मथुरा की पावन धरती पर कदम-कदम पर पौराणिक कथाएं और आध्यात्मिक आस्था बिखरी हुई है। भगवान श्रीकृष्ण की इस नगरी से जुड़ा एक ऐसा ही महत्वपूर्ण स्थल है मधुवन गांव, जहां स्थित ध्रुव टीले पर महज पांच वर्ष की आयु में बालक ध्रुव ने घोर तपस्या की थी। अपनी बालपन की कठिन साधना के बल पर उन्होंने भगवान विष्णु को प्रसन्न कर साक्षात दर्शन देने पर विवश कर दिया था। इसके अलावा यह वही पवित्र क्षेत्र है जहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न ने लवणासुर का संहार किया और मधुपुरी पर हजारों वर्षों तक शासन चलाया।
नैशनल हाईवे 19 से सटा है यह ऐतिहासिक टीला
मथुरा शहर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मधुवन गांव की ओर जाने के लिए नैशनल हाईवे 19 का मार्ग लिया जाता है। इसी गांव की परिधि में यह अत्यंत प्राचीन ध्रुव टीला मौजूद है। इस टीले का निर्माण प्राकृतिक रूप से बड़े-बड़े पत्थरों और विशाल मिट्टी के ढेरों से हुआ है। टीले के भौगोलिक विस्तार की बात करें तो इसकी लंबाई लगभग 200 फीट और ऊंचाई करीब 150 फीट दर्ज की जाती है।
बालक ध्रुव जब केवल पांच वर्ष के थे, तब देवर्षि नारद मुनि की प्रेरणा और निर्देश पर वे इस टीले पर पहुंचे थे। यहां बैठकर उन्होंने अत्यंत श्रद्धाभाव से 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का निरंतर जाप शुरू किया था। लगातार छह महीने तक अन्न-जल त्यागकर की गई इस कठोर साधना के उपरांत भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने ध्रुव जी को अपने दिव्य दर्शन दिए।
चारों ओर फैला है घना और बीहड़ जंगल
ध्रुव टीला चारों तरफ से घने और बीहड़ अरण्य से घिरा हुआ है। इस जंगल में कई प्रकार के जंगली जीव-जंतु वास करते हैं, जिसके चलते यहां दिन के समय भी सन्नाटा और भय का वातावरण रहता है। रात के समय तो इस इलाके में जाने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाता, और दिन में भी लोग अकेले इस टीले की ओर जाने से कतराते हैं। सुरक्षा के लिहाज से श्रद्धालु समूह बनाकर ही यहां पहुंचते हैं।
शत्रुघ्न का शासन और चारों युगों से जुड़ा महत्व
मधुवन धाम का इतिहास केवल सतयुग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चारों युगों की पवित्र स्मृतियों को समेटे हुए है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न ने इसी क्षेत्र में उत्पाती राक्षस लवणासुर का वध किया था। इसके पश्चात शत्रुघ्न ने यहां लगातार 11,000 वर्षों तक धर्मपूर्वक शासन किया। अपने 11,000 वर्षों के लंबे कार्यकाल के बाद उन्होंने अपने पुत्र सुबाहु को मथुरा नगरी की राजगद्दी सौंपकर अपना उत्तराधिकारी बनाया।
कालांतर में द्वापर युग के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पावन भूमि पर अपनी बाल और किशोर लीलाएं रचीं। इसके बाद कलयुग के समय में चैतन्य महाप्रभु ने यहां आकर निरंतर भगवत भजन और साधना की, जिससे इस क्षेत्र की महत्ता युगों-युगों में अमर हो गई।
मंदिर के सेवायत जगदीश गिरी ने साझा की मान्यताएं
ध्रुव जी मंदिर के सेवायत जगदीश गिरी के अनुसार, इस पूरे परिसर को आधिकारिक रूप से ध्रुव टीला नाम से जाना जाता है। सतयुग काल में जब मनु उत्तानपाद की तीसरी पीढ़ी के वंशज बालक ध्रुव यहां पधारे थे, तब उस कालखंड को बीते करीब एक अरब 84 करोड़ 32 लाख वर्ष हो चुके हैं। मान्यता के अनुसार, ब्रज क्षेत्र के कुल 14 वनों में से मधुवन पहला और सबसे प्रमुख वन माना जाता है।
प्रसिद्ध 84 कोस की ब्रज परिक्रमा का पहला पड़ाव भी इसी मधुवन क्षेत्र से शुरू होता है। वर्तमान में मंदिर के गर्भगृह में भगवान नारायण, भक्त ध्रुव जी महाराज और देवर्षि नारद मुनि की पवित्र प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के पुजारी ने जानकारी दी कि छह महीने की अखंड तपस्या पूर्ण होने पर भगवान विष्णु ने बावन एकादशी के पावन दिन ध्रुव जी को दर्शन दिए थे। प्राचीन काल में इसी टीले के पास से मुख्य यमुना नदी बहती थी, जिसके पावन तट पर बैठकर बालक ध्रुव ने भगवान नारायण की आराधना की थी।



















