मध्य प्रदेश के खंडवा जिले सहित संपूर्ण निमाड़ अंचल में रक्षाबंधन का त्योहार केवल कलाई पर रेशम की डोर बांधने तक सीमित नहीं है। इस पावन अवसर पर खान-पान की एक बेहद पुरानी और अनोखी परंपरा जुड़ी हुई है, जिसके बिना राखी की खुशियां अधूरी मानी जाती हैं। निमाड़ के गांवों और कस्बों में रक्षाबंधन आते ही हर घर की रसोई में एक खास पारंपरिक मिठाई बनाई जाती है, जिसे स्थानिक भाषा में चकती कहा जाता है। बाज़ार में मिलने वाली रेडीमेड मिठाइयों के इस दौर में भी चकती का महत्व कम नहीं हुआ है, क्योंकि इसे बाज़ार से खरीदकर लाने के बजाय घर में ही परिवार की महिलाएं मिलकर तैयार करती हैं।
निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान और चकती का विशेष महत्व
रक्षाबंधन का पर्व नजदीक आते ही निमाड़ के अधिकांश घरों में चकती बनाने की तैयारियां पूरे उत्साह के साथ शुरू हो जाती हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, राखी का उत्सव तब तक रंग नहीं पकड़ता जब तक कि घर में चकती की सोंधी खुशबू न फैल जाए। वैसे तो पूरा साल यह मिठाई आमतौर पर देखने या खाने को नहीं मिलती, लेकिन श्रावण मास के इस विशेष त्योहार पर इसकी मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती है। घर के बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक, हर कोई इस खास व्यंजन का बेसब्री से इंतजार करता है।
चकती बनाने की मुख्य सामग्रियां और शुरुआती मिश्रण
स्वाद और सेहत से भरपूर चकती को तैयार करने के लिए रसोई में इस्तेमाल होने वाली साधारण लेकिन शुद्ध सामग्रियों की आवश्यकता होती है। इसमें मुख्य रूप से रवा, गेहूं का आटा, शुद्ध मावा, चीनी की चाशनी, घी और सूखा नारियल यानी खोपरा शामिल होते हैं। चकती बनाने की शुरुआत सबसे पहले चाशनी तैयार करने से होती है। एक बड़े बर्तन में चीनी और पानी का सही अनुपात मिलाकर गाढ़ी चाशनी बनाई जाती है। इसके बाद इसमें पहले से तैयार किया गया ताजा मावा मिलाया जाता है और दोनों को अच्छी तरह से एकसार होने तक घोला जाता है।
पकाने की विधि और सही बनावट हासिल करने का तरीका
चाशनी और मावे के घोल में भुना हुआ रवा और थोड़ा आटा मिलाया जाता है। इसके बाद इस पूरे मिश्रण को हल्की से मध्यम आंच पर लगातार चलाते हुए पकाया जाता है। इस दौरान मिश्रण को लगातार चलाना बहुत जरूरी होता है ताकि बर्तन के तले में यह जले नहीं और मिठाई की सही मिठास तथा दानेदार बनावट तैयार हो सके। जब मिश्रण पूरी तरह से गाढ़ा होकर बर्तन छोड़ने लगता है और एक सही रंगत में आ जाता है, तब इसे आंच से उतार लिया जाता है।
थाली में जमाने की खास तकनीक और खोपरे का दोहरा स्वाद
चकती को सही आकार देने और ज़माने के लिए एक बड़ी थाली का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले थाली के तल पर देसी घी की एक पतली परत लगाई जाती है, ताकि मिठाई चिपकने न पाए। इसके बाद थाली के निचले हिस्से में कद्दूकस किया हुआ सूखा नारियल बिछा दिया जाता है। फिर गरम तैयार मिश्रण को थाली में डालकर समान रूप से फैलाया जाता है और ऊपर से दोबारा नारियल का बुरादा डाला जाता है। पूरी तरह ठंडा होने के बाद इसे चाकू की मदद से अपनी पसंद के चौकोर या बर्फी के आकार में काट लिया जाता है। यही कारण है कि मावे की मिठास के साथ नारियल की मौजूदगी चकती को एक अलग पहचान देती है।
सुरंगांव जोशी की पिंकी पटेल ने साझा किया अपना अनुभव
खंडवा अंचल के सुरंगांव जोशी गांव की रहने वाली पिंकी पटेल बताती हैं कि चकती बनाना कोई 5 मिनट का झटपट काम नहीं है। इसे तैयार करने में काफी समय, धैर्य और मेहनत लगती है। मिठाई बनाने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले घर पर ही दूध औटाकर मावा तैयार किया जाता है, जिसके बाद चकती का काम आगे बढ़ता है। पिंकी पटेल के अनुसार, इतनी मेहनत लगने के बावजूद हर साल रक्षाबंधन पर चकती बनाने की परंपरा को निमाड़ का हर परिवार पूरी निष्ठा के साथ निभाता है।
मेहमाननवाज़ी और राखी के पावन पर्व का पारंपरिक अंदाज
रक्षाबंधन के दिन जब बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं, तो उनका मुंह इसी गृहनिर्मित चकती से मीठा कराया जाता है। इसके अलावा, त्योहार के मौके पर घर आने वाले मेहमानों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के सामने भी चकती को विशेष रूप से परोसा जाता है। बाज़ार की व्यावसायिक मिठाइयों की तुलना में घर में बनी चकती का स्वाद और इसमें घुला पारिवारिक अपनापन निमाड़ की रक्षाबंधन परंपरा को आज भी जीवंत बनाए हुए है।



















