सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भगवान भोलेनाथ की भक्ति का माहौल बन गया है। गाजियाबाद के वैशाली क्षेत्र में सेक्टर 4 के भीतर बना गोपेश्वर महादेव मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस पावन स्थल की सबसे अनूठी बात यह है कि इसका सीधे तौर पर संबंध कान्हा की नगरी वृंदावन के ऐतिहासिक गोपेश्वर महादेव धाम से जुड़ा माना जाता है। सावन के दिनों में यहां हर रोज हजारों की संख्या में भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजन करने पहुंच रहे हैं। मान्यता है कि सच्चे हृदय से यहां आकर बेलपत्र और जल अर्पित करने वाले हर श्रद्धालु की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के महारास से जुड़ा है दिव्य इतिहास
इस मंदिर के नामकरण और इसके महत्व के पीछे एक बेहद मनमोहक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, जब वृंदावन की पवित्र भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण अपनी गोपियों के साथ महारास का आयोजन कर रहे थे, उस समय देवों के देव महादेव के मन में भी उस अलौकिक दृश्य के दर्शन करने की तीव्र अभिलाषा जाग्रत हुई। हालांकि, महारास के उस पावन मंडल में केवल स्त्रियों यानी गोपियों को ही प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त था।
भगवान शिव ने उस दिव्य लीला का साक्षी बनने के लिए एक अनोखा मार्ग चुना। उन्होंने पावन यमुना नदी में डुबकी लगाई और स्वयं गोपी का रूप धारण कर लिया। गोपी रूप में महारास में पहुंचे भगवान शिव को लीलाधर श्रीकृष्ण ने तुरंत पहचान लिया। श्रीकृष्ण ने आदर और प्रेमभाव से उन्हें गोपियों के ईश्वर यानी गोपेश्वर की उपाधि से विभूषित किया। इसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रसंग के बाद से भगवान शिव के इस स्वरूप की पूजा भक्ति, भ्रातृभाव और अपने शरणगत भक्तों की रक्षा करने वाले दयालु देव के रूप में की जाती है।
वृंदावन से गाजियाबाद तक मंदिर की स्थापना की कहानी
वैशाली स्थित इस प्रसिद्ध मंदिर के इतिहास के विषय में जानकारी देते हुए यहां के मुख्य पुजारी देवेंद्र कुमार शास्त्री ने बताया कि इस देवालय की स्थापना लगभग 26 वर्ष पूर्व हुई थी। उस समय वैशाली और उसके आसपास के क्षेत्रों में कई ऐसे परिवार आकर बसे थे जिनका मूल निवास या पारिवारिक पृष्ठभूमि वृंदावन से जुड़ी हुई थी। रोजगार और आजीविका के अवसरों के कारण गाजियाबाद आने के बाद भी उन परिवारों की आस्था अपनी जड़ों से जुड़ी रही।
इन श्रद्धालुओं ने वृंदावन के मूल गोपेश्वर महादेव मंदिर से सिद्ध पीठ लाकर यहां पूर्ण वैदिक विधि-विधान और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ स्थापित कराया। स्थापना के समय से ही यह स्थल स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले सनातन धर्मावलंबियों की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया। आज भी इस स्थान का आध्यात्मिक तार वृंदावन के मुख्य पीठ से निरंतर जुड़ा हुआ माना जाता है।
दिल्ली और नोएडा से खिंचे चले आते हैं श्रद्धालु
मंदिर की बढ़ती ख्याति का ही परिणाम है कि सावन के पूरे महीने में केवल गाजियाबाद ही नहीं, बल्कि दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और समूचे एनसीआर से बड़ी संख्या में शिवभक्त दर्शन के लिए वैशाली पहुंचते हैं। सावन के प्रत्येक दिन यहां प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर में जयकारे गूंजते रहते हैं। भक्तजन भगवान आशुतोष को प्रसन्न करने के लिए जल, गाय का दूध, पंचामृत, भांग, धतूरा और बेलपत्र चढ़ाते हैं।
धार्मिक परंपरा के अनुसार सावन के पूरे माह में रोज यहां भव्य रुद्राभिषेक का आयोजन किया जाता है। इस विशेष पूजा में भाग लेने के लिए दूर-दूर से भक्तजन आते हैं और शिवजी की कृपा प्राप्त करते हैं। पूरे महीने मंदिर परिसर में आध्यात्मिक भजनों और शिव स्तुति का सुरीला प्रवाह बना रहता है।
दक्षिण भारतीय शैली का गणेश मंदिर और 10 मंजिला पहचान
गोपेश्वर महादेव मंदिर परिसर केवल शिव साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां कई अन्य देवी-देवताओं के सुंदर और भव्य मंदिर भी स्थापित हैं। इनमें से सबसे प्रमुख आकर्षण का केंद्र दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला एवं शैली में निर्मित भगवान गणेश का भव्य मंदिर है। इसकी अनूठी वास्तुकला और नक्काशी दर्शनार्थियों का ध्यान अपनी ओर खींचती है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
अपनी विशाल संरचना और बहुमंजिला बनावट के कारण स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं के बीच यह स्थान 10 मंजिला मंदिर के नाम से भी काफी मशहूर है। यदि कोई भक्त यहां दर्शन के लिए आना चाहता है, तो यातायात के साधन बहुत सुलभ हैं। दिल्ली मेट्रो की ब्लू लाइन पर स्थित वैशाली मेट्रो स्टेशन पर उतरकर ऑटो, ई-रिक्शा या पैदल चलकर कुछ ही मिनटों में सेक्टर 4 स्थित इस मंदिर परिसर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। सावन के इस पावन पर्व पर यह मंदिर आस्था का अलौकिक केंद्र बना हुआ है।



















