देश भर में 7 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा का पर्व पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की विधि-विधान से आराधना तो की ही जाती है, साथ ही फैक्ट्रियों, दुकानों, कार्यालयों और अन्य कार्यस्थलों पर उपयोग होने वाली मशीनों, उपकरणों, औजारों और वाहनों का भी पूजन किया जाता है। इस पूरे अनुष्ठान में सबसे खास बात यह होती है कि मशीनों पर रोली, कुमकुम और सिंदूर से स्वस्तिक का चिह्न बनाया जाता है। इसके पीछे कई गहरी धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं, जिनके बारे में जानना हर किसी के लिए बेहद दिलचस्प और फायदेमंद है।
स्वस्तिक चिह्न का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
सनातन परंपरा में स्वस्तिक को बेहद पवित्र और अत्यंत शुभ प्रतीक माना गया है। यह शब्द मुख्य रूप से ‘सु’ और ‘अस्ति’ इन दो शब्दों के मेल से बना है, जिसका सीधा और स्पष्ट अर्थ होता है ‘कल्याण होना’ या ‘शुभ होना’। यही कारण है कि हिंदू संस्कृति में किसी भी नए और मांगलिक कार्य की शुरुआत सबसे पहले स्वस्तिक बनाकर ही की जाती है। जब बात कार्यस्थलों और कारखानों की आती है, तो मशीनों पर यह चिह्न अंकित करने के पीछे कई व्यावहारिक और आध्यात्मिक कारण होते हैं, जो कामगारों की आस्था से सीधे जुड़े हैं।
विघ्नहर्ता गणेश और समृद्धि का प्रतीक
मशीनों पर रोली या सिंदूर से स्वस्तिक बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि इसे भगवान गणेश का स्वरूप माना जाता है। हिंदू धर्म में गणेशजी को तमाम विघ्नों को हरने वाला यानी विघ्नहर्ता कहा गया है और किसी भी पूजा में उनकी स्थिति प्रथम होती है। मशीन पर यह पवित्र चिह्न उकेरने से यह मान्यता मजबूत होती है कि काम के दौरान किसी भी तरह की तकनीकी रुकावट या बाधा नहीं आएगी और उत्पादन का कार्य बिना किसी व्यवधान के लगातार आगे बढ़ता रहेगा। इसके अलावा, स्वस्तिक को धन और वैभव की देवी लक्ष्मी का भी प्रतीक माना जाता है। ऐसी गहरी आस्था है कि जहां यह चिह्न मौजूद रहता है, वहां नकारात्मक ऊर्जा टिक नहीं पाती और सकारात्मकता का संचार बना रहता है। इससे व्यापार में लगातार बढ़ोतरी होती है और आर्थिक संपन्नता के रास्ते खुलते हैं।
कामगारों की सुरक्षा और उपकरणों की लंबी उम्र
इस परंपरा का एक और सबसे अहम पहलू सुरक्षा और संरक्षण से जुड़ा हुआ है। कारखानों और निर्माण इकाइयों में मजदूर और कारीगर पूरे दिन भारी-भरकम और खतरनाक मशीनों के बीच काम करते हैं। मशीन पर स्वस्तिक बनाकर वे मुख्य रूप से अपनी सुरक्षित कार्य दशाओं और उन उपकरणों की लंबी उम्र की मंगलकामना करते हैं ताकि पूरे साल किसी भी प्रकार की दुर्घटना या अनहोनी से बचा जा सके। यह चिह्न उनके लिए एक अदृश्य कवच की तरह काम करता है, जो उन्हें और उनकी आजीविका के मुख्य साधन को सुरक्षित रखता है।
ॐ और शुभ-लाभ लिखने की परंपरा
केवल स्वस्तिक ही नहीं, बल्कि विश्वकर्मा पूजा के दौरान मशीनों और औजारों पर कई अन्य मंगलकारी प्रतीक भी बनाए जाते हैं। इनमें सबसे प्रमुख ‘ॐ’ का निशान है। कई औद्योगिक इकाइयों और कार्यस्थलों पर मशीनों पर ॐ लिखा जाता है, जिसे संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और सृष्टि की असीम ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसे अंकित करने से उस यंत्र या मशीन के भीतर दैवीय शक्ति का स्थायी वास माना जाता है। इसके साथ ही, लेथ मशीनों, ड्रिल मशीनों और कारखानों के मुख्य द्वारों पर ‘शुभ-लाभ’ भी लिखा जाता है। इसका अर्थ यह होता है कि भगवान विश्वकर्मा की अनुकंपा से हर काम मंगलमय हो और उसमें भरपूर मुनाफा मिले। व्यापारी वर्ग इसे अपने कारोबार में बरकत और तरक्की के लिए विशेष रूप से लिखवाता है।
कलावा बांधने और फूलों से सजावट का विधान
पूजन के इस विशेष अनुष्ठान के दौरान कई लोग मशीनों के विभिन्न हिस्सों पर कलावा या मौली भी बांधते हैं। पूजा संपन्न होने के बाद मशीनों के मुख्य हैंडल, स्विच पैनल और विभिन्न औजारों पर लाल रंग का यह रक्षा सूत्र बांधा जाता है, जिसे एक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि कलावा बंधे होने से वह यंत्र किसी भी प्रकार की बुरी नजर या नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रहता है। इसके अलावा, मशीनों की अच्छी तरह साफ-सफाई करने के बाद उन पर हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाया जाता है। फिर उन्हें गेंदे या अन्य ताजे फूलों की माला पहनाई जाती है। कई फैक्ट्रियों में तो मशीनों को किसी नए वस्त्र की तरह भव्य रूप से सजाया जाता है। कुछ जगहों पर मशीनों के ऊपर हाथ की पांचों उंगलियों से रोली और चावल के घोल के छापे भी लगाए जाते हैं, जो घर या कारखाने में मां लक्ष्मी के आगमन का सीधा संकेत माने जाते हैं।


















