उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में एक ऐसा पोखरा है, जिस पर कब्जा करने की हिम्मत आज तक कोई नहीं जुटा पाया। करीब 400 साल पुराने इस जलाशय को स्थानीय लोग सिर्फ एक तालाब नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र मानते हैं। लगभग 52 बीघा में फैले इस पोखरे के पीछे एक सूफी संत की कहानी जुड़ी है, और लोगों की मान्यता है कि जो कोई भी इस जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करता है, उसे संत के श्राप का सामना करना पड़ता है।
बादशाह की मन्नत और संत का आशीर्वाद
करहा गांव के रहने वाले वकील बताते हैं कि करीब 400 साल पहले इलाके में यह पोखरा खोदा गया था और इसकी खुदाई सूफी संत मीर सम्सी ने करवाई थी। किस्से के मुताबिक एक बादशाह को लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई थी। परेशान बादशाह सरजू महाराज के पास पहुंचे, जहां उन्हें सुझाव मिला कि वे सूफी संत मीर सम्सी बाबा के पास जाएं, वहीं उनकी समस्या का हल निकलेगा। बादशाह बाबा के पास पहुंचे, अपनी परेशानी बताई और बाबा ने उन्हें एक उपाय बताते हुए भरोसा दिलाया कि जल्द ही उनके घर संतान होगी। कुछ समय बाद जब सच में बादशाह को संतान प्राप्त हुई, तो वे खुशी से भरकर भारी मात्रा में गहने और जवाहरात लेकर बाबा के पास पहुंचे।
फकीर ने ठुकराए गहने, गरीबों के लिए बनवाया पोखरा
सूफी संत मीर सम्सी बाबा ने बादशाह से कहा कि वे एक फकीर हैं और उन्हें इतने गहनों और जवाहरात की कोई जरूरत नहीं, बेहतर होगा कि यह दौलत गरीबों में बांट दी जाए। लेकिन बादशाह यह भेंट लौटाकर जाने को राजी नहीं हुए। उन्होंने बाबा से कहा कि वे झोपड़ी जैसी जगह में नहीं, बल्कि एक शानदार भवन में रहें। सूफी संत ने बादशाह की यह बात मानकर आलीशान इमारत बनवाने से इनकार कर दिया, लेकिन उन गहनों और जवाहरात को बेचकर मिले पैसों से इलाके के गरीबों के लिए पानी की एक स्थायी व्यवस्था बनाने का फैसला किया। इसी सोच के साथ लगभग 52 बीघा में एक बड़े पोखरे की खुदाई करवाई गई, जो राजस्व अभिलेखों में आज भी इतने ही रकबे में दर्ज है। खुदाई के वक्त संत ने यह भी चेतावनी दी कि जो कोई इस पोखरे की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करेगा, उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
कब्जे की कोशिश करने वालों का बुरा हाल
हालांकि दस्तावेजों में यह पोखरा 52 बीघे में दर्ज है, मौके पर आज इसका फैलाव इससे कम रह गया है। इसके बावजूद स्थानीय लोगों में यह गहरी मान्यता है कि इस जमीन पर कब्जे की कोई भी कोशिश आसानी से पूरी नहीं होती। बताया जाता है कि कई बार लोगों ने पोखरे की जमीन हड़पने की कोशिश की, लेकिन इसके बाद वे लंगड़ेपन और अलग अलग बीमारियों से जूझने लगे। परेशानियों से घिरकर आखिरकार उन्हें हार माननी पड़ी और कब्जा छोड़कर जमीन खाली करनी पड़ी। इलाके में इसे आज भी बाबा का चमत्कार माना जाता है, और यही वजह है कि लोग यहां बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा पाठ करने आते हैं।
400 साल में नहीं सूखा पानी, आज भी पूरी होती हैं मन्नतें
स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब 400 साल बीत जाने के बाद भी यह पोखरा आज तक कभी पूरी तरह सूखा नहीं है। लोग मानते हैं कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है, यही वजह है कि दूर दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। संत की मजार पर पहुंचकर पहले हाथ पैर धोकर पूजा पाठ करने की परंपरा आज भी कायम है। हालांकि प्रशासन का ध्यान इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले पोखरे की तरफ अब तक नहीं गया है, जिसकी वजह से यह जलाशय आज बदहाली और रखरखाव की कमी झेल रहा है। इसके बावजूद स्थानीय आस्था और मान्यता के चलते यह पोखरा आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है।




















