हैदराबाद में सात मंजिला निर्माणाधीन इमारत ढही, मलबे में दबकर दो मजदूरों की मौतवैभव सूर्यवंशी के सामने लाल गेंद का नया इम्तिहान, कोच ने दिया 300 गेंदों का बड़ा चैलेंजराजस्थान में शिक्षा का हाल बेहाल, 611 स्कूलों के पास भवन नहीं तो हजारों में नहीं हैं शौचालयबिलासपुर में सजी राखी की दुकानें, बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए फैंसी वैरायटी की बहारपुणे में राहुल गांधी का छात्रों की गूंज सम्मेलन, महिलाओं की भागीदारी और राजनीतिक पाराअमित शाह ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर बुलाई हाई-लेवल समीक्षा बैठकबिलासपुर में सावन सुंदरी उत्सव का जलवा, हरे लिबास और पारंपरिक पकवानों के साथ महिलाओं ने मनाया जश्नगुजरात के कच्छ में कबाड़ उतारते वक्त फटा गाड़ी का डीजल टैंक, दो मासूमों समेत चार लोगों की मौतचंदौली में कुएं से खराब पंप निकालने उतरे चार लोगों में से तीन की मौत, एक अस्पताल में भर्तीगोविंदा की तबीयत को लेकर फैंस की बढ़ी चिंता, मुंबई के अस्पताल के बाहर उदास दिखे अभिनेता
मिस्र के रेगिस्तान में मिला प्राचीन शार्क का कब्रिस्तान, करोड़ों साल पहले समुद्र हुआ करता था अबू-तरतूर पठारविज्ञान
22 अग॰ 2026, 9:10 pm (1 घंटे पहले)· 2

मिस्र के रेगिस्तान में मिला प्राचीन शार्क का कब्रिस्तान, करोड़ों साल पहले समुद्र हुआ करता था अबू-तरतूर पठार

मिस्र के अबू-तरतूर पठार के सूखे रेगिस्तान में वैज्ञानिकों ने प्राचीन शार्क का एक कब्रिस्तान खोज निकाला है, जहां करोड़ों साल पहले एक विशाल समुद्र हुआ करता था।

मिस्र के सूखे और बंजर रेगिस्तान में वैज्ञानिकों ने एक बेहद चौंकाने वाली और ऐतिहासिक खोज की है। इजिप्ट के अबू-तरतूर पठार पर पैलियोन्टोलॉजिस्ट्स को शार्क का एक प्राचीन कब्रिस्तान हाथ लगा है। आज जहां दूर-दूर तक केवल रेत और सूखापन नजर आता है, वहां आज से करोड़ों साल पहले एक विशाल, गहरा और जीवंत महासागर हुआ करता था। क्रेटेशियस काल के दौरान अफ्रीकी महाद्वीप का उत्तरी भूभाग पूरी तरह से पानी के अंदर डूबा हुआ था। अब उसी प्राचीन महासागर की गहराई और तलहटी में द दफन अनगिनत शार्क के दांत बरामद किए गए हैं। काहिरा यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इस इलाके में गहन खुदाई करके कई बड़े रहस्यों से पर्दा उठाया है। इस खोज से साफ हो जाता है कि एक समय में यह रेगिस्तानी इलाका खूंखार और खतरनाक समुद्री शिकारियों का प्रमुख आशियाना हुआ करता था।

क्रेटेशियस काल और प्राचीन महासागर का इतिहास

हमारी पृथ्वी का वर्तमान स्वरूप वैसा नहीं है जैसा यह करोड़ों साल पहले हुआ करता था। क्रेटेशियस काल के दौरान हमारी धरती का जलवायु और पर्यावरण आज की तुलना में बिल्कुल अलग था। लगभग 145 से 66 मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी का तापमान अत्यधिक गर्म हुआ करता था, और उस काल में ध्रुवों पर बर्फ का नामोनिशान तक नहीं था। इसके परिणामस्वरूप समुद्र का जलस्तर आज की तुलना में काफी ज्यादा ऊंचा था, जिसके कारण आज की जमीनों का बड़ा हिस्सा जलमग्न था। उत्तरी अफ्रीका का एक बड़ा भूभाग भी उसी प्राचीन जलराशि का हिस्सा था। टेक्टोनिक प्लेटों की निरंतर हलचल के कारण वहां एक विशाल समुद्र का निर्माण हुआ था, जिसका प्रमुख हिस्सा अबू-तरतूर पठार था। आज भले ही यह स्थान पूरी तरह रेगिस्तान में तब्दील हो चुका है, लेकिन यहां की चट्टानों में दबे जीवाश्म उस कालखंड का संपूर्ण इतिहास अपने भीतर समेटे हुए हैं।

ये भी पढ़ें

डुवी फॉर्मेशन और फास्फेट के विशाल भंडार

इस सूखी और बंजर भूमि के भीतर फास्फेट के बहुत बड़े भंडार दबे हुए हैं। फास्फेट आमतौर पर उन्हीं स्थानों पर अधिक मात्रा में पाया जाता है जहां समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र यानी इकोसिस्टम बेहद सक्रिय और समृद्ध होता है। डुवी फॉर्मेशन के ये फास्फेट भंडार उसी प्राचीन महासागर का एक प्रमुख अवशेष हैं, जो इस बात का ठोस प्रमाण देते हैं कि उस दौर का समुद्री पानी अत्यधिक उपजाऊ था। काहिरा यूनिवर्सिटी के रिसर्चर तारेक यासीन और उनकी टीम ने इस क्षेत्र में एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। ‘क्रेटेशियस रिसर्च’ नामक जर्नल में पब्लिश एक शोध पत्र में उन्होंने इस बारे में विस्तार से प्रकाश डाला है। अपने पिछले अध्ययन के दौरान तारेक यासीन और उनके सहयोगियों को शार्क की दो प्रजातियों के दांत मिले थे, जिससे उन्हें यह मजबूत संकेत मिला था कि उस काल के समुद्र में कई विशालकाय शिकारी मौजूद थे। इसी आधार पर उन्होंने अबू-तरतूर में और अधिक गहराई से अनुसंधान करने का निर्णय लिया था।

काली और पीली परतों से बाहर आए नए रहस्य

शोधकर्ताओं की टीम जब दोबारा अबू-तरतूर लौटी तो उन्हें अपनी खोज में अभूतपूर्व सफलता मिली। डुवी फॉस्फेट की काली और पीली पड़ चुकी परतों ने कई प्राचीन राज उगल दिए। खुदाई के दौरान टीम को शार्क के 14 नए दांत मिले, जो पांच बिल्कुल नई प्रजातियों से संबंधित थे। ये सभी प्रजातियां इससे पहले कभी भी अबू-तरतूर के इस क्षेत्र में नहीं खोजी गई थीं। प्राचीन काल की शार्क की सटीक पहचान करना एक बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण कार्य होता है, क्योंकि वैज्ञानिकों के पास आमतौर पर अवशेष के रूप में केवल उनके दांत ही बचते हैं। दांतों की संरचना और बनावट में मामूली सा अंतर ही उनकी प्रजाति को तय करने का आधार बनता है। हालांकि, डुवी से प्राप्त इन दांतों में यह भिन्नता बेहद स्पष्ट और साफ थी। कुछ दांत सुई की भांति बेहद लंबे और नुकीले थे, जबकि अन्य दांत चौड़े और किनारों पर आरी की तरह कांटेदार थे। इन दांतों की बनावट शिकार को दबोचने और चीरने के लिए पूरी तरह अनुकूल थी।

कौन से खूंखार शिकारी करते थे राज?

शोध में मिले एक दांत की आकृति करमबिट चाकू की तरह घुमावदार थी, जिसकी पहचान दुनिया भर के जीवाश्म रिकॉर्ड के आधार पर की गई है। वैज्ञानिकों ने इन दांतों को पांच विलुप्त प्रजातियों का हिस्सा बताया है। इनमें क्रेटालम्ना सीएफ मैरोकाना और स्कैपानोरिन्चस सीएफ रैफियोडोन शामिल हैं। इसके अतिरिक्त सेराटोलम्ना सीएफ सेराटा और स्क्वैलिकोरैक्स की दो प्रजातियां भी इस खोज में मिली हैं। ये पांचों प्रजातियां अबू-तरतूर के जीवाश्म रिकॉर्ड में पहली बार दर्ज की गई हैं, और इनमें से दो प्रजातियां तो पूरे इजिप्ट के लिए पूरी तरह नई हैं। सुई जैसे पैने दांतों वाली शार्क का मिलना सबसे अधिक हैरान करने वाला पहलू रहा, क्योंकि अफ्रीका महाद्वीप में इस विशेष प्रजाति का यह पहला ज्ञात जीवाश्म हो सकता है। यह खोज इस बात की पुष्टि करती है कि उस दौर के उस पानी में विभिन्न प्रकार के खतरनाक और घातक शिकारी राज करते थे।

शार्क की विभिन्न प्रजातियों का सह-अस्तित्व

हैरानी की बात यह है कि ये तमाम शार्क प्रजातियां भोजन और क्षेत्र के लिए आपस में नहीं लड़ती थीं। वे एक विशाल और समृद्ध समुद्री वातावरण के भीतर अपनी अलग-अलग जगह और दायरे तय करके शांति से रहती थीं। उनके दांतों की अनोखी बनावट उनके शिकार करने के अलग-अलग तौर-तरीकों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। उदाहरण के लिए, स्क्वैलिकोरैक्स की उपस्थिति यह संकेत देती है कि वे समुद्र के तटों के करीब शिकार किया करती थीं, जबकि स्कैपानोरिन्चस तुलनात्मक रूप से गहरे पानी में रहने वाली शार्क थी। वहीं, कुछ अन्य प्रजातियां खुले समुद्र में रहना अधिक पसंद करती थीं। उस पूरे क्षेत्र में छोटी मछलियों और प्लैंकटन की कोई कमी नहीं थी। गहरे समुद्र से ऊपर की ओर आने वाले पोषक तत्व उस पानी को अत्यधिक उपजाऊ बनाते थे, जिससे छोटे जीवों की संख्या में भारी वृद्धि होती थी जो बड़ी मछलियों का भोजन बनते थे। अंततः उन बड़ी मछलियों को ये खतरनाक शार्क अपना शिकार बनाती थीं। यह एक संपूर्ण और संतुलित इकोसिस्टम था जो लाखों वर्षों तक इस क्षेत्र में फलता-फूलता रहा।

एक ही समय में नहीं हुई थी सभी शार्क की मौत

शार्क का यह अनूठा कब्रिस्तान कई दृष्टिकोणों से बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण है। जिस कालखंड में ये शार्क इस इलाके में निवास करती थीं, उस दौरान वहां बहुत ही कम तलछट जमा होती थी। यही कारण है कि यह फास्फेट बेड एक लंबी समय अवधि को बहुत ही संक्षिप्त और पतली परत के रूप में प्रदर्शित करता है। इस कब्रिस्तान में मिली सभी शार्क की मौत एक ही दिन या एक ही समय पर नहीं हुई थी, बल्कि यह विभिन्न कालों में मृत हुए जीवों का एक विशाल और क्रमिक जमावड़ा है। यह इस बात का भी संकेत देता है कि उत्तरी अफ्रीका के तटीय इलाकों में इस तरह के समृद्ध इकोसिस्टम काफी आम हुआ करते थे। मोरक्कॉ और सीरिया के फास्फेट भंडार भी इसी तथ्य की ओर इशारा करते हैं। आज भले ही वह जीवंत शार्क स्वर्ग रेगिस्तान में बदल चुका है, लेकिन उसका इतिहास आज भी वैज्ञानिकों को हैरान कर रहा है।

सवाल-जवाब

अबू-तरतूर पठार पर वैज्ञानिकों को क्या मिला है?
वैज्ञानिकों को मिस्र के अबू-तरतूर पठार के सूखे रेगिस्तान में प्राचीन शार्क का एक कब्रिस्तान मिला है, जहां शार्क के कई दांत बरामद हुए हैं।
यह खोज किस काल से जुड़ी हुई है?
यह खोज क्रेटेशियस काल से जुड़ी है, जब करोड़ों साल पहले इस रेगिस्तानी इलाके में एक विशाल और गहरा समुद्र हुआ करता था।
खुदाई के दौरान शार्क की कितनी नई प्रजातियों के दांत मिले हैं?
खुदाई में शार्क की पांच नई प्रजातियों के दांत मिले हैं, जो अबू-तरतूर में पहले कभी नहीं खोजे गए थे।
इस खोज को किस यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने किया है?
यह महत्वपूर्ण खोज काहिरा यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स द्वारा की गई है, जिसका नेतृत्व तारेक यासीन की टीम ने किया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR