जन्माष्टमी का पवित्र त्योहार नजदीक आते ही देश भर के भक्त कान्हा की आराधना में लीन हो जाते हैं और ऐसे पावन स्थलों की तलाश करते हैं जहां जाकर वे विधि-विधान के साथ भगवान श्री कृष्ण की पूजा-अर्चना कर सकें। ऐसे श्रद्धालुओं के लिए उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला बेहद खास मायने रखता है, क्योंकि इस क्षेत्र की धरती को सीधे तौर पर महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है।
इस प्राचीन इतिहास की गवाही आज भी मेरठ मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हस्तिनापुर के अवशेष और प्राचीन स्थल देते हैं। हस्तिनापुर के इतिहास और संस्कृति पर लंबे समय से शोध कार्य कर रहे सहायक प्रोफेसर प्रियंक भारती के अनुसार, हस्तिनापुर और किला परीक्षितगढ़ के चप्पे-चप्पे में भगवान श्री कृष्ण की उपस्थिति महसूस की जाती है। इस क्षेत्र में कई ऐसे मंदिर और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं जिनके बारे में जनश्रुतियां और किंवदंतियां कहती हैं कि इनका सीधा नाता भगवान श्री कृष्ण के जीवनकाल से रहा है।
जब आप मेरठ के महाभारत कालीन हस्तिनापुर क्षेत्र में पहुंचेंगे और वहां स्थित प्रसिद्ध द्रौपदी मंदिर के दर्शन करेंगे, तो आपको एक बेहद खास और आध्यात्मिक माहौल देखने को मिलेगा। इस प्राचीन द्रौपदी मंदिर में भगवान श्री कृष्ण भी पूरी भव्यता के साथ विराजमान हैं। यह मंदिर महाभारत काल की उस मार्मिक घटना यानी चीरहरण की दास्तान को जीवंत करता है, जब भरी सभा में द्रौपदी द्वारा भगवान श्री कृष्ण का आह्वान किया गया था और कान्हा ने अपनी असीम कृपा से उनकी लाज बचाई थी।
इसी तरह का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व किला परीक्षितगढ़ का भी बताया जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जब महाभारत का विनाशकारी युद्ध टालने के लिए सभी प्रयास किए जा रहे थे, तब उस युद्ध को रुकवाने के वास्ते भगवान श्री कृष्ण ने भी अपनी ओर से कई महत्वपूर्ण प्रयास किए थे। इसी शांति प्रयास के सिलसिले में वे किला परीक्षितगढ़ में स्थित गांधारी तालाब के समीप भी पहुंचे थे। किंवदंती है कि उन्होंने वहां रात्रि विश्राम किया था और कौरवों तथा पांडवों के बीच संधि कराने की दिशा में विमर्श किया था। हालांकि वर्तमान समय में उस स्थान पर एक प्राचीन शिव मंदिर स्थापित है और वह ऐतिहासिक पेड़ भी आज भी वहां मौजूद है जो उस काल की गवाही देता है।
मेरठ छावनी क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर की अपनी एक अलग महिमा है, जहां भगवान श्री राधा कृष्ण भी विराजमान हैं। इस मंदिर के प्रति स्थानीय निवासियों और दूर-दूर से आने वाले भक्तों में अगाध श्रद्धा और आस्था देखने को मिलती है। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर इस मंदिर को देश और विदेश से मंगवाए गए विभिन्न प्रकार के सुगंधित फूलों से बेहद भव्य तरीके से सजाया जाता है। जो भी श्रद्धालु यहां आकर भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के चरणों में शीश झुकाते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस पावन पर्व पर यहां एक विशेष परंपरा के तहत चांदी के एक सुंदर पालने में भगवान श्री लड्डू गोपाल को झुलाया जाता है।
भक्तों और भगवान श्री कृष्ण के बीच का रिश्ता हमेशा से अनूठा और प्रेम से परिपूर्ण रहा है। इसी अनूठे रिश्ते की खूबसूरत बयां करती है बुढ़ाना गेट पर स्थित श्री बालाजी का मंदिर, जहां भगवान श्री राधा कृष्ण की प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर कार्य समिति के पदाधिकारी डॉ. गौरव पाठक के अनुसार, इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण और राधा मैया की चांदी की मूर्ति की स्थापना के लिए उनकी दादी ने अपने सारे गहने बेच दिए थे, ताकि वे अपने आराध्य की प्रतिमा स्थापित करवा सकें। यही कारण है कि आज भी इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है और उनकी विशेष आस्था यहां देखने को मिलती है।
मेरठ सर्राफा बाजार में स्थित भगवान श्री कृष्ण के मंदिर के प्रति भी भक्तों की गहरी निष्ठा है। सर्राफा व्यापारी समुदाय के लोग हर साल यहां अत्यंत धूमधाम और उल्लास के साथ जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाते हैं। इस स्थान पर पूजा-अर्चना का तरीका भी बेहद अनूठा होता है। कभी भगवान श्री कृष्ण को कीमती चांदी और हीरों से जड़े मुकुट पहनाए जाते हैं, तो कभी उनका अद्भुत और मनमोहक श्रृंगार किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से जो भी भक्त यहां अपनी झोली फैलाता है, उसे भगवान सब कुछ प्रदान करते हैं।
इसके अलावा शहर में इस्कॉन संस्था के धार्मिक आयोजनों और मंदिरों के प्रति भी भक्तों में भारी उत्साह और श्रद्धा नजर आती है। यहां आने वाले श्रद्धालु हरे रामा हरे कृष्णा महामंत्र की धुन पर झूमते और थिरकते हुए दिखाई देते हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मेरठ के शास्त्री नगर इलाके में भी इस्कॉन द्वारा भगवान श्री कृष्ण का एक भव्य मंदिर स्थापित किया गया है। यहां भी रोजाना और विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां पूरी तरह से इस्कॉन पद्धति और नियमों के अनुसार ही भगवान की सेवा और पूजा-अर्चना संपन्न कराई जाती है।


















