अगस्त 2026 के अंत में आसमान में एक अद्भुत खगोलीय घटना घटने जा रही है, जब पृथ्वी की गहरी छाया चंद्रमा के अधिकांश हिस्से को ढक लेगी। यह एक आंशिक चंद्र ग्रहण होगा, जो लगभग पूर्ण चंद्र ग्रहण जैसा नजर आएगा। इस दौरान चंद्रमा का रंग बदलकर हल्का लाल और नारंगी हो जाएगा। दुनिया के कई महाद्वीपों में फैले खगोल प्रेमी इस नजारे का दीदार कर सकेंगे। हालांकि, समय की गणना के कारण भारत में मौजूद लोग इस अद्भुत दृश्य को सीधे आसमान में नहीं देख पाएंगे, क्योंकि उस दौरान भारत में दिन का समय होगा।
चंद्र ग्रहण का दायरा और वैज्ञानिक आंकड़े
वैज्ञानिक दृष्टि से यह घटना आंशिक चंद्र ग्रहण की श्रेणी में रखी गई है, लेकिन यह पूर्ण ग्रहण के बेहद करीब पहुंचेगी। अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आंकड़ों के अनुसार, अधिकतम ग्रहण के दौरान चंद्रमा के व्यास का लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा पृथ्वी की सबसे गहरी और काली छाया, जिसे अंबर या अमरा कहा जाता है, में प्रवेश कर जाएगा। वहीं, कुछ अन्य खगोलीय गणनाओं से संकेत मिलता है कि चंद्रमा के कुल सतह क्षेत्र का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा इस काली छाया के भीतर रहेगा। चूंकि चंद्रमा का एक बहुत बड़ा हिस्सा ढका रहेगा, इसलिए आम दर्शकों को यह दृश्य किसी पूर्ण चंद्र ग्रहण से कम नजर नहीं आएगा।
समय, अवधि और वैश्विक दृश्यता की जानकारी
समय क्षेत्र के हिसाब से यह चंद्र ग्रहण 27 और 28 अगस्त 2026 की तिथियों को कवर करेगा। समन्वित सार्वभौमिक समय यानी UTC के अनुसार, यह घटना 28 अगस्त 2026 को घटित होगी। हालांकि, पश्चिमी गोलार्ध के कई क्षेत्रों में ग्रहण की शुरुआत 27 अगस्त की रात से ही हो जाएगी और यह 28 अगस्त के शुरुआती घंटों तक जारी रहेगी। नासा के समय सारणी के मुताबिक, ग्रहण का चरम बिंदु यानी मैक्सिमम फेज 28 अगस्त को UTC समय 04:14 पर होगा। यह आंशिक चंद्र ग्रहण तीन घंटे से भी अधिक समय तक बना रहेगा, जिससे खगोल प्रेमियों को इसे देखने का पर्याप्त अवसर मिलेगा।
दृश्यता के लिहाज से यह चंद्र ग्रहण मुख्य रूप से पश्चिमी गोलार्ध और उससे सटे इलाकों में साफ दिखाई देगा। उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग इस घटना को आसानी से देख सकेंगे। इसके विपरीत, भारत में भारतीय मानक समय यानी IST के अनुसार ग्रहण का चरम समय 28 अगस्त की सुबह लगभग 9:44 बजे होगा। इस समय भारत में सूर्योदय हो चुका होगा और चंद्रमा क्षितिज से नीचे जा चुका होगा। दिन का उजाला होने के कारण अगस्त 2026 का यह चंद्र ग्रहण भारत से दिखाई नहीं देगा।
चंद्र ग्रहण की प्रक्रिया और 'ब्लड मून' का रहस्य
चंद्र ग्रहण तब घटित होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीधी रेखा में आ जाते हैं और पृथ्वी बीच में स्थित होकर सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा तक पहुंचने से रोकती है। इससे अंतरिक्ष में पृथ्वी की एक लंबी छाया बनती है। पृथ्वी की छाया के दो मुख्य भाग होते हैं: हल्का बाहरी हिस्सा जिसे पेनम्ब्रा कहा जाता है और गहरा केंद्रीय हिस्सा जिसे अंबर या अमरा कहा जाता है। पूर्ण चंद्र ग्रहण में पूरा चंद्रमा अमरा में समा जाता है, जबकि आंशिक ग्रहण में चंद्रमा का कुछ हिस्सा ही इसमें प्रवेश करता है। इस बार लगभग 93 से 96 प्रतिशत हिस्सा अमरा में रहेगा।
ग्रहण के दौरान चंद्रमा कई बार हल्के लाल, तांबे जैसे या नारंगी रंग का दिखाई देने लगता है, जिसे आम बोलचाल में 'ब्लड मून' कहा जाता है। इसका कारण पृथ्वी का वायुमंडल है। जब सूर्य की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरती हैं, तो नीले रंग का प्रकाश बिखर जाता है, जबकि लाल और नारंगी रंग की तरंगे मुड़कर पृथ्वी की छाया क्षेत्र में पहुंच जाती हैं। यही लाल रोशनी चंद्रमा की सतह से परावर्तित होकर हमें लाल रंग में दिखाई देती है। अगस्त 2026 के ग्रहण में चंद्रमा कितना लाल दिखेगा, यह उस समय वायुमंडल में मौजूद धूल, बादलों और प्रदूषण के कणों पर निर्भर करेगा।
देखने के लिए सुरक्षा और सावधानियां
उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के जिन क्षेत्रों में यह चंद्र ग्रहण दिखाई देगा, वहां के लोग इसे बिना किसी विशेष चश्मे या उपकरण के सीधे नग्न आंखों से देख सकते हैं। सूर्य ग्रहण के विपरीत, चंद्र ग्रहण को देखना आंखों के लिए पूरी तरह सुरक्षित होता है क्योंकि इसमें कोई हानिकारक किरणें नहीं निकलती हैं। इसमें केवल पृथ्वी की छाया का प्रभाव होता है।
यदि दर्शक चाहें तो बाइनोकुलर या छोटे टेलीस्कोप की मदद से चंद्रमा के क्रेटर और उस पर धीरे-धीरे आगे बढ़ती पृथ्वी की काली छाया के किनारों को और अधिक स्पष्टता तथा बारीकी के साथ देख सकते हैं।



















