प्रशांत महासागर की सतह पर पनप रही असामान्य तापीय हलचल ने वैश्विक पर्यावरण वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र के पानी का तापमान अप्रत्याशित गति से बढ़ रहा है, जो आने वाले समय में एक अत्यंत तीव्र अलनीनो चक्र के सक्रिय होने का स्पष्ट संकेत है। जलवायु विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो इस वर्ष आकार ले रहा अलनीनो पिछले 100 से अधिक वर्षों के दर्ज इतिहास में अब तक का सबसे शक्तिशाली घटनाक्रम साबित हो सकता है। समुद्र की इस अतिशय गर्मी का दूरगामी परिणाम दुनिया भर के मौसम तंत्र में भारी उथल-पुथल, जानलेवा लू और कई महाद्वीपों में बारिश के बदलते मिजाज के रूप में देखने को मिलेगा। इस वैश्विक मौसमी आपदा के बीच भारत पर दोहरी मुसीबत मंडरा रही है, जहाँ एक तरफ मानसूनी वर्षा में संभावित भारी गिरावट से सूखे जैसे हालात उत्पन्न हो सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के प्रमुख कृषि चक्रों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने से खाद्य सुरक्षा और पैदावार को बड़ा झटका लग सकता है।
प्रशांत महासागर में असामान्य उष्मा और यूके मेट ऑफिस की चेतावनी
जलवायु अध्ययन में संलग्न ब्रिटेन के मौसम विभाग यानी मेट ऑफिस ने शुक्रवार को प्रशांत महासागर की तापीय स्थितियों का विस्तृत अवलोकन करने के बाद एक गंभीर चेतावनी जारी की है। एजेंसी के विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान में विकसित हो रहा अलनीनो अपने चरम चरण के दौरान प्रशांत महासागर की सतह के तापमान को सामान्य औसत स्तर से 3 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक ऊपर ले जाने की दिशा में अग्रसर है। मौसम विज्ञान की शब्दावली में महासागरीय जल के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को भी एक अत्यंत विशाल और दुर्लभ मौसमी घटना माना जाता है। ऐसे में 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोतरी आधुनिक जलवायु अभिलेखों के इतिहास में अब तक की अनहोनी परिघटना होगी। इससे पूर्व वर्ष 2015-16 का अलनीनो चक्र आधुनिक दौर का सबसे तीव्र चक्र दर्ज किया गया था, जब समुद्र का तापमान सामान्य से लगभग 3 डिग्री सेल्सियस अधिक पहुंच गया था।
यूके मेट ऑफिस के चीफ एडम स्केफ ने इस उभरती स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए मीडिया से कहा, "हम एक सदी से अधिक समय में सबसे बड़े अल नीनो की उम्मीद कर रहे हैं, जो तीन डिग्री से ज़्यादा तक पहुंच सकता है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक जलवायु अभिलेखों में ऐसा ऐतिहासिक परिदृश्य पहले कभी नहीं देखा गया है। मेट ऑफिस के वैज्ञानिकों ने जोर देकर कहा है कि यह कोई क्षणिक या अल्पकालिक मौसम परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक वैश्विक जलवायु बदलाव का हिस्सा है, जिसके दुष्प्रभाव आने वाले वर्षों तक लगातार महसूस किए जाते रहेंगे।
नवंबर में 3.9 डिग्री तक जा सकता है तापमान: नोआ आंकड़े
अमेरिकी मौसम एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (नोआ) द्वारा विकसित किए गए पूर्वानुमान मॉडलों का गहन विश्लेषण करने वाले मंच क्लाइमेट ब्रिंक ने भी चिंताजनक आंकड़े सामने रखे हैं। इन सांख्यिकीय और मौसमी मॉडलों से संकेत मिलता है कि चालू वर्ष के नवंबर महीने के दौरान यह अलनीनो अपने सबसे खतरनाक और उच्चतम स्तर पर पहुंचेगा। अनुमानों के मुताबिक, नवंबर में प्रशांत महासागर के जल का तापमान अपने 30 वर्षों के ऐतिहासिक औसत की तुलना में 3.9 डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म हो सकता है।
वर्तमान आंकड़ों पर नजर डालें तो इस समय भी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान अपने 30 साल के सामान्य औसत से लगभग 2.6 डिग्री सेल्सियस ऊपर बना हुआ है। विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से मानना है कि समुद्र के जल में इतनी उच्च तापीय उष्मा का एकत्र होना वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को पूरी तरह से बाधित कर देता है। यह स्थिति विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में वायुदाब, हवाओं की दिशा और आर्द्रता के संतुलन को बिगाड़ देती है, जिसके चलते कहीं भीषण सूखा तो कहीं अनियंत्रित वर्षा और बाढ़ की स्थितियां निर्मित होती हैं।
2027 में टूट सकता है सर्वकालिक वैश्विक गर्मी का रिकॉर्ड
अलनीनो के प्रभाव की एक प्रमुख वैज्ञानिक विशेषता यह है कि महासागरों में उष्मा उत्पन्न होने के बाद इसका सबसे उग्र और चरम असर अगले कैलेंडर वर्ष में वैश्विक औसत तापमान पर दिखाई देता है। इसी कारण से जलवायु वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि वर्ष 2027 दुनिया के इतिहास का सबसे गर्म साल साबित हो सकता है। मेट ऑफिस से जुड़े वैज्ञानिक निक डनस्टोन के अध्ययनों और पूर्वानुमानों के अनुसार, वर्ष 2027 के पास 2024 के पिछले सर्वोच्च तापीय रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर अब तक का सबसे गर्म वर्ष बनने की अत्यधिक उच्च संभावना मौजूद है।
याद दिला दें कि वर्ष 2024 में वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक क्रांति से पूर्व के ऐतिहासिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक ऊपर चला गया था। 1.5 डिग्री सेल्सियस की यह सीमा पेरिस जलवायु समझौते और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधियों के दृष्टिकोण से एक बेहद संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण सीमा मानी जाती है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि 2027 में इस सीमा के पुनः पार होने से वैश्विक ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्री जलस्तर में वृद्धि और अत्यधिक मौसम घटनाओं की आवृत्ति में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है।
भारतीय मानसून पर असर और आईएमडी का आंकलन
दक्षिण एशियाई भूभाग, विशेषकर भारत के संदर्भ में, अलनीनो का सीधा और विनाशकारी संबंध मानसूनी वर्षा के कमजोर पड़ने से जुड़ा रहा है। ऐतिहासिक आंकड़े गवाही देते हैं कि जब-जब प्रशांत महासागर में शक्तिशाली अलनीनो की स्थिति बनी है, तब-तब भारतीय उपमहाद्वीप को कम मानसूनी बारिश और सूखे का सामना करना पड़ा है। इस बार भी देश के कई हिस्सों में मानसूनी गतिविधियों के सामान्य से कम रहने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने पूरे मानसून सीजन के दौरान होने वाली कुल वर्षा को लेकर अपने अनुमान जारी किए हैं। आईएमडी के अनुसार, इस सीजन में कुल मानसूनी बारिश अपने दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का केवल 90 प्रतिशत के आसपास ही रहने की उम्मीद है। मौसम विभाग के आंकड़ों के लिहाज से यह पिछले लगभग 11 वर्षों में वर्षा का सबसे कम और चिंताजनक पूर्वानुमान माना जा रहा है। आईएमडी के वरिष्ठ वैज्ञानिक तथा क्लाइमेट मॉनिटरिंग एंड प्रेडिक्शन ग्रुप के प्रमुख ओपी श्रीजीत ने वैश्विक और राष्ट्रीय स्थिति पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 2027 के वैश्विक स्तर पर सबसे गर्म साल बनने की प्रबल संभावना है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत के भीतर 2027 का औसत तापमान 2024 के रिकॉर्ड को तोड़ेगा या नहीं, यह उस विशिष्ट वर्ष के मानसून के व्यवहार और मानसून के बाद की अलनीनो सदर्न ओसिलेशन (एंंसो) स्थितियों पर निर्भर करेगा। इसके बावजूद, उन्होंने आगाह किया कि अगले वर्ष भारत में अत्यधिक तपन और भीषण हीटवेव का गंभीर खतरा मंडराता रहेगा।
कृषि क्षेत्र पर दोहरी मार और लगातार दो फसल सीजन पर संकट
अलनीनो के इस विकराल रूप का सबसे घातक प्रहार भारत की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के एमेरिटस प्रोफेसर तथा आईआईटी कानपुर के विजिटिंग प्रोफेसर रघु मुर्तुगुड्डे के वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार, भारत को इस मौसमी उथल-पुथल के कारण लगातार दो फसल सीजनों में भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। उनका आंकलन है कि इसका प्रतिकूल प्रभाव वर्तमान रबी फसल के उत्पादन से लेकर वर्ष 2027 के पूरे कृषि सीजन तक बना रह सकता है।
प्रोफेसर रघु मुर्तुगुड्डे ने ध्यान दिलाया कि पूर्ववर्ती वर्षों 2023 और 2024 में भी अलनीनो के कारण भारतीय कृषि क्षेत्र को काफी विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ा था। चालू वर्ष में वर्षा की अनिश्चितता के कारण रबी फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम है। परिस्थितियों की गंभीरता को भांपते हुए केंद्र सरकार ने खाद्य तेल और चीनी जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों की घरेलू आपूर्ति और मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए पहले से ही कई एहतियाती नीतियां और रणनीतिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2027 में खेती का भविष्य काफी हद तक उस दौरान मानसूनी बारिश के आगमन और फैलाव पर टिका होगा। यदि मानसून कमजोर रहता है तो खरीफ फसलों का चक्र पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाएगा, जबकि दूसरी ओर आगामी वर्ष के वसंत ऋतु में असामान्य तापमान वृद्धि और प्रचंड लू के थपेड़े भी खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।



















