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लुप्तप्राय जीवों का डीएनए अब बर्फ में रहेगा सुरक्षित, कोलोसल और सरकारी वैज्ञानिकों की बड़ी पहलविज्ञान
4 घंटे पहले· 1

लुप्तप्राय जीवों का डीएनए अब बर्फ में रहेगा सुरक्षित, कोलोसल और सरकारी वैज्ञानिकों की बड़ी पहल

कोलोसल और यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विस मिलकर 2,300 से ज्यादा लुप्तप्राय प्रजातियों की कोशिकाएं, प्रजनन ऊतक और डीएनए जमा कर रहे हैं, जिन्हें डलास की लैब में बर्फ में संरक्षित किया जाएगा। इसका मकसद किसी प्रजाति के विलुप्त होने पर उसे फिर से लौटाना है।

Ravikash GuptaRavikash GuptaSenior Correspondent 6 मिनट पढ़ें AI के लिए
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धरती के सबसे कमजोर और संकटग्रस्त जीवों की आनुवंशिक पहचान को हमेशा के लिए सहेजने की एक बड़ी कोशिश अब शुरू हो चुकी है। कोलोसल नाम की कंपनी और यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विस के वैज्ञानिक मिलकर ऐसी 2,300 से ज्यादा पौधों और जानवरों की प्रजातियों की कोशिकाएं, प्रजनन ऊतक और डीएनए इकट्ठा कर रहे हैं, जो अमेरिका और दुनिया भर में लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम के तहत संरक्षित हैं। इन सभी नमूनों को बेहद कम तापमान पर जमाकर डलास स्थित कोलोसल की लैब में रखा जाएगा, और इनकी डुप्लीकेट प्रतियां देश के अलग-अलग हिस्सों में भी बांटी जाएंगी।

यह वही कंपनी है जिसने पिछले साल जिंदा डायर वुल्फ के बच्चे तैयार करने का दावा किया था। कोलोसल इन नमूनों की जेनेटिक सीक्वेंसिंग करेगी और उससे मिले डेटा को शोधकर्ताओं तथा संरक्षण से जुड़े लोगों के लिए उपलब्ध कराएगी। साझेदारी की शर्तों के मुताबिक नमूनों का मालिकाना हक संघीय सरकार के पास रहेगा।

कोलोसल के सीईओ और सह-संस्थापक बेन लैम कहते हैं, “हम जितनी ज्यादा प्रजातियों के नमूने बैकअप के तौर पर सहेज सकते हैं, उतना सहेजना चाहते हैं।”

कैसे जुटाए जा रहे हैं नमूने

कोलोसल अपने फील्ड पार्टनर्स को कलेक्शन किट दे रही है, ताकि वे खून, त्वचा और दूसरे ऊतकों के नमूने ले सकें। लैम के मुताबिक नमूने जुटाने का काम पहले ही शुरू हो चुका है।

आंतरिक मामलों के सचिव डग बरगम ने एक बयान में कहा, “यह साझेदारी यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विस की वैज्ञानिक विशेषज्ञता और निजी क्षेत्र की रचनात्मकता को एक साथ लाती है, जिससे ऐसे नए उपकरण बनाए जा सकेंगे जो प्रजातियों को बचाने, अहम आनुवंशिक संसाधनों को संरक्षित करने और वन्यजीव संरक्षण के भविष्य को मजबूत करने में मदद करेंगे।” फिश एंड वाइल्डलाइफ, जो आंतरिक विभाग का हिस्सा है, ने इस साझेदारी के बारे में और जानकारी मांगे जाने पर कोई जवाब नहीं दिया।

विलुप्ति की कगार से वापसी का रास्ता

सैद्धांतिक तौर पर इन नमूनों का इस्तेमाल किसी ऐसी प्रजाति को बचाने में हो सकता है जो विलुप्त होने के बेहद करीब पहुंच चुकी हो। फिश एंड वाइल्डलाइफ पहले भी ऐसा कर चुकी है, जब उसने ब्लैक-फुटेड फेरेट का क्लोन तैयार किया था। यह उत्तरी अमेरिका के सबसे संकटग्रस्त स्तनधारियों में से एक है। यह क्लोन एक ऐसे फेरेट की संरक्षित कोशिकाओं से बनाया गया था जिसकी मौत 1980 के दशक में हो गई थी। साल 2021 में इसकी घोषणा हुई थी और यह किसी अमेरिकी लुप्तप्राय प्रजाति की क्लोनिंग का पहला मामला था। इस काम के लिए नमूना सैन डिएगो जू वाइल्डलाइफ अलायंस के फ्रोजन जू ने दिया था।

संरक्षण कानून में बदलाव और विवाद

ट्रंप प्रशासन के दौरान फिश एंड वाइल्डलाइफ ने 1973 के ऐतिहासिक लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम में बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा है, जिससे खतरे में पड़े पौधों और जानवरों को मिली सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। प्रस्तावित बदलावों के तहत संरक्षित आवास तय करते वक्त आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाएगा। साथ ही एक “ब्लैंकेट नियम” को भी खत्म किया जाएगा, जिसके तहत खतरे में पड़ी प्रजातियों को अपने आप वही सख्त सुरक्षा मिल जाती थी जो लुप्तप्राय प्रजातियों को मिलती है।

इसी साल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तथाकथित गॉड स्क्वॉड को बुलाया था। यह प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों का एक समूह है, जिसमें बरगम भी शामिल हैं। इस समूह को यह तय करना था कि मेक्सिको की खाड़ी में लुप्तप्राय प्रजातियों को मिली सुरक्षा को दरकिनार किया जाए या नहीं। लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम बनने के बाद से यह समूह सिर्फ गिनती के मौकों पर ही बैठा है। इस बार इसने इलाके में तेल और गैस निकालने वाली कंपनियों को छूट देने का फैसला किया। इस फैसले के खिलाफ पर्यावरणवादियों ने प्रशासन पर मुकदमा कर दिया।

आलोचकों की राय

एरिज़ोना स्थित गैर-लाभकारी संस्था सेंटर फॉर बायोलॉजिकल डायवर्सिटी में लुप्तप्राय प्रजाति निदेशक नोआ ग्रीनवाल्ड कहते हैं कि कोलोसल के साथ यह नई पहल प्रशासन के संरक्षण को लेकर रुख से मेल खाती है, क्योंकि यह उद्योग जगत के हितों से नहीं टकराती।

वे कहते हैं, “यह जैव विविधता का संरक्षण नहीं है। यह तो आखिरी कोशिश जैसा है। हमें इस आनुवंशिक सामग्री की जरूरत तभी पड़ेगी, जब प्रशासन लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने में नाकाम रहेगा।”

सेंटर फॉर बायोलॉजिकल डायवर्सिटी लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम में प्रस्तावित बदलावों की आलोचना करती रही है। ग्रीनवाल्ड का कहना है कि संरक्षण की कोशिशों को इसके बजाय राष्ट्रीय उद्यानों और जंगली इलाकों जैसी सार्वजनिक जमीनों को बचाने पर केंद्रित होना चाहिए, ताकि प्रजातियों का खत्म होना रोका जा सके। उनके मुताबिक भले ही तकनीक से विलुप्त या लुप्तप्राय प्रजातियों को वापस लाना मुमकिन हो, लेकिन उन्हें टिकाए रखने के लिए आवास का बचा रहना भी जरूरी है।

चार साल पुरानी है यह साझेदारी

लैम बताते हैं कि संघीय सरकार के साथ कोलोसल की यह साझेदारी पिछले चार साल से तैयार हो रही थी और इसकी शुरुआती बातचीत बाइडेन प्रशासन के साथ हुई थी।

वे कहते हैं, “दोनों पक्षों के साथ काम करते हुए हमने देखा कि भले ही जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर उनकी राय अलग-अलग हो, लेकिन इस बात पर सब सहमत हैं कि प्रजातियों के बिना दुनिया बुरी होगी।”

पिछले साल बरगम ने कोलोसल के डायर वुल्फ वाले ऐलान की तारीफ की थी, और साथ ही लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची की यह कहकर आलोचना भी की थी कि यह “नवाचार से ज्यादा नियमन” को तरजीह देती है। एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कंपनी की डी-एक्सटिंक्शन तकनीक को ऐसे रास्ते के तौर पर बताया था जो “ऐसा भविष्य गढ़ने में मदद कर सकती है, जहां किसी आबादी पर कभी खतरा न आए।”

ट्रंप प्रशासन के बारे में लैम कहते हैं, “उन्हें तकनीक वाकई पसंद है। उन्हें पैसा कमाना और पैसा बचाना, दोनों पसंद हैं।” प्रशासन के सामने कोलोसल का प्रस्ताव यही था कि बायोबैंक का सारा खर्च वह खुद उठाएगी।

विलुप्त प्रजातियों को लौटाने की महत्वाकांक्षा

पांच साल पुराना यह स्टार्टअप विलुप्त प्रजातियों को वापस लाने को लेकर बड़े-बड़े ऐलान करता रहा है। पिछले साल इसने ग्रे वुल्फ पर जीन-एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल कर वे खूबियां पैदा कीं जो विलुप्त डायर वुल्फ में पाई जाती थीं। इसने जीन एडिटिंग से ऐसे चूहे भी बनाए जिन्हें मैमथ जैसे रोएं की वजह से इसने “वूली माइस” नाम दिया। 10 अरब डॉलर से ज्यादा की वैल्यूएशन वाली यह कंपनी पारिस्थितिकी तंत्र को दोबारा बहाल करने और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के नाम पर डोडो पक्षी और वूली मैमथ को भी वापस लाने का इरादा रखती है।

अमेरिकी सरकार के साथ यह सहयोग कोलोसल के बायोवॉल्ट प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसका ऐलान कंपनी ने इसी साल किया था। कंपनी ने यह साफ नहीं बताया कि उसने इस पहल में ठीक कितना पैसा लगाया है, लेकिन लैम के मुताबिक यह रकम “कई करोड़ डॉलर” के दायरे में है। कंपनी संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी साझेदारी कर रही है, जिसकी सरकार ने हाल ही में कंपनी में 6 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। इस साझेदारी का मकसद उस देश के भीतर और दुनिया भर की लुप्तप्राय प्रजातियों की आनुवंशिक सामग्री को सहेजना है। यह संग्रह दुबई के म्यूजियम ऑफ द फ्यूचर के अंदर रखा जाएगा।

लैम कहते हैं कि बायोवॉल्ट मौजूदा संरक्षण तरीकों का मुकाबला करने के लिए नहीं है, बल्कि यह एक “बैकअप” की तरह काम करता है।

इसका आप पर असर

  • विज्ञान और संरक्षण में रुचि रखने वालों के लिए: 2,300 से ज्यादा लुप्तप्राय प्रजातियों का आनुवंशिक बैकअप तैयार होने से किसी प्रजाति के विलुप्त होने पर भविष्य में उसे लौटाने की उम्मीद बनी रहेगी।
  • लंबे समय में असर: जानकारों के मुताबिक यह तकनीक तभी काम आएगी जब असली आवास और जंगलों को बचाने की कोशिशें नाकाम होंगी, इसलिए यह असली संरक्षण का विकल्प नहीं, बल्कि एक आखिरी बैकअप है।

सवाल-जवाब

कोलोसल और सरकार मिलकर क्या कर रहे हैं?
वे यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विस के साथ मिलकर 2,300 से ज्यादा लुप्तप्राय प्रजातियों की कोशिकाएं, प्रजनन ऊतक और डीएनए जमा कर रहे हैं और उन्हें बर्फ में संरक्षित कर रहे हैं।
ये नमूने कहां रखे जाएंगे?
इन्हें डलास स्थित कोलोसल की लैब में बेहद कम तापमान पर रखा जाएगा, और इनकी डुप्लीकेट प्रतियां देश के अलग-अलग हिस्सों में भी बांटी जाएंगी।
इन नमूनों का मालिक कौन होगा?
साझेदारी की शर्तों के मुताबिक नमूनों का मालिकाना हक संघीय सरकार के पास रहेगा।
इन नमूनों का इस्तेमाल किस काम में हो सकता है?
सैद्धांतिक तौर पर इनसे किसी विलुप्ति के करीब पहुंची प्रजाति को बचाया जा सकता है, जैसे पहले 1980 के दशक में मरे एक फेरेट की संरक्षित कोशिकाओं से ब्लैक-फुटेड फेरेट का क्लोन तैयार किया गया था।
इस पहल की आलोचना क्यों हो रही है?
नोआ ग्रीनवाल्ड जैसे जानकारों का कहना है कि यह असली जैव विविधता संरक्षण नहीं, बल्कि आखिरी कोशिश है, और इसकी जरूरत तभी पड़ेगी जब प्रशासन प्रजातियों को बचाने में नाकाम रहेगा।
कोलोसल ने इस प्रोजेक्ट में कितना पैसा लगाया है?
कंपनी ने सटीक रकम नहीं बताई, लेकिन बेन लैम के मुताबिक यह “कई करोड़ डॉलर” के दायरे में है।
क्या इसमें कोई और देश भी शामिल है?
हां, कोलोसल संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी साझेदारी कर रही है, जिसकी सरकार ने कंपनी में 6 करोड़ डॉलर का निवेश किया है, और यह संग्रह दुबई के म्यूजियम ऑफ द फ्यूचर में रखा जाएगा।
#विज्ञान#कोलोसल#बायोवॉल्ट#लुप्तप्रायप्रजाति#डायरवुल्फ#डी-एक्सटिंक्शन#वन्यजीवसंरक्षण#जेनेटिकबैकअप

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