भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर देशभर में भगवान गणेश के स्वागत की तैयारियां उल्लास के साथ पूरी हो चुकी हैं। घरों से लेकर विशाल सार्वजनिक पंडालों तक विघ्नहर्ता की प्रतिमाएं विधि-विधान से स्थापित की जा रही हैं। सनातन परंपरा में भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, समृद्धि और शुभता का प्रदाता माना गया है। किसी भी नए अनुष्ठान, व्यापार या मांगलिक कार्य के आरंभ में सबसे पहले गणपति की आराधना की जाती है ताकि मार्ग की समस्त बाधाएं समाप्त हो सकें। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी गणेश जी की उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है, जिससे कुंडली में उपस्थित बुध दोष शांत होता है और कार्यों में बिना किसी विघ्न के सिद्धि प्राप्त होती है। आमतौर पर 10 दिनों तक मनाया जाने वाला यह पावन गणेशोत्सव इस बार कुल 12 दिनों तक चलेगा, जिससे श्रद्धालुओं को देव आराधना के लिए अतिरिक्त अवधि प्राप्त होगी।
तिथि का विस्तार और मध्याह्न काल में पूजन की परंपरा
पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि का शुभारंभ 14 सितंबर को प्रातः लगभग 7 बजकर 6 मिनट पर हुआ है, जबकि इसका समापन 15 सितंबर को प्रातः लगभग 7 बजकर 44 मिनट पर निर्धारित है। शास्त्रों में उदया तिथि की मान्यता को सर्वोपरि माना गया है, जिसके अनुसार मुख्य पर्व का आयोजन किया जा रहा है। गणपति पूजन और मूर्ति स्थापना के संदर्भ में दोपहर यानी मध्याह्न काल का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र भगवान गणेश का प्राकट्य दोपहर के समय ही हुआ था। यही कारण है कि भक्तगण दोपहर के समय ही मंगलमूर्ति की स्थापना और उनका विशेष अभिषेक करना सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
गणेश चतुर्थी 2026: प्रतिमा स्थापना का सटीक शुभ मुहूर्त
इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर पूजा और मूर्ति स्थापना के लिए अत्यंत दुर्लभ और सटीक मुहूर्त उपस्थित हो रहा है। भगवान गणेश की विधिवत अर्चना के लिए शुभ समय प्रातः 11 बजकर 1 मिनट से आरंभ होकर दोपहर 1 बजकर 29 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इस प्रकार श्रद्धालुओं को बप्पा के आवाहन, प्रतिष्ठा और पूर्ण पूजन संपन्न करने के लिए कुल 2 घंटे और 28 मिनट की शुभ समयावधि प्राप्त होगी। इस निश्चित समय चक्र के भीतर पूजन संपन्न करना शास्त्रों के अनुसार अत्यंत फलदायी और मंगलकारी माना जाता है।
चरणबद्ध पूजा विधि और मनोकामना पूर्ति के नियम
गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर शुद्ध एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके उपरांत पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर भली-भांति पवित्र करें। पूजा की चौकी स्थापित कर उस पर लाल अथवा पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान गणेश की भव्य प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद गणपति को क्रमशः शुद्ध जल, पंचामृत और फिर गंगाजल से श्रद्धापूर्वक स्नान कराएं। स्नान के पश्चात देव प्रतिमा पर चंदन, रोली, अक्षत, सिंदूर और ताजे पुष्प अर्पित करें।
भगवान गणेश को दूर्वा की गांठे और लाल पुष्प अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इन्हें पूजा में विशेष रूप से समर्पित करना चाहिए। इसके पश्चात सुगंधित धूप और शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर आरती करें। पूजा के दौरान मन को एकाग्र रखते हुए पवित्र गणेश मंत्रों का जप करें और अंत में अपने परिवार की सुख-शांति, बुद्धि और सफलता के लिए प्रार्थना करें। समस्त पारिवारिक सदस्य मिलकर भगवान का प्रसाद ग्रहण करें, क्योंकि इस अनुष्ठान में सच्ची श्रद्धा और समर्पण ही सबसे मुख्य तत्व है।
सफलता और विघ्न निवारण के पावन गणेश मंत्र
पूजन के समय शास्त्रों में वर्णित इन कल्याणकारी मंत्रों का स्पष्ट उच्चारण अत्यंत प्रभावी माना गया है
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
इसके साथ ही बुद्धि और चेतना के विस्तार हेतु गणेश गायत्री मंत्र का भी उच्चारण किया जाता है
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥
पूजन सामग्री सूची और प्रिय नैवेद्य अर्पण
गणपति पूजन को शास्त्रोक्त तरीके से संपन्न करने के लिए आवश्यक सामग्री का संकलन पहले से ही कर लेना श्रेयस्कर होता है। पूजा की थाली और वेदी के लिए निम्नलिखित वस्तुएं अनिवार्य रूप से सम्मिलित करें
- भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा, लकड़ी की चौकी, लाल या पीला वस्त्र और कलश
- नारियल, रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, चंदन और कलावा अथवा मौली
- हरी दूर्वा घास, ताजे फूल, पुष्पमाला, धूप, अगरबत्ती, दीपक, कपूर और सुपारी
- पान के पत्ते, ताजे मौसमी फल तथा पारंपरिक मिष्ठान
नैवेद्य के रूप में भगवान गणेश को मोदक और बेसन अथवा बूंदी के लड्डू अत्यंत प्रिय हैं, अतः इनका भोग लगाना परम शुभ माना जाता है। इसके अतिरिक्त केले, सेब, अनार और नारियल जैसे फलों का अर्पण भी फलदायी होता है। परिवार द्वारा घर में शुद्धता से तैयार किए गए सात्विक पकवान, खीर, हलवा एवं अन्य पारंपरिक मिठाइयां भी बप्पा को अर्पित की जा सकती हैं। यह महापर्व अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धापूर्वक गणेश विसर्जन के साथ पूर्णता प्राप्त करेगा, जहां भक्त नम आंखों से अगले वर्ष पुनः पधारने की प्रार्थना करेंगे।



















