सौरमंडल से बाहर की दुनिया की खोज में वैज्ञानिकों को एक अभूतपूर्व कामयाबी हासिल हुई है। खगोलविदों ने ब्रह्मांड में अब तक के सबसे कम उम्र के ग्रह की औपचारिक पुष्टि कर दी है। इस नवजात खगोलीय पिंड का नाम एलियास 2-24बी रखा गया है। यह असाधारण खोज केवल उम्र के नए रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने विशालकाय गैसीय ग्रहों के निर्माण से जुड़े दशकों पुराने स्थापित सिद्धांतों और वैज्ञानिक मान्यताओं को भी सीधी चुनौती दे दी है।
प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क की धूल में छिपे ग्रहों की तलाश
आज तक विज्ञान जगत लगभग 6,000 एक्सोप्लैनेट्स यानी हमारे सौरमंडल से बाहर के ग्रहों की पुष्टि कर चुका है। इनमें से अधिकांश ग्रहों की आयु अरबों वर्ष आंकी गई है। ऐसा नहीं है कि अंतरिक्ष में युवा ग्रहों का अस्तित्व नहीं है, बल्कि पुरानी और परिपक्व दुनिया को खोजना मौजूदा तकनीकों से अपेक्षाकृत काफी आसान होता है। खगोलशास्त्री आमतौर पर ट्रांजिट तकनीक का सहारा लेते हैं, जिसमें जब कोई ग्रह अपने मूल तारे के सामने से गुजरता है, तो तारे की चमक में आने वाली हल्की सी गिरावट को दर्ज करके ग्रह का पता लगाया जाता है।
इसके विपरीत, हाल ही में आकार लेने वाले नए ग्रह गैस और धूल के घने छल्लों में दबे रहते हैं। किसी ग्रह के बनने के बाद बची हुई निर्माण सामग्री के इन बादलों को प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क कहा जाता है। ऐसे घने मलबे के बीच किसी नए खगोलीय पिंड को सीधे देखना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। चिली की डिएगो पोर्टेल्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एंड्रिया बर्नार्डी के नेतृत्व में शोध दल ने इस कठिन काम को अंजाम दिया। टीम ने सात प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जिनमें घने मलबे के बीच साफ अंतराल या खाली जगह दिखाई दे रही थी। खगोल विज्ञान में यह माना जाता है कि जब कोई विकासशील ग्रह अपनी कक्षा में घूमता है, तो वह अपने गुरुत्वाकर्षण से आसपास के मलबे को साफ करके ऐसे खाली रास्ते बना देता है।
कोरोनोग्राफ डेटा और दशकों पुरानी बहस का अंत
शोधकर्ताओं ने इसके लिए कोरोनोग्राफ डेटा का नए सिरे से विश्लेषण किया। इस तकनीक में केंद्रीय तारे की तेज रोशनी को कृत्रिम रूप से रोक दिया जाता है, जिससे उसके आसपास मौजूद खगोलीय पिंडों से आने वाला बहुत धुंधला परावर्तित प्रकाश भी साफ नजर आने लगता है। वैज्ञानिक एलियास 2-24 नामक तारे की धूल भरी डिस्क में मौजूद इस अंतर से करीब एक दशक से परिचित थे।
यूरोपियन साउदर्न ऑब्जर्वेटरी के वेरी लार्ज टेलीस्कोप ने सबसे पहले इस खाली जगह के भीतर प्रकाश का एक छोटा बिंदु दर्ज किया था। इसके बाद वैज्ञानिक समुदाय में इस बात पर लंबी बहस छिड़ गई थी कि क्या वह चमक वास्तव में एक ग्रह है या केवल कोई भ्रम। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए शोध दल ने हवाई स्थित डब्लू.एम. केक ऑब्जर्वेटरी से 2018 और 2020 में जुटाए गए आंकड़ों की तुलना की। कई वर्षों के अंतराल में उस चमकदार बिंदु की स्थिति और गति का बारीकी से अध्ययन किया गया। अंततः वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि वह चमकदार बिंदु पृष्ठभूमि का कोई असंबंधित तारा या टेलीस्कोप के उपकरणों की तकनीकी खराबी नहीं था, बल्कि वह तारा एलियास 2-24 के गुरुत्वाकर्षण से मजबूती से बंधा एक वास्तविक ग्रह है।
विशाल आकार और बेहद कम उम्र का चौंकाने वाला तालमेल
वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार, एलियास 2-24बी हमारे ग्रह पृथ्वी से लगभग 450 प्रकाश वर्ष की दूरी पर मौजूद है। यह अपने तारे से लगभग 55 खगोलीय इकाइयों (एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट्स) की दूरी पर चक्कर लगाता है। एक खगोलीय इकाई पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी के बराबर होती है। ग्रह के द्रव्यमान का अनुमान बृहस्पति की तुलना में अधिकतम 1.9 से 4.0 गुना के बीच लगाया गया है, हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका कुल आयतन हमारे सौरमंडल के विशाल गैसीय ग्रह बृहस्पति से काफी कम हो सकता है।
क्योंकि इसका मूल तारा 10 लाख वर्ष से भी कम पुराना है, इसलिए एलियास 2-24बी की उम्र भी इसी के आसपास आंकी गई है। इससे पहले सीधे अवलोकन से पुष्टि किए गए सबसे युवा एक्सोप्लैनेट्स पीडीएस 70 और विस्पिट 2 तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रह थे, जो दोनों 50 लाख वर्ष से अधिक पुराने हैं। एलियास 2-24बी ने इस पुराने रिकॉर्ड को एक बहुत बड़े अंतर से तोड़ दिया है।
कोर एक्रीशन मॉडल के सामने नई वैज्ञानिक पहेली
इस खोज ने ग्रहों के निर्माण की मानक थ्योरी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यधारा के सिद्धांतों में एक प्रमुख मान्यता कोर एक्रीशन मॉडल है। इसके अनुसार, विशालकाय ग्रह तब बनते हैं जब पहले एक ठोस चट्टानी कोर धीरे-धीरे बड़ा होता है और फिर अपने मजबूत गुरुत्वाकर्षण से आसपास की गैस को अपनी ओर खींचना शुरू करता है। नासा के अनुसार, बृहस्पति के आकार का ग्रह बनने में लगभग 50 लाख वर्ष का समय लगना चाहिए, वह भी तब जब वह सूर्य से करीब 5 खगोलीय इकाई की दूरी पर हो। एलियास 2-24बी जैसी अत्यंत दूरस्थ कक्षा वाले ग्रह के लिए, जो अपने तारे से 55 खगोलीय इकाई दूर है, इतनी भारी सामग्री और गैस जुटाने में सामान्य गणना के मुताबिक कहीं अधिक समय लगना चाहिए था।
मगर एलियास 2-24बी इन पारंपरिक नियमों को नकारता दिख रहा है। अपने तारे से अत्यधिक दूरी पर होने के बावजूद, यह केवल 10 लाख वर्षों की आश्चर्यजनक रूप से छोटी अवधि में एक पूर्ण और विशालकाय ग्रह का रूप ले चुका है। शोध दल का मानना है कि इस ग्रह की रचना कोर एक्रीशन के जरिए ही हुई होगी, जिसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि यह प्रक्रिया हमारे पहले के अनुमानों की तुलना में कई गुना तेज गति से भारी ग्रहों को जन्म दे सकती है। डिएगो पोर्टेल्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और इस शोध पत्र के सह-लेखक लुकास सिएसा ने इस संदर्भ में कहा कि एलियास 2-24बी हमें दिखाता है कि हमारे बेहतरीन ग्रह-निर्माण मॉडलों में अभी भी कुछ महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं की कमी है।
रोमन स्पेस टेलीस्कोप से खुलेगा नए युग का द्वार
इन खगोलीय मॉडलों को बेहतर ढंग से समझने के लिए वैज्ञानिकों को और अधिक युवा ग्रहों की खोज करने की आवश्यकता है, और भविष्य की तकनीकें इस दिशा में नए रास्ते खोल रही हैं। नासा द्वारा इसी वर्ष अगस्त में प्रक्षेपित किया गया नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप एक अत्यंत शक्तिशाली कोरोनोग्राफ से लैस है, जो एलियास 2-24बी को खोजने में प्रयुक्त उपकरण से कहीं अधिक सक्षम है। खगोलविदों को पूरी उम्मीद है कि इस नए टेलीस्कोप की मदद से तारों की चकाचौंध में छिपे कई अन्य नवजात ग्रहों का शीघ्र ही पता लगाया जा सकेगा। सिएसा ने आगे कहा कि यह खोज के एक नए युग की शुरुआत भर है, और आधुनिक तकनीक से ग्रह निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया को सीधे देखना अद्भुत है।



















