भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और मारक क्षमता को मजबूत करने की नींव पिछली शताब्दी के नौवें दशक में रखी गई थी। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन यानी डीआरडीओ के नेतृत्व में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम की शुरुआत की गई, जिसके तहत पांच प्रमुख मिसाइलों पर काम शुरू हुआ। इस महत्वाकांक्षी योजना में अग्नि, पृथ्वी, आकाश, त्रिशूल और नाग जैसी मिसाइलें शामिल थीं। इनमें सबसे पहले पृथ्वी मिसाइल ने आकार लिया और देश के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को ठोस दिशा दी। इस शुरुआती परियोजना के दौरान भारतीय वैज्ञानिकों ने प्रणोदन, मार्गदर्शन, प्रक्षेपण प्रणालियों और मिसाइल डिजाइन जैसे अहम तकनीकी पहलुओं को बारीकी से समझा, जिसका लाभ बाद के अन्य रक्षा प्रोजेक्ट्स में मिला।
25 फरवरी 1988 को रचा गया इतिहास
श्रीहरिकोटा से इस मिसाइल का पहला सफल परीक्षण 25 फरवरी 1988 को पूरा किया गया था। यह उपलब्धि केवल एक परीक्षण तक सीमित नहीं थी, बल्कि देश की रणनीतिक स्थिति में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई। उस कालखंड में बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक चुनिंदा वैश्विक महाशक्तियों के पास ही उपलब्ध थी। ऐसे में भारत द्वारा इस तकनीक को विकसित किए जाने से पड़ोसी देशों सहित पूरी दुनिया में एक कड़ा संदेश गया। शुरुआती परीक्षण के बाद इस हथियार प्रणाली को विभिन्न भौगोलिक और सामरिक परिस्थितियों में परखा गया। हर नए परीक्षण के साथ इसके मार्गदर्शन तंत्र और संचालन क्षमताओं में सुधार किया गया, जिससे इसका निशाना अत्यधिक सटीक और भरोसेमंद बन गया।
तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग संस्करणों का विकास
इस हथियार की बहुपयोगिता को देखते हुए इसे केवल एक सेना तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि तीनों अंगों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप इसके संस्करण तैयार किए गए। थल सेना के लिए पृथ्वी-1 को उतारा गया, जबकि भारतीय वायुसेना और बाद में स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के उपयोग के लिए पृथ्वी-2 को विकसित किया गया। इसके अलावा नौसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका समुद्री संस्करण लाया गया, जिसे आगे चलकर धनुष नाम से पहचाना गया। पृथ्वी-1 की मारक क्षमता करीब 150 किलोमीटर और वजन उठाने की क्षमता लगभग 1,000 किलोग्राम थी। वहीं पृथ्वी-2 की रेंज करीब 250 से 350 किलोमीटर के दायरे में थी, और नौसेना के संस्करण की रेंज भी लगभग 350 किलोमीटर निर्धारित की गई थी। समय की मांग के अनुसार डीआरडीओ ने इनमें निरंतर आधुनिक बदलाव भी किए।
दुश्मन के ठिकानों पर सीधी पकड़
थल सेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई पृथ्वी-1 को लगभग 1994 के आसपास सेवा में शामिल किया गया था। इसकी 150 किलोमीटर की रेंज और भारी पेलोड क्षमता का मुख्य उद्देश्य युद्ध के दौरान विरोधी खेमे के अहम और सामरिक ठिकानों को नेस्तनाबूद करना था। उस दौर के लिहाज से यह बहुत बड़ी सफलता थी क्योंकि इसे मोबाइल लॉन्चर के माध्यम से आसानी से सड़क मार्ग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता था। इस परिवहन सुगमता ने इसकी सामरिक उपयोगिता को कई गुना बढ़ा दिया था।
वायुसेना और सामरिक कमान के लिए उन्नत रूप
जमीनी हमलों के बाद युद्ध की बदलती रणनीतियों को देखते हुए इसके अपग्रेडेशन का सिलसिला शुरू हुआ और पृथ्वी-2 सामने आया। इसे विशेष रूप से वायुसेना और सामरिक बलों के लिए तैयार किया गया था। ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से 27 जनवरी 1996 को इसका सफल परीक्षण संपन्न हुआ था। परीक्षण के दौरान इस मिसाइल ने सभी तकनीकी और ऑपरेशनल मानदंडों को पूरी तरह से खरा उतरते हुए साबित कर दिया कि इसका उन्नत मार्गदर्शन तंत्र इसे बेहद घातक बनाता है।
समुद्री सुरक्षा के लिए धनुष की तैनाती
इस श्रृंखला का तीसरा रूप पृथ्वी-3 था जिसे धनुष के नाम से भी जाना जाता है। नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए तैयार इस प्रणाली की मदद से अब युद्धपोतों से भी मार करना संभव हो गया था। इसकी रेंज करीब 350 किलोमीटर थी और यह लगभग 500 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकती थी। इसका सफल परीक्षण 2004 में किया गया था। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, थल सेना की 155 एमएम स्वदेशी धनुष हॉवित्जर तोप और यह नौसैनिक मिसाइल दोनों अलग-अलग हथियार प्रणालियां हैं, भले ही इनके नाम में समानता हो।
ईंधन प्रणाली से जुड़ी तकनीकी चुनौतियां
प्रारंभिक दौर में इस मिसाइल श्रृंखला में लिक्विड फ्यूल प्रोपल्शन सिस्टम का उपयोग किया जाता था। यह सिंगल-स्टेज प्रणाली थी जिसमें रेड फ्यूमिंग नाइट्रिक एसिड ऑक्सीडाइजर और हाइड्राजिन आधारित ईंधन का प्रयोग होता था। हालांकि इससे अपेक्षित ऊर्जा मिलती थी, लेकिन इस तरह के अत्यधिक संक्षारक ईंधन का प्रबंधन करना आसान नहीं था। लंबे समय तक मिसाइल को युद्ध के लिए तैयार रखना और लॉन्च से पहले ईंधन भरने की लंबी प्रक्रिया अपने आप में बड़ी चुनौतियां थीं, जिन्होंने वैज्ञानिकों को भविष्य के प्रोजेक्ट्स के लिए नए विकल्पों पर सोचने के लिए प्रेरित किया।
अचूक निशाने के लिए आधुनिक मार्गदर्शन तकनीक
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी हथियार की असली ताकत उसकी रेंज के साथ उसकी सटीकता में निहित होती है। उन्नयन प्रक्रिया के दौरान इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम आधारित तकनीक जोड़ी गई। पृथ्वी-2 के मार्गदर्शन तंत्र को मैनूवरिंग ट्रेजेक्टरी से भी लैस किया गया, जिसके बाद किसी भी आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली के लिए इसे रोकना लगभग असंभव हो गया था। इसके साथ ही ट्रांसपोर्टर-इरेक्टर-लॉन्चर यानी टीईएल के उपयोग ने इसे कहीं अधिक गतिशील और दुश्मन की नजरों से छिपाने योग्य बना दिया।



















