सावन के पवित्र महीने की शुरुआत के साथ ही खरगोन शहर के आराध्यदेव भगवान सिद्धनाथ महादेव मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी है। मंदिर प्रबंधन ने इस बार सावन के लिए खास धार्मिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की है, और गुरु पूर्णिमा के दिन से ही यहां रोजाना महाआरती, भगवान का श्रृंगार और महाप्रसादी वितरण की शुरुआत हो चुकी है। करीब पौने 400 साल पुराना यह मंदिर जिले के सबसे प्रमुख शिवालयों में गिना जाता है और इसकी अपनी अलग धार्मिक पहचान है।
हर सोमवार सुबह 4 बजे खुलेंगे मंदिर के पट
सावन के दौरान मंदिर में रोज शाम को महाआरती, विशेष पूजन और भगवान शिव का आकर्षक श्रृंगार किया जाएगा। सावन के हर सोमवार को यहां विशेष अभिषेक, रुद्राभिषेक और दुग्धाभिषेक का आयोजन होगा। मंदिर समिति के मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र भावसार और मंदिर के पुजारी के मुताबिक, सावन के हर सोमवार सुबह 4 बजे मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे, ताकि श्रद्धालु सुबह से ही दर्शन-पूजन कर सकें। पूरे दिन भक्त भगवान सिद्धनाथ का दूध, दही, शहद और जल से अभिषेक करेंगे और शीश नवाकर परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि की कामना करेंगे। सुबह से देर शाम तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक, बेलपत्र अर्पण और पूजा अर्चना के लिए मंदिर पहुंचेंगे। मंदिर परिसर में स्थापित बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का भी खास महत्व माना जाता है, इसलिए बड़ी तादाद में लोग इन्हें देखने भी आते हैं।
गुरु पूर्णिमा से रात 9 बजे महाआरती, पड़वा तक चलेगा सिलसिला
शहर के इस प्राचीन मंदिर में गुरु पूर्णिमा से रोजाना रात 9 बजे महाआरती हो रही है, जो पड़वा तक लगातार जारी रहेगी। हर महाआरती के बाद श्रद्धालुओं में महाप्रसादी बांटी जा रही है। हर साल की तरह इस बार भी इसमें भारी भीड़ जुट रही है। सावन के आते ही मंदिर की रौनक भी बढ़ गई है, परिसर में रंगरोगन कराया गया है और आकर्षक विद्युत सज्जा भी की गई है, जिससे मंदिर का माहौल और भी भक्तिमय हो गया है।
30 अगस्त को निकलेगा 58वां शिवडोला
सावन के धार्मिक आयोजनों के समापन के बाद 30 अगस्त को भाद्रपद शुक्ल द्वितीया यानी भादो की दूज पर मंदिर से 58वां शिवडोला निकाला जाएगा। इस भव्य धार्मिक यात्रा में खरगोन शहर के साथ साथ आसपास के इलाकों से भी हजारों श्रद्धालु शामिल होंगे।
1651 में हुई थी स्थापना, नाग की समाधि से जुड़ा है इतिहास
सिद्धनाथ महादेव मंदिर खरगोन के सबसे पुराने मंदिरों में शुमार है। मान्यता के अनुसार इसकी स्थापना सन 1651 में मल्लिवाल परिवार ने करवाई थी। खास बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग एक नाग की समाधि पर विराजमान है, और उसी नाग के नाम पर इस मंदिर की पहचान बनी। मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और इससे जुड़े कई चमत्कार इसे बाकी शिव मंदिरों से अलग बनाते हैं। यही वजह है कि श्रावण माह में दूर दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं। लोगों की गहरी आस्था है कि भगवान यहां साक्षात विराजमान हैं।



















