मलेरिया से मुक्ति पाने की वैश्विक लड़ाई में भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं को एक बड़ी सफलता हासिल हुई है। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, मलेरिया फैलाने वाले परजीवी प्लाज्मोडियम वाइवैक्स के शरीर के भीतर एक विशेष एंजाइम Ark1 पाया गया है, जो इसकी कोशिकाओं के विभाजन और प्रसार को संचालित करने वाला मुख्य नियंत्रण स्विच है। दिल्ली स्थित एनआईआई और नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर इस आणविक प्रक्रिया की पहचान की है। इस खोज से मलेरिया के परजीवियों को शरीर के भीतर ही नष्ट करने वाली अगली पीढ़ी की सटीक दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
दस हजार साल पुरानी बीमारी और वैश्विक चुनौतियों का इतिहास
मलेरिया का इतिहास मानव सभ्यता के लिए बेहद चिंताजनक रहा है। वैज्ञानिक साक्ष्यों के मुताबिक यह बीमारी 10 हजार साल से भी अधिक पुरानी है। भारत में एक दौर ऐसा भी था जब मलेरिया के कारण हर साल लगभग 83 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती थी। यद्यपि स्वास्थ्य मानकों में सुधार के कारण भारत में स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई है, फिर भी वैश्विक स्तर पर मलेरिया आज भी एक जानलेवा चुनौती बना हुआ है। दुनिया भर में हर साल करीब 8 लाख लोगों की मौत मलेरिया संक्रमण के कारण हो जाती है। ऐसे समय में जब पारंपरिक दवाएं निष्प्रभावी साबित हो रही हैं, परजीवी की कोशिका संरचना की यह नई समझ बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
Ark1 एंजाइम कैसे बढ़ाता है परजीवी का संक्रमण
मलेरिया का फैलाव मुख्य रूप से प्लाज्मोडियम वाइवैक्स नामक परजीवी के माध्यम से होता है। यह परजीवी सबसे पहले मच्छर के शरीर में प्रवेश करता है। जब संक्रमित मच्छर किसी स्वस्थ इंसान को काटता है, तो यह परजीवी मानव रक्तप्रवाह में पहुंच जाता है। मानव शरीर में पहुंचते ही इसकी कोशिकाएं अत्यंत तीव्र गति से विभाजित होने लगती हैं। कुछ ही सेकेंड के भीतर एक परजीवी से लाखों नए परजीवी बन जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस तीव्र कोशिका विभाजन की गुत्थी को सुलझाते हुए पाया कि इंसान और मच्छर दोनों के भीतर प्लाज्मोडियम के तेजी से बढ़ने के पीछे Ark1 एंजाइम की केंद्रीय भूमिका होती है। यह एंजाइम परजीवी की वृद्धि को नियंत्रित करने वाला मुख्य जैविक बटन है।
अल्ट्रा एक्सपेंशन माइक्रोस्कोपी तकनीक से मिली देखने में सफलता
शोधकर्ताओं के अनुसार यदि किसी प्रकार Ark1 एंजाइम के प्रभाव को दवा के जरिए ब्लॉक कर दिया जाए, तो परजीवी का बढ़ना और विभाजन पूरी तरह रुक जाएगा। यह कार्यप्रणाली ठीक उसी तरह काम करेगी जैसे मौजूदा समय में कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने वाले प्रोटीन को रोकने वाली दवाएं काम करती हैं। हालांकि इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों को एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती का सामना करना पड़ा। प्लाज्मोडियम परजीवी का आकार इंसान के बाल से लगभग 50 से 100 गुना छोटा होता है, जो 1 माइक्रोन से भी कम है। इतने सूक्ष्म आकार के कारण जब Ark1 एंजाइम को निष्पादित किया गया, तो परजीवी के भीतर की गतिविधियों को देखना बेहद कठिन था।
इस सूक्ष्म अवलोकन की समस्या का समाधान नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज की आणविक परजीवी वैज्ञानिक प्रो. रीटा तेवारी के नेतृत्व वाली शोध टीम ने निकाला। उनकी टीम ने अत्याधुनिक अल्ट्रा एक्सपेंशन माइक्रोस्कोपी तकनीक का प्रयोग किया। प्रो. रीटा तेवारी ने बताया, "हमने अल्ट्रा एक्सपेंशन माइक्रोस्कोपी तकनीक का उपयोग किया, जिसमें कोशिकाओं का आकार सामान्य अवस्था से लगभग पांच गुना तक बढ़ा दिया जाता है।" इस भौतिक विस्तार के कारण Ark1 को हटाने के बाद परजीवी पर पड़े प्रभाव को वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया।
दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध के बीच नई उम्मीद
वर्तमान समय में मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक दवाएं लगातार निष्प्रभावी हो रही हैं। एनआईआई के वैज्ञानिक डॉ. पुष्कर शर्मा ने बताया, "सबसे पहले क्लोरोक्विन के प्रति प्रतिरोध के संकेत मिले थे और अब आर्टेमिसिनिन के प्रति भी प्रतिरोध देखने को मिल रहा है।" इसी कारण नई और अधिक प्रभावी मलेरिया रोधी दवाओं की तत्काल आवश्यकता महसूस की जा रही थी। डॉ. पुष्कर शर्मा के अनुसार, विभिन्न बीमारियों के इलाज में प्रोटीन और लिपिड काइनेज ऐसे प्राथमिक लक्ष्य माने जाते हैं जिन पर प्रभावी दवाएं विकसित की जा सकती हैं। Ark1 भी एक ऐसा ही मजबूत संभावित लक्ष्य साबित हुआ है, जिसे निशाना बनाकर मलेरिया परजीवी की वृद्धि पर पूरी तरह अंकुश लगाया जा सकता है।



















