सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना के लिए संपूर्ण वर्ष में सबसे पावन माना जाता है। इस पवित्र मास में देश भर के शिवभक्त अपार श्रद्धा और भक्ति भाव से भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद और बेलपत्र अर्पित कर रुद्राभिषेक तथा जलाभिषेक करने का विशेष विधान है। सामान्यतः लोग सावन के सोमवार व्रत के बारे में विस्तार से जानते हैं, लेकिन इस माह में कई अन्य महत्वपूर्ण व्रत और पर्व भी आते हैं। इनमें सोलह सोमवार व्रत, मंगला गौरी व्रत, प्रदोष व्रत, सावन शिवरात्रि और नाग पंचमी शामिल हैं। इन धार्मिक अनुष्ठानों को विधि-विधान से पूर्ण करने पर साधक को ग्रहों के दुष्प्रभाव से राहत मिलती है और जीवन की समस्त कठिनाइयों का निवारण होता है।
सावन सोमवार व्रत की महिमा और तिथियां
सावन महीने में पड़ने वाले हर सोमवार को भगवान भोलेनाथ की विशेष आराधना की जाती है। इस बार के सावन में कुल चार सोमवार व्रत रखे जाएंगे। तिथियों की बात करें तो पहला सोमवार व्रत 3 अगस्त को पड़ेगा, जबकि दूसरा सोमवार व्रत 10 अगस्त को रखा जाएगा। इसके बाद तीसरा सोमवार व्रत 17 अगस्त को और चौथा अंतिम सोमवार व्रत 24 अगस्त को आएगा। मान्यता के अनुसार, सोमवार के दिन उपवास रखकर शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद और बेलपत्र अर्पित करने से भगवान शिव अति शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह पावन व्रत परिवार में सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और मनचाही मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए रखा जाता है। इसके अतिरिक्त, अविवाहित युवक और युवतियां सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त करने की अभिलाषा से भी यह उपवास पूर्ण निष्ठा के साथ रखते हैं।
सोलह सोमवार व्रत का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म ग्रंथ शिव पुराण के अनुसार, सोलह सोमवार व्रत को मनोकामना पूर्ति के लिए बेहद प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। जो भक्त लगातार सोलह सोमवार तक पूर्ण नियमों का पालन करते हुए व्रत रखते हैं, उन पर भगवान शिव की विशेष कृपा बरसती है। इस व्रत में शिवलिंग पर जल और दूध के साथ बेलपत्र, धतूरा और भांग चढ़ाने की परंपरा है। यह अनुष्ठान मुख्य रूप से वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने, सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति करने, संतान सुख पाने, बेहतर स्वास्थ्य और आर्थिक तरक्की के लिए किया जाता है। माना जाता है कि निष्ठापूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और साधक को आत्मिक शांति तथा आध्यात्मिक प्रगति हासिल होती है।
मंगला गौरी व्रत से मिलता है अखंड सौभाग्य
जिस प्रकार सावन के सोमवार का दिन भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित होता है, उसी प्रकार सावन का प्रत्येक मंगलवार माता पार्वती की आराधना के लिए निर्धारित है। मंगलवार को रखे जाने वाले इस व्रत को मंगला गौरी व्रत कहा जाता है। इस बार सावन में चार मंगला गौरी व्रत पड़ेंगे। पहला मंगला गौरी व्रत 4 अगस्त को, दूसरा व्रत 11 अगस्त को, तीसरा व्रत 18 अगस्त को और चौथा व्रत 25 अगस्त को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, दांपत्य जीवन में मिठास और परिवार की सुख-शांति के लिए यह व्रत रखती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं मनचाहा वर पाने की कामना के साथ माता गौरी की विधि-विधान से पूजा करती हैं।
सावन प्रदोष व्रत का आध्यात्मिक लाभ
प्रत्येक हिंदू माह के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि के संध्या समय को प्रदोष काल कहा जाता है, और इस दौरान रखे जाने वाले व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सावन के महीने में आने वाले प्रदोष व्रत का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस सावन में दो प्रदोष व्रत रखे जाएंगे, जिनकी तिथियां 10 अगस्त और 25 अगस्त हैं। इस दिन संध्या के समय भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के सभी संचित पापों का नाश होता है। शिव पुराण में बताया गया है कि प्रदोष व्रत करने से जीवन में सुख, शांति और ऐश्वर्य का आगमन होता है। यदि कोई श्रद्धालु वर्ष भर प्रदोष व्रत करने में असमर्थ हो, तो उसे सावन मास के प्रदोष व्रत अवश्य रखने चाहिए।
सावन शिवरात्रि की चार पहर की पूजा
सावन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है, जिसे आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत पवित्र माना जाता है। इस बार सावन शिवरात्रि का पावन व्रत 11 अगस्त को रखा जाएगा। इस विशेष अवसर पर श्रद्धालु दिन भर उपवास रखकर रात्रि जागरण करते हैं और महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप करते हैं। सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने तथा रात्रि के चार पहर में विशेष पूजन करने का विधान है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, इस दिन सच्चे हृदय से की गई शिव भक्ति से भोलेनाथ अति प्रसन्न होकर भक्तों की झोली भर देते हैं और उन्हें जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का वरदान देते हैं।
नाग पंचमी पर कालसर्प दोष से मुक्ति
सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। चूंकि नाग देवता भगवान शिव के गले का हार हैं, इसलिए इस तिथि पर नाग देव के साथ-साथ भगवान शिव की पूजा का विशेष विधान है। इस वर्ष नाग पंचमी का पर्व 17 अगस्त को आएगा। मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन विधि-विधान से पूजन और जल अर्पित करने से कुंडली के कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, यह व्रत व्यक्ति को अज्ञात भय और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा प्रदान करता है तथा घर-परिवार में सुख और शांति का वातावरण बनाए रखता है।



















