अगर हमारी दुनिया से ट्रांजिस्टर्स को पूरी तरह हटा लिया जाए, तो आज का यह डिजिटल युग पूरी तरह थम जाएगा। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले पर्सनल कंप्यूटर, स्मार्टफोन, वीडियो गेम, सोशल मीडिया, नेविगेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी चीजें अस्तित्व में ही नहीं होतीं। आधुनिक युग के वाहनों में भी अरबों ट्रांजिस्टर्स का उपयोग किया जाता है, जो हमारे जीवन को सुगम बनाते हैं। लेकिन आखिर यह तकनीक क्या है और इसने किस तरह पूरी दुनिया का कायाकल्प कर दिया है, यह समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा।
इस क्रांतिकारी तकनीक की पूरी कहानी को समझने के लिए हमें उन्नीसवीं सदी के टेलीग्राफ में उपयोग होने वाले शुरुआती इलेक्ट्रिक रिले तक जाना होगा। उस दौर में टेलीग्राफ लाइनें लंबी विद्युत सर्किट की तरह काम करती थीं। चूँकि उस समय कोई आधुनिक बिजली ग्रिड नहीं था, इसलिए ये सिस्टम कम वोल्टेज वाली बैटरियों पर चलते थे जो टेलीग्राफ स्टेशन के पूरे कमरे को भर देती थीं।
साल 1835 में अविष्कृत इलेक्ट्रिक रिले इन प्रणालियों का एक अनिवार्य हिस्सा था। मूल रूप से यह एक ऐसा स्विच था जो विद्युत प्रवाह को चालू या बंद कर सकता था, ठीक उसी तरह जैसे घर की दीवारों पर लगा लाइट का स्विच काम करता है। लेकिन यहाँ स्विच दबाने के लिए उंगलियों की जगह दूसरे विद्युत प्रवाह का इस्तेमाल किया जाता था। सवाल यह उठता है कि किसी करंट को चालू करने के लिए दूसरे करंट का उपयोग क्यों किया जाता था?
कल्पना कीजिए कि आपको पचास मील दूर किसी अन्य शहर में जल रही लाइट को ऑन करना है। इसके लिए आप बिजली के खंभों पर बहुत लंबी तारें बिछाएंगे। इसके जरिए आप डॉट और डैश वाले कोड का इस्तेमाल करके संदेश भेज सकते थे। लेकिन इसमें एक बड़ी तकनीकी बाधा थी कि तार जितनी लंबी होती, उसका प्रतिरोध उतना ही अधिक बढ़ जाता, जिससे संकेत को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त करंट नहीं मिल पाता था।
इस समस्या का समाधान सर्किट को पच्चीस-पच्चीस मील के दो हिस्सों में बांटकर उन्हें एक रिले के माध्यम से जोड़ना था। जैसे ही आप पहले सर्किट का स्विच बंद करते, वह रिले को सक्रिय कर देता, जिससे दूसरे सर्किट की बैटरी से वैसा ही करंट प्रवाहित होकर आगे की लाइट को जला देता। हालांकि टेलीग्राफ में लाइट की जगह बजर का उपयोग किया जाता था, लेकिन मूल अवधारणा वही थी। आज भी रिले का उपयोग व्यापक रूप से होता है, जैसे कारों में कम पावर वाले डैशबोर्ड कंट्रोल की मदद से इंजन स्टार्टर, हेडलाइट या एयर कंडीशनर जैसे हाई-पॉवर सर्किट को संचालित किया जाता है।
कार्यों के लिहाज से देखा जाए तो रिले अनिवार्य रूप से एक विद्युत चुंबक होता है। इसके भीतर लोहे के कोर के चारों ओर तार की एक कुंडली लिपटी होती है। जब इस कंट्रोल वायर से करंट प्रवाहित होता है, तो एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है, जो ऊपर रखे मेटल स्विच को नीचे खींचकर आउटपुट वायर से जोड़ देता है। ओवन का थर्मोस्टेट जब हीटिंग एलिमेंट को चालू या बंद करता है, तो उससे जो क्लिक की आवाज आती है, वह इसी रिले की वजह से होती है।
हालाँकि रिले बेहद उपयोगी और सरल ऑन-ऑफ स्विच हैं, लेकिन तकनीक में आगे चलकर एक वेरिएबल रिले जैसी चीज की आवश्यकता महसूस हुई, जिसे वैक्यूम ट्यूब कहा गया। इसका आविष्कार लगभग 1905 के आसपास हुआ था, जिसने पुराने जमाने के रेडियो को संभव बनाया। वैक्यूम ट्यूब को एक संशोधित लाइट बल्ब के रूप में समझा जा सकता है, जिसमें एक पतला फिलामेंट गर्म होकर चमकता है और कांच के अंदर हवा न होने के कारण फिलामेंट जलता नहीं है।
जब फिलामेंट अत्यधिक गर्म होता है, तो उससे इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। चूंकि इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह एक विद्युत धारा है, इसलिए इन थर्मल इलेक्ट्रॉनों का उपयोग रिले की तरह किया जा सकता है। यदि इस व्यवस्था में फिलामेंट और कलेक्टर प्लेट के बीच एक नियंत्रण ग्रिड जोड़ दिया जाए, तो आउटपुट करंट को नियंत्रित करना आसान हो जाता है। नियंत्रण ग्रिड पर नेगेटिव वोल्टेज देने से इलेक्ट्रॉन पीछे हट जाते हैं और करंट घट जाता है, जबकि पॉजिटिव वोल्टेज देने से करंट का प्रवाह बढ़ जाता है।
यह भी एक करंट स्विच की तरह काम करता है, लेकिन इसके दो मुख्य लाभ थे। पहला यह कि इसमें कोई यांत्रिक संपर्क नहीं था, जिससे आउटपुट करंट बहुत तेजी से बदल सकता था। दूसरा यह कि आउटपुट करंट केवल चालू या बंद होने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसे नियंत्रण वोल्टेज के अनुसार बदला जा सकता था।
इसी तकनीक ने पहले ऑडियो एम्पलीफायरों को संभव बनाया। दूर के रेडियो स्टेशन से आने वाला कमजोर सिग्नल स्पीकर को चलाने के लिए पर्याप्त नहीं होता था, लेकिन जब उसे वैक्यूम ट्यूब के कंट्रोल वोल्टेज में प्रवाहित किया जाता था, तो मूल सिग्नल के पैटर्न को बनाए रखते हुए एक मजबूत आउटपुट प्राप्त होता था।
इसके अलावा वैक्यूम ट्यूब की मदद से शुरुआती कंप्यूटरों का निर्माण भी किया गया। शुरुआती कंप्यूटर लॉजिक गेट्स बनाने वाली वैक्यूम ट्यूबों का एक समूह मात्र थे, जहाँ इनपुट सिग्नल एक वोल्ट या शून्य वोल्ट होता था। हालांकि इन कार्यों के लिए इलेक्ट्रिक रिले का उपयोग भी किया जा सकता था, लेकिन वे वैक्यूम ट्यूब की तुलना में काफी धीमे थे और उनसे लगातार होने वाली आवाज से परेशानी होती थी। इसके विपरीत वैक्यूम ट्यूब बिना किसी चलते हुए हिस्से वाले पूर्णतः इलेक्ट्रॉनिक घटक थे।
फिर भी वैक्यूम ट्यूबों के साथ तीन बड़ी कमियां जुड़ी हुई थीं। वे बहुत अधिक बिजली की खपत करते थे, जिससे शुरुआती कंप्यूटर अत्यधिक गर्म हो जाते थे और उनके लिए भारी कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता पड़ती थी। इसके अलावा वे नाजुक थे और जल्दी खराब हो जाते थे, जिसके कारण नियमित रखरखाव की जरूरत पड़ती थी। साथ ही वैक्यूम ट्यूब आकार में बहुत बड़े थे, जिसके कारण 1945 के ENIAC जैसे शुरुआती कंप्यूटर पूरे कमरे की जगह घेर लेते थे।
साल 1947 में बेल लैब्स में ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने सेमीकंडक्टर का उपयोग करके इन सभी समस्याओं का समाधान कर दिया। सेमीकंडक्टर ऐसे पदार्थ होते हैं जो कॉपर जैसे सुचालक और रबर जैसे कुचालक के बीच की स्थिति में होते हैं और दोनों के बीच स्विच कर सकते हैं, जैसे कि सिलिकॉन। सेमीकंडक्टर दो प्रकार के होते हैं, जिसमें सिलिकॉन में अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर एन-टाइप और इलेक्ट्रॉन हटाने पर पी-टाइप सेमीकंडक्टर बनता है।
विभिन्न प्रकार के सेमीकंडक्टरों को आपस में मिलाकर एक ट्रांजिस्टर का निर्माण किया जाता है, जैसे कि एनपीएन ट्रांजिस्टर। इसमें दो एन-टाइप सेमीकंडक्टरों को एक पी-टाइप द्वारा अलग किया जाता है, जो इलेक्ट्रॉनों को सीधे इनपुट से आउटपुट तक जाने से रोकता है। हालांकि गेट पर वोल्टेज लागू करने पर इलेक्ट्रॉन आउटपुट की ओर बढ़ सकते हैं। यह भी एक प्रकार का स्विच है, लेकिन इसमें नियंत्रण बहुत सूक्ष्म स्तर पर होता है।
सबसे बड़ी बात यह हुई कि इनका आकार बेहद छोटा किया जा सकता था। पचास और साठ के दशक में बड़े रेडियो कंसोल की जगह ट्रांजिस्टर रेडियो ने ले ली, जिन्हें युवा हर जगह अपने साथ ले जाते थे। उन रेडियो में छह से दस ट्रांजिस्टर होते थे, जबकि आज के iPhone 17 Pro में तीस अरब तक ट्रांजिस्टर समाहित होते हैं। यह तकनीक अद्भुत है और इसी के दम पर हमारी आज की पूरी कंप्यूटर आधारित दुनिया सुचारू रूप से चल रही है।



















