श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी पर देश के विभिन्न हिस्सों में अनूठे रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक बेहद सुंदर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रसंग तेलंगाना में नजर आता है, जहां लोग अपने आराध्य के स्वागत के लिए बेहद प्राचीन और खास पद्धति अपनाते हैं। इस अनूठी संस्कृति को कृष्णा पादालु के नाम से जाना जाता है, जिसमें राज्य के शहरी और ग्रामीण इलाकों के लोग पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेते हैं।
द्वार से पूजा घर तक चावल के आटे से बनते हैं नन्हे कदम
इस विशेष रिवाज के तहत घर की देहरी से लेकर पूजा स्थल और रसोई तक भगवान के बाल स्वरूप के छोटे-छोटे पैरों के निशान उकेरे जाते हैं। लोगों की अटूट आस्था है कि मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण खुद माखन की खोज करते हुए इन नन्हे कदमों से घर के अंदर कदम रखते हैं। इस पावन आगमन से पूरे परिवार के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है, ऐसी मान्यता वहां के जनमानस में रची-बसी है।
चावल के लेप से पदचिह्न तैयार करने की पारंपरिक विधि
इन पवित्र पदचिह्नों को बनाने में किसी भी तरह के कृत्रिम रंगों का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया जाता है। इसके स्थान पर केवल शुद्ध चावल को भिगोकर उसका गाढ़ा लेप तैयार किया जाता है, जो पूरी तरह प्राकृतिक होता है। कई घरों में आज भी चावल को पारंपरिक सिलबट्टे पर ही बारीक पीसकर यह पेस्ट तैयार किया जाता है।
परिवार की बुजुर्ग महिलाएं अपनी मुट्ठी या हथेली के किनारे को इस चावल के घोल में भिगोकर फर्श पर बेहद सधे हुए तरीके से रखती हैं, जिससे पैर के तलवे का सुंदर आकार उभर आता है। इसके बाद हाथ की उंगलियों के पोरों की मदद से उन पर नन्हें पंजों की पांचों उंगलियां बनाई जाती हैं। जिन घरों में छोटे बच्चे होते हैं, वहां उनके पैरों को सीधे इस लेप में हल्का डुबोकर फर्श पर चलाया जाता है, जिससे पूरा घर किलकारियों और उत्सव के माहौल से गूंज उठता है।
निशानों की दिशा और कान्हा के आगमन का प्रतीक
इन पदचिह्नों को जमीन पर उकेरते समय इनकी दिशा का खास ध्यान रखा जाता है। ये निशान हमेशा घर के मुख्य प्रवेश द्वार से शुरू होकर मंदिर या उस स्थान तक जाते हैं जहां माखन की मटकी रखी होती है। बाहर से अंदर की ओर आते हुए ये कदम इस बात का जीवंत प्रतीक होते हैं कि शरारती बाल-कृष्ण ने घर की सीमा लांघकर भीतर प्रवेश कर लिया है। इस दृश्य को देखकर हर भक्त का हृदय असीम आनंद और भक्ति भाव से भर जाता है।
पर्यावरण संरक्षण और जीव दया का संदेश
इस पुरानी परंपरा का एक गहरा व्यावहारिक और पर्यावरणीय पहलू भी जुड़ा हुआ है। सनातन संस्कृति के अनुसार चावल के आटे का उपयोग केवल सजावट के लिए नहीं होता, बल्कि इसके पीछे चींटियों और दूसरे छोटे कीटों को भोजन उपलब्ध कराने का उद्देश्य भी होता है। भारतीय दर्शन में इसे भूत दया यानी सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव कहा गया है। आज के आधुनिक युग में भी तेलंगाना के लोग अपनी इस प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति प्रेम को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं।



















