सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत फलदायी और पावन माना जाता है। पूरे माह शिव मंदिरों में तड़के से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जहां चारों ओर हर-हर महादेव और बोल बम के जयकारों की मधुर ध्वनि गूंजती रहती है। इस पूरे महीने में सावन शिवरात्रि का दिन धार्मिक दृष्टि से सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी माना जाता है। इस पावन तिथि पर भगवान शिव का जलाभिषेक करने, पवित्र गंगाजल अर्पित करने और नियमपूर्वक व्रत रखने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होने की अटूट मान्यता है। हालांकि कई बार लोग सावन शिवरात्रि और महाशिवरात्रि को एक ही समझ लेते हैं, जबकि धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार दोनों पर्वों का महत्व और इतिहास अलग-अलग है।
सावन शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के बीच का मुख्य अंतर
दोनों पर्वों के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए बल्लभगढ़ के महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि फाल्गुन महीने में पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है। महा शब्द का शाब्दिक अर्थ सबसे बड़ी शिवरात्रि होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी पावन दिन भगवान शिव का दिव्य शिवलिंग प्रकट हुआ था, और इसी तिथि को शिव-पार्वती के पावन विवाह के उत्सव के रूप में भी स्मरण किया जाता है। दूसरी ओर, यद्यपि हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक महीने में एक शिवरात्रि आती है, परंतु सावन माह में आने वाली शिवरात्रि को विशेष रूप से सावन शिवरात्रि कहा जाता है, जिसका कांवड़ यात्रा और सावन के नियमों के कारण अपना एक विशिष्ट धार्मिक स्थान है।
शिवलिंग पर जल और गंगाजल चढ़ाने की पौराणिक कथा
भगवान शिव को जल अर्पित करने और गंगाजल से जलाभिषेक करने की परंपरा का संबंध समुद्र मंथन की एक महान पौराणिक घटना से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया जा रहा था, तब उसमें से अत्यंत भयानक हलाहल विष निकला, जिससे पूरी सृष्टि पर विनाश का संकट छा गया। ब्रह्मांड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान शिव ने उस संपूर्ण विष का पान कर लिया, परंतु उसे अपने पेट में उतारने के स्थान पर अपने कंठ में ही रोक लिया। इस कारण उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
विष के तीव्र प्रभाव के कारण भगवान शिव के शरीर में अत्यधिक जलन होने लगी और उनका शरीर तपने लगा। महादेव के शरीर को इस तीव्र ताप से राहत दिलाने के लिए सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने पवित्र नदी गंगा से जल लाकर उनके मस्तक पर अर्पित किया। गंगाजल की शीतलता से भगवान शिव का शरीर शांत हुआ और उनका कष्ट दूर हो गया। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने सभी देवताओं को मनचाहा वरदान प्रदान किया। उसी समय से सावन के महीने में महादेव को शीतल जल चढ़ाने और गंगाजल से अभिषेक करने की पावन परंपरा की शुरुआत हुई।
बोल बम के जयकारे का पौराणिक इतिहास
सावन के दौरान कांवड़ यात्रियों और शिव भक्तों द्वारा लगाए जाने वाले बोल बम के जयकारे की जड़ें भी एक अनोखी पौराणिक कथा से जुड़ी हैं। कथा के अनुसार जब भगवान शिव के गणों द्वारा राजा दक्ष प्रजापति का सिर काट दिया गया था, तब बाद में उनके धड़ पर एक बकरे का सिर जोड़ा गया। जब दक्ष प्रजापति को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे महादेव से क्षमा याचना करने पहुंचे, तो बकरे का सिर होने के कारण उनके मुंह से स्पष्ट शब्दों के बजाय केवल बम-बम की आवाज निकली।
दक्ष प्रजापति की इस करुण ध्वनि से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें क्षमा कर दिया। इस घटना के बाद से ही शिव भक्तों के बीच बोल बम का जयकारा लगाने की प्रथा शुरू हुई। आज भी श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र गंगाजल भरकर लाते समय बोल बम का जयकारा लगाते हैं और पूर्ण श्रद्धा से शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं।
व्रत रखने और पूजन करने का धार्मिक महत्व
सावन शिवरात्रि के दिन नियम और श्रद्धा के साथ व्रत का पालन करना बेहद फलदायी माना जाता है। महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के अनुसार इस दिन सुबह स्नान के बाद शिव मंदिर जाकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करना चाहिए, गंगाजल चढ़ाना चाहिए और पूरे मन से आरती व पूजा करनी चाहिए। ऐसी मान्यता है कि सावन शिवरात्रि पर सच्चे दिल से की गई शिव पूजा से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मनोवांछित सफलता प्राप्त होती है। इसलिए इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं को मंदिर जाकर शिव आराधना अवश्य करनी चाहिए।



















