ग्वालियर में पड़ाव पुल के नीचे मौजूद सिद्ध श्री मंशापूर्ण हनुमान जी मंदिर अपने करीब साढ़े तीन सौ साल पुराने इतिहास और अनूठी परंपराओं के लिए इलाके भर में मशहूर है। इस धार्मिक स्थल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां से जब भी कोई ट्रेन गुजरती है, तो लोको पायलट हॉर्न बजाकर हनुमान जी के प्रति अपनी श्रद्धा और नमन प्रकट करते हैं। इसके अलावा मंदिर के भीतर स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा के ठीक ऊपर भगवान गणेश का विराजमान होना भी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का बिंदु रहता है।
लगभग तीन दशकों से चल रहा है अखंड पाठ
मंदिर के महंत कृष्ण गोपाल दुबे के मुताबिक, इस पवित्र स्थान पर 1 अप्रैल 1997 से बिना रुके लगातार अखंड रामायण का पाठ किया जा रहा है। इस अनुष्ठान की शुरुआत एक अकेली अखंड ज्योति से की गई थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, इन ज्योतियों की संख्या बढ़कर 108 तक पहुंच गई। मंदिर के प्रांगण में दिन-रात चौबीसों घंटे रामायण का पाठ अनवरत जारी रहता है। भक्तगण इस साधना को ईश्वर की आराधना का बहुत बड़ा और असरदार जरिया मानते हैं।
घर न जाने का कठिन संकल्प और सेवा
मंदिर की देखरेख और सेवा में अपनी चौथी पीढ़ी के रूप में जुटे गोपाल दुबे ने अपने जीवनकाल में करीब 30 वर्षों तक घर न लौटने का कड़ा संकल्प लिया था। पुलिस विभाग में अपनी नौकरी संभालने के साथ-साथ वे पूरी निष्ठा से मंदिर की सेवा भी करते रहे। जब भी पाठ करने वाले पाठकों की कमी महसूस होती थी, तो वे खुद अकेले 12-12 घंटे तक बैठकर अखंड रामायण का पाठ पूरा करते थे। 5 मई 2024 को उनके निधन के बाद से उनके बेटे कृष्ण गोपाल दुबे इस मंदिर की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
बल और बुद्धि का अनूठा संगम
महंत कृष्ण गोपाल दुबे का कहना है कि हनुमान जी को जहां बल का प्रतीक माना जाता है, वहीं भगवान गणेश बुद्धि के देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर आने वाले भक्त इन दोनों ही देवों के एक साथ दर्शन करने को अपनी गहरी आस्था से जोड़ते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पाठ की यह परंपरा और निरंतर चलने वाला रामायण पाठ इस प्राचीन मंदिर को ग्वालियर के खास धार्मिक केंद्रों में एक अलग मुकाम दिलाता है।
सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पहचान
ग्वालियर का यह सिद्ध श्री मंशापूर्ण हनुमान मंदिर अपनी प्राचीन मान्यताओं और दशकों पुरानी सेवा भावना के कारण अलग ही पहचान रखता है। रेल चालकों द्वारा ट्रेन निकालते वक्त हॉर्न बजाकर अभिवादन करने का रिवाज इसे देश के बाकी मंदिरों से बिल्कुल जुदा बनाता है। यही वजह है कि यह स्थान सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि ग्वालियर शहर की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का भी एक अहम हिस्सा बन चुका है।



















