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ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से नाम गायब होने पर सुनवाई से मना नहीं कर सकता चुनाव आयोग, बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त रुखभारत
5 अक्तू॰ 2026, 11:33 pm (24 मिनट पहले)· 1

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से नाम गायब होने पर सुनवाई से मना नहीं कर सकता चुनाव आयोग, बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त रुख

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल ड्राफ्ट लिस्ट में नाम न होने के आधार पर किसी भी पात्र नागरिक को मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान तैयार होने वाली मतदाता सूची को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने बेहद महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी पात्र भारतीय नागरिक का नाम पुनरीक्षण के तहत बनी ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाता, तो वह गंभीर कानूनी और प्रशासनिक असमंजस में पड़ सकता है। अदालत के अनुसार, चुनाव आयोग पुरानी मतदाता सूची को नजरअंदाज करके नागरिकों की जायज शिकायतों को खारिज नहीं कर सकता। किसी भी पात्र व्यक्ति को सिर्फ इस तकनीकी आधार पर मतदान के अधिकार की प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता कि उसका नाम प्राथमिक ड्राफ्ट में दर्ज नहीं है। यदि कोई व्यक्ति वोट डालने की कानूनी योग्यता रखता है, तो निर्वाचन तंत्र का दायित्व बनता है कि उसकी बात अनिवार्य रूप से सुनी जाए।

सालगांवकर परिवार की याचिका पर उच्च न्यायालय में तीखी बहस

यह पूरा मामला जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए पहुंचा था। गोवा निवासी परेश सालगांवकर और उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने अदालत में एक रिट याचिका दायर की थी। इस याचिका में उन्होंने बताया कि एसआईआर अभियान के दौरान उनका और उनके परिजनों का नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में दर्ज नहीं किया गया। मामले की कानूनी बारीकियों को परखते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि यदि निर्वाचन आयोग किसी नागरिक को कोई नोटिस जारी करता है और जवाब में नागरिक यह सूचित करता है कि उसने अपना निवास स्थान बदल लिया है तथा वह फॉर्म-8 भरकर विवरण अपडेट करना चाहता है, तो आयोग उसकी सुनवाई करने से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

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अदालत ने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था का हवाला देकर किसी नागरिक की अर्जी खारिज करना कानूनन गलत है। आयोग यह दलील नहीं दे सकता कि मौजूदा सिस्टम इसकी अनुमति नहीं देता या नागरिक का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, इसलिए उसकी बात नहीं सुनी जाएगी। नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए इस तरह की प्रक्रियागत बाधाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 की वास्तविक व्याख्या

पीठ ने इस कानूनी पहलू की गहराई से व्याख्या करते हुए जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 का विशेष उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून की इस धारा में जिस मतदाता सूची का प्रावधान किया गया है, उसका सीधा आशय वर्तमान में लागू यानी मौजूदा सूची से है, न कि केवल अस्थाई ड्राफ्ट सूची से। खंडपीठ का मानना था कि मतदाता सूची संशोधन की समूची व्यवस्था को मौजूदा सूची के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाना अत्यंत आवश्यक है। यदि निर्वाचन तंत्र इस सिद्धांत का पालन नहीं करता, तो आम नागरिक के पास अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी बात रखने का कोई सार्थक या प्रभावी मंच नहीं बचेगा।

अदालत ने यह गंभीर आशंका भी जताई कि यदि किसी नागरिक का नाम ड्राफ्ट सूची से छूट जाता है, तो व्यवहार में इसका सीधा परिणाम यह हो सकता है कि वह व्यक्ति मौजूदा मतदाता सूची से भी पूरी तरह बाहर कर दिया जाए। यह स्थिति किसी भी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार को छीनने के समान होगी, जिसे अदालत कतई सही नहीं मानती।

बीएलओ की ड्यूटी और पात्र नागरिकों को शामिल करने की अनिवार्यता

अदालत ने पुनरीक्षण से जुड़े आधिकारिक दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए बूथ स्तर के अधिकारियों यानी बीएलओ की कार्यप्रणाली पर भी अपनी बात रखी। खंडपीठ ने रेखांकित किया कि बीएलओ को सौंपी गई नियमित जिम्मेदारियों के अतिरिक्त प्रशासन को यह हर हाल में सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी वैध नागरिक का नाम छूटने न पाए। एसआईआर के आदेशों की मूल भावना यही है कि सूची में केवल और केवल योग्य नागरिकों के नाम दर्ज हों, लेकिन इस प्रक्रिया की आड़ में किसी वास्तविक नागरिक का बाहर हो जाना अस्वीकार्य है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग से सीधा सवाल किया कि यदि इस जटिल प्रशासनिक कवायद के चलते ही पात्र नागरिक मतदाता सूची से बाहर हो जाएंगे, तो इस बुनियादी भूल को सुधारने का क्या उपाय होगा। चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए अधिवक्ता गौरीश अग्नि ने दलील दी कि आयोग के दिशा-निर्देशों के तहत पुरानी मतदाता सूची अभी भी प्रभावी है। उन्होंने अदालत को बताया कि जब कोई मतदाता एक विधानसभा क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाता है, तो उसके पास फॉर्म-8 जमा करके नए पते पर अपना नाम स्थानांतरित कराने की पूरी सुविधा रहती है। इसके माध्यम से वह अपने वोटर आईडी यानी ईपीआईसी में भी आवश्यक सुधार करवा सकता है।

अदालत का स्पष्ट संदेश और आगे की कानूनी कार्यवाही

चुनाव आयोग की दलीलों के बावजूद बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस बात पर निरंतर जोर दिया कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया ऐसी संवेदनशील और पारदर्शी होनी चाहिए जिससे किसी भी योग्य मतदाता का नाम न कटे। अदालत ने कहा कि एसआईआर के सभी दिशा-निर्देशों को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए, ताकि उनका मूल उद्देश्य सफल हो सके। इस मामले में वकीलों की बहस अभी अधूरी है और हाईकोर्ट ने मंगलवार को भी मामले की सुनवाई जारी रखने का निर्देश दिया है।

सवाल-जवाब

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने चुनाव आयोग को लेकर क्या टिप्पणी की?
अदालत ने कहा कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, तब भी चुनाव आयोग उसकी शिकायत सुनने से इनकार नहीं कर सकता।
यह याचिका किसने और क्यों दायर की थी?
गोवा के परेश सालगांवकर और उनके परिवार ने यह याचिका दायर की थी क्योंकि एसआईआर के दौरान उनका नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हुआ था।
जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 के बारे में अदालत ने क्या कहा?
पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 21 में उल्लिखित मतदाता सूची का मतलब मौजूदा वैध सूची से है, न कि सिर्फ अस्थाई ड्राफ्ट सूची से।
घर बदलने पर मतदाता अपने क्षेत्र की सूची में नाम कैसे ट्रांसफर करा सकते हैं?
चुनाव आयोग के वकील के अनुसार, मतदाता फॉर्म-8 भरकर अपने नए विधानसभा क्षेत्र में नाम ट्रांसफर करा सकते हैं और वोटर आईडी में जरूरी बदलाव कर सकते हैं।
हाईकोर्ट की इस बेंच में कौन से जज शामिल थे?
इस मामले की सुनवाई जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ कर रही थी।
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