आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला मां भगवती की उपासना का पर्व इस बार 11 अक्टूबर, रविवार के पावन अवसर पर शुरू हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाली इस साधना में श्रद्धालु देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों का ध्यान धरते हैं और व्रत-अनुष्ठान के माध्यम से अपने जीवन में मंगल, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। इस आध्यात्मिक उत्सव का विधान आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन कलश की स्थापना के साथ आरंभ होता है और नवमी तिथि के हवन व कन्या पूजन के साथ संपन्न होता है। इस वर्ष तिथियों की गणना के अनुसार कुछ विशेष संयोग भी बन रहे हैं, जिससे पूरे अनुष्ठान का कार्यक्रम खास रहेगा।
घट स्थापना के निर्धारित शुभ मुहूर्त
नवरात्रि के प्रथम दिन पूजा स्थल पर कलश स्थापित करने की परंपरा सबसे प्रमुख मानी जाती है। पंचांग की गणना बताती है कि 11 अक्टूबर को प्रातःकाल घट स्थापना के लिए अनुकूल समय सुबह 6:19 बजे से लेकर 10:12 बजे तक उपलब्ध रहेगा। जो श्रद्धालु इस अवधि में पूजन न कर सकें, उनके लिए दोपहर के समय एक और फलदायी समय निर्धारित है।
दोपहर में अभिजीत मुहूर्त के दौरान कलश स्थापित किया जा सकता है, जो सुबह 11:44 बजे से शुरू होकर दोपहर 12:30 बजे तक बना रहेगा। इन दोनों समयावधियों में संकल्प लेकर कलश बैठाने और मां दुर्गा का आह्वान करने का विशेष धार्मिक विधान है।
शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी: प्रथम दो दिनों की साधना
नवरात्रि के पहले दिन यानी 11 अक्टूबर, रविवार को पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां शैलपुत्री की उपासना की जाएगी। शैलपुत्री की आराधना से साधक के जीवन में मानसिक स्थिरता, आत्मिक शक्ति और दृढ़ विश्वास का संचार होता है। साधक अपनी नौ दिवसीय साधना का आरंभ इन्हीं की पूजा अर्चना से करते हैं।
दूसरे दिन 12 अक्टूबर, सोमवार को मां ब्रह्मचारिणी की वंदना होगी। देवी का यह स्वरूप कठिन तप, त्याग और आत्मसंयम की प्रेरणा देता है। इनकी आराधना करने वाले भक्तों को विषम परिस्थितियों से जूझने का आंतरिक बल और धैर्य प्राप्त होता है।
चंद्रघंटा और कूष्मांडा: निर्भयता व सृजन की अधिष्ठात्री
तीसरे दिन 13 अक्टूबर, मंगलवार को मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान है। मां के माथे पर सुशोभित अर्धचंद्र के कारण वे इस नाम से जानी जाती हैं। उनका यह तेजस्वी रूप साहस और पराक्रम से जुड़ा है, जिसकी उपासना से व्यक्ति को हर तरह के अज्ञात डर और मानसिक संताप से मुक्ति मिलती है।
चौथे दिन 14 अक्टूबर, बुधवार को मां कूष्मांडा की वंदना की जाएगी। ब्रह्मांड की ऊर्जा और नवसृजन की शक्ति का प्रतीक माने जाने वाले इस स्वरूप की पूजा से घर-आंगन में सकारात्मक माहौल, खुशहाली और ऐश्वर्य का वास होता है।
स्कंदमाता और कात्यायनी: वात्सल्य तथा मनोकामना सिद्धि
उत्सव के पांचवें दिन 15 अक्टूबर, गुरुवार को भगवान कार्तिकेय की माता स्कंदमाता की आराधना की जाएगी। मातृत्व और अपार वात्सल्य का प्रतिनिधित्व करने वाली स्कंदमाता से भक्त संतान के कल्याण, प्रखर बुद्धि और पारिवारिक शांति का आशीर्वाद मांगते हैं।
छठे दिन 16 अक्टूबर, शुक्रवार को मां कात्यायनी की पूजा की जाएगी। अदम्य शौर्य और दैवीय तेज से परिपूर्ण मां कात्यायनी की भक्ति वैवाहिक जीवन में सुख, सौहार्द और रुके हुए मनोरथों को सिद्ध करने वाली मानी जाती है।
सप्तमी का दो दिवसीय योग और मां कालरात्रि
सातवें दिन पूजी जाने वाली मां कालरात्रि की आराधना इस बार दो अलग-अलग तारीखों में बंटी रहेगी। पंचांग गणना के चलते 17 अक्टूबर और 18 अक्टूबर दोनों दिन सप्तमी तिथि का प्रभाव रहेगा, इसलिए मां के इस सातवें स्वरूप की पूजा दो दिन होगी। देखने में अत्यंत भयानक और उग्र प्रतीत होने के बावजूद देवी का यह स्वरूप भक्तों के लिए परम कल्याणकारी और रक्षक है। इनकी पूजा अर्चना से समस्त भय नष्ट होते हैं और साधक में निर्भीकता आती है।
अष्टमी और नवमी का अद्भुत संयोग
इस बार तिथियों के विशेष क्रम के कारण अष्टमी और नवमी तिथि 19 अक्टूबर, सोमवार को ही एक साथ पड़ रही हैं। इसी दिन सुबह मां महागौरी की आराधना होगी, जो निर्मल शांति, सौम्यता और पवित्रता की प्रतीक हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु घरों में कुल परंपरा अनुसार कन्या पूजन करते हैं और परिवार में आरोग्य और सुख की कामना करते हैं।
इसी तारीख यानी 19 अक्टूबर को ही अंतिम स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा भी संपन्न की जाएगी। समस्त प्रकार की सिद्धियों, आध्यात्मिक उपलब्धियों और कर्मों में सफलता प्रदान करने वाली इस देवी की विदाई के साथ श्रद्धालु नौ दिवसीय अनुष्ठान को पूर्णता की ओर ले जाते हैं। इसी दिन कन्याओं को भोजन कराने और पूर्णाहुति हवन करने की मुख्य परंपरा भी पूरी की जाएगी।



















