ब्रजमंडल में राधा रानी का नाम आते ही हर श्रद्धालु का ध्यान बरसाने की ओर चला जाता है और उन्हें बरसाने वाली के नाम से पूजा जाता है। हालांकि पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार राधा रानी का प्राकट्य स्थल केवल बरसाना न होकर एक अत्यंत रहस्यमयी और पवित्र कमल कुंड है। मथुरा और ब्रज क्षेत्र में स्थित इस ऐतिहासिक स्थान पर प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। जीर्णोद्धार के बाद जनता के लिए खोले गए इस कुंड का सीधा संबंध द्वापर युग की उन पावन घटनाओं से है जिन्होंने ब्रज की भक्ति परंपरा को एक नया आयाम दिया।
कमल पुष्प और राजा वृषभानु से जुड़ी लोककथा
लोकोक्तियों और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार श्री राधा रानी का जन्म सामान्य मानव रूप में नहीं हुआ था। प्रचलित पौराणिक कथा बताती है कि यादव शासक राजा वृषभानु जब ब्रज क्षेत्र के एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे, तब उन्होंने जल की सतह पर एक अद्भुत और अलौकिक दृश्य देखा। पानी में तैर रहे एक हजार पंखुड़ियों वाले दिव्य कमल के फूल पर एक अत्यंत सुंदर नवजात बालिका मुस्कुरा रही थी। राजा वृषभानु ने अपार स्नेह और श्रद्धा के साथ उस सुंदर कन्या को जल से उठाकर अपनी गोद में ले लिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि इस सरोवर को कमल कुंड के नाम से जाना जाता है जो आज भी उस पावन घटना का प्रत्यक्ष साक्षी बना हुआ है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण और पंडित गौरांग शर्मा के विचार
धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के हवाले से पंडित गौरांग शर्मा बताते हैं कि ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित अन्य शास्त्र राधा रानी के जन्म के रहस्य की एक अलग व्याख्या करते हैं। इन ग्रंथों के अनुसार माता कीर्तिदा (कीर्ति) ने अपने गर्भ में किसी साधारण शिशु के बजाय केवल वायु को धारण किया हुआ था। इसके बाद योगमाया की प्रेरणा और दिव्य इच्छा से जब वह वायु निष्कासित हुई, ठीक उसी क्षण श्री राधा रानी अपनी स्वेच्छा से एक दिव्य कन्या के रूप में वहां प्रकट हो गईं। माता कीर्ति नियमित रूप से पवित्र यमुना नदी में स्नान करने जाया करती थीं और इस प्रकार उनका नाम राधा रानी की माता के रूप में अमर हो गया।
जीर्णोद्धार के बाद श्रद्धालुओं के लिए खुला कमल कुंड
इस पावन स्थल के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए कमल कुंड का विशेष जीर्णोद्धार कराया गया और इसे आम जनता तथा श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिया गया। आज भी इस पवित्र कुंड में हजारों की संख्या में खिलते हुए कमल के फूल दिखाई देते हैं, जिन्हें देखकर यहां आने वाले भक्तों को सीधे द्वापर युग की पावन अनुभूति होती है। मथुरा और ब्रज की यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्री इस कुंड के तट पर पहुंचकर राधा नाम का जाप करते हैं और भक्ति भाव में लीन होकर अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि ब्रज संस्कृति का एक जीवंत प्रतीक भी है।

















