्रोधन उनके चरणों में गिर पड़ा। उसने दीन भाव से निवेदन किया कि उसने जीवन भर केवल पाप कर्म ही किए हैं, इसलिए उसे कोई ऐसा अचूक उपाय बताया जाए जिससे उसके पापों का विनाश हो सके और उसे सद्गति मिल सके। बहेलिए की व्याकुलता और सच्चे पश्चाताप को देखकर महर्षि अंगिरा का हृदय द्रवित हो गया।
महर्षि अंगिरा ने उसे आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पापांकुशा एकादशी का संपूर्ण नियमों के साथ उपवास करने का परामर्श दिया। बहेलिए ने महर्षि के आदेश का पूर्ण निष्ठा से पालन किया। उसने एकादशी के दिन अन्न जल का संयम रखा, भगवान नारायण का स्मरण किया और शास्त्रोक्त विधि से पूजन संपन्न किया। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से उसके समस्त संचित पाप भस्म हो गए और मृत्यु के उपरांत उसे सीधे विष्णु लोक की प्राप्ति हुई।
पापांकुशा एकादशी 2026 के लिए शुभ मुहूर्त
इस वर्ष पापांकुशा एकादशी पर पूजा अर्चना के लिए विभिन्न शुभ समय निर्धारित हैं। साधक इन विशिष्ट मुहूर्तों में प्रभु की आराधना और संकल्प कर सकते हैं
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:45 बजे से प्रातः 05:35 बजे तक
- प्रातः सन्ध्या: प्रातः 05:10 बजे से प्रातः 06:26 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:43 बजे से दोपहर 12:28 बजे तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 01:58 बजे से दोपहर 02:44 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 05:45 बजे से शाम 06:10 बजे तक
- सायाह्न सन्ध्या: शाम 05:45 बजे से शाम 07:01 बजे तक
- अमृत काल: दोपहर 01:18 बजे से दोपहर 02:58 बजे तक
- निशिता मुहूर्त: रात्रि 11:40 बजे से 23 अक्टूबर की मध्यरात्रि 12:31 बजे तक
व्रत के धार्मिक लाभ और महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पापांकुशा एकादशी का विधिपूर्वक पालन करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस पावन अवसर पर प्रभु के स्वरूप का ध्यान करने से सांसारिक क्लेश मिटते हैं और व्यक्ति को मरणोपरांत स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त होता है। यह व्रत साधक के मन पर अंकुश लगाकर उसे सत्कर्म के मार्ग पर अग्रसर करता है।



















