मथुरा के पावन क्षेत्र वृंदावन में यमुना नदी के तट पर स्थित राधा मदन मोहन मंदिर अपनी दिव्यता और अनोखे इतिहास के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पुराने इस प्राचीन देवस्थान की नक्काशी, बेजोड़ वास्तुकला और शांत वातावरण यहां आने वाले श्रद्धालुओं को पहली ही नजर में आकर्षित कर लेते हैं। मंदिर से जुड़ी एक अत्यंत लोकप्रिय कथा के अनुसार, सदियों पहले यमुना के जलमार्ग से गुजर रहा एक विशाल व्यापारिक जहाज रेत के टीले पर अचानक फंस गया था। इस अप्रत्याशित संकट के बाद ही इस भव्य मंदिर के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी।
वृंदावन आगमन और सनातन गोस्वामी की मधुकरी परंपरा
वृंदावन को शास्त्रों में तुलसी का वन कहा गया है, जिसकी पहचान भगवान श्री कृष्ण की अलौकिक बाल लीलाओं से जुड़ी है। इतिहास और परंपराओं के अनुसार, चैतन्य महाप्रभु के अनन्य शिष्य रूप सनातन गोस्वामी जब वृंदावन पहुंचे, तो उन्होंने यमुना किनारे स्थित इसी ऊंचे टीले पर अपनी एक साधारण झोपड़ी बनाई और यहीं रहकर अपनी साधना शुरू की। वे नित्य नियम से वृंदावन से मथुरा जाकर मधुकरी मांगते थे। मधुकरी से जो भी अन्न या भोजन प्राप्त होता, उसी का प्रभु को श्रद्धापूर्वक भोग लगाते थे और शेष प्रसाद स्वयं ग्रहण करते थे।
बालक रूप में मदन मोहन का हठ और वृंदावन प्रस्थान
एक दिन मथुरा में मधुकरी के दौरान रूप सनातन गोस्वामी का सामना एक बेहद तेजस्वी और असाधारण बालक से हुआ। वह दिव्य बालक वास्तव में मदन मोहन का ही रूप था। उस बालक ने रूप सनातन गोस्वामी से जिद पकड़ ली कि वह भी उनके साथ वृंदावन जाएगा। इस पर रूप सनातन गोस्वामी ने बालक को समझाया कि उनके पास कोई वैभव या साधन नहीं हैं, वे तो स्वयं भिक्षाटन यानी मधुकरी पर आश्रित हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि बालक को मधुकरी से मिले साधारण भोजन का ही भोग स्वीकार हो, तभी वह उनके साथ वृंदावन चल सकता है। बालक इस पर राजी हो गया और रूप सनातन गोस्वामी के साथ कुटिया में आकर रहने लगा।
रेत के टीले पर सात दिनों तक अटका रहा व्यापारिक जहाज
इसी दौर में पंजाब के एक संपन्न व्यापारी रामदास कपूर का मालवाहक जहाज यमुना के जलमार्ग से अपनी यात्रा पर था। उस जहाज में भारी मात्रा में सेंधा नमक और कपूर भरा हुआ था। यात्रा के दौरान व्यापारी का जहाज अचानक उसी टीले के पास आकर रेत में धंस गया। लगातार सात दिनों तक जहाज वहीं अटका रहा और तमाम कोशिशों के बावजूद टस से मस नहीं हुआ। जहाज के फंसने से व्यापारी को भारी नुकसान की आशंका सताने लगी और वह अत्यंत व्याकुल हो उठा। मदन मोहन को नमक खाने का अति प्रिय माना जाता था, जिससे इस घटना को दैवीय इच्छा से जोड़कर देखा गया।
व्यापारी की मिन्नत और भव्य मंदिर का निर्माण
जब जहाज को निकालने के सारे मानवीय प्रयास विफल हो गए, तब व्यापारी रामदास कपूर टीले पर स्थित झोपड़ी में पहुंचे और भगवान मदन मोहन से जहाज को जलधारा में वापस लाने की करुण प्रार्थना की। तब मदन मोहन ने उनसे कहा कि वे खुले आसमान के नीचे धूप में रहते हैं, यदि व्यापारी उनके लिए एक उचित मंदिर बनवाने की व्यवस्था करे तो उसका जहाज तुरंत निकल जाएगा। व्यापारी ने श्रद्धापूर्वक यह वचन दे दिया कि जहाज के मुक्त होते ही वह यहां भव्य मंदिर बनवाएगा। मान्यता है कि संतों और प्रभु के स्पर्श से जहाज तत्काल टीले से निकलकर तैरने लगा और जहाज में लदा साधारण सेंधा नमक भी बहुमूल्य हीरे जवाहरातों में बदल गया। अपना वचन निभाते हुए पंजाब के उसी व्यापारी रामदास कपूर ने राधा मदन मोहन मंदिर का निर्माण कराया, जो आज भी यमुना किनारे आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।



















