चिकित्सा और वैज्ञानिक अनुसंधानों का मूलभूत सिद्धांत हमेशा मानव पीड़ा को कम करना और नए उपचारों की खोज के माध्यम से जीवन बचाना रहा है। हालांकि, इतिहास में कई ऐसे अवसर भी आए जब वैज्ञानिक जिज्ञासा और प्रशासनिक सनक के नाम पर नैतिक मानकों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। जब शोधकर्ताओं ने नैतिक दायित्वों की अनदेखी की और बिना सूचित सहमति के इंसानों को प्रयोगशाला के परीक्षण विषय के रूप में इस्तेमाल किया, तो विज्ञान अत्यंत खौफनाक रूप ले बैठा। इन ऐतिहासिक प्रयोगों में पीड़ितों की शारीरिक व मानसिक वेदना की उपेक्षा की गई और ज्ञान के नाम पर मानवाधिकारों का हनन किया गया।
टस्कीगी का सिफलिस अध्ययन और चार दशकों तक किया गया छल
अमेरिका की पब्लिक हेल्थ सर्विस ने वर्ष 1932 में अलबामा राज्य में एक अत्यंत विवादित शोध की शुरुआत की थी, जो वर्ष 1972 तक लगातार 40 वर्षों तक चलता रहा। इस अध्ययन का उद्देश्य गरीब और अशिक्षित अश्वेत पुरुषों में सिफलिस बीमारी के प्राकृतिक विकास की निगरानी करना था। डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने इन मरीजों को कभी यह स्पष्ट नहीं बताया कि वे सिफलिस से ग्रस्त हैं, बल्कि उन्हें सिर्फ इतना कहा गया कि उनका इलाज किया जा रहा है।
इस प्रयोग का सबसे दुखद पहलू वर्ष 1940 के दशक में सामने आया, जब सिफलिस के प्रभावी इलाज के रूप में पेनिसिलिन दवा की खोज हो चुकी थी। इसके बावजूद, शोधकर्ताओं ने जानबूझकर मरीजों को यह दवा उपलब्ध नहीं कराई, ताकि वे यह देख सकें कि बिना इलाज के यह बीमारी शरीर के आंतरिक अंगों को किस हद तक नुकसान पहुंचाती है। यह अमानवीय परीक्षण तब तक जारी रहा जब तक कि वर्ष 1972 में मीडिया के माध्यम से इसकी सच्चाई सार्वजनिक नहीं हो गई और चौतरफा दबाव के बाद इसे रोका गया।
जापानी सेना की गुप्त यूनिट 731 की अमानवीय क्रूरता
द्वितीय विश्व युद्ध की अवधि के दौरान जापानी सेना की एक विशेष गुप्त सैन्य टुकड़ी, जिसे यूनिट 731 कहा जाता था, ने कब्जा किए गए चीनी क्षेत्रों में जैविक और रासायनिक हथियारों के परीक्षण किए। इस सैन्य इकाई के भीतर युद्ध बंदियों और नागरिकों पर बिना किसी एनेस्थीसिया के जटिल शल्य क्रियाएं की जाती थीं।
शोधकर्ताओं ने बंदियों को अत्यधिक ठंड में रखकर फ्रॉस्टबाइट की स्थितियों का अध्ययन किया और उन पर जानलेवा रोगाणुओं का परीक्षण किया। इस इकाई के भीतर बंदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने के बजाय उन्हें केवल लकड़ी के लट्ठों की तरह माना जाता था। युद्ध समाप्त होने के पश्चात, इस इकाई से जुड़े कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने अपना सारा शोध डेटा अमेरिकी सैन्य अधिकारियों को सौंप दिया, जिसके बदले में उन्हें कानूनी कार्रवाई और सजा से छूट दे दी गई।
नाजी कंसंट्रेशन कैंपों में डॉक्टर जोसेफ मेंगेले के खौफनाक प्रयोग
द्वितीय विश्व युद्ध के समय नाजी कंसंट्रेशन कैंपों में बंदियों पर किए गए चिकित्सीय परीक्षण मानव इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में से एक हैं। डॉक्टर जोसेफ मेंगेले जैसे डॉक्टरों ने कैदियों की सहमति के बिना उन पर जानलेवा प्रयोग किए। कैदियों को अत्यधिक ठंडे पानी में रखकर हाइपोथर्मिया के प्रभाव जांचे गए, उन पर जबरन नसबंदी की तकनीकें आजमाई गईं और उनके शरीर में खतरनाक वायरस डाले गए।
डॉक्टर जोसेफ मेंगेले की विशेष रुचि जुड़वां बच्चों पर परीक्षण करने में थी। वह अक्सर एक बच्चे पर प्रयोग करता था और फिर तुलनात्मक अध्ययन के लिए दूसरे बच्चे की बलि देकर दोनों के अंगों की जांच करता था। युद्ध के बाद आयोजित नूर्नबर्ग ट्रायल के परिणामस्वरूप नूर्नबर्ग कोड अस्तित्व में आया, जिसने वैश्विक स्तर पर मेडिकल रिसर्च में इंसानी सहमति को अनिवार्य नियम के रूप में स्थापित किया।
स्टैनफोर्ड जेल प्रयोग और सत्ता का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
वर्ष 1971 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिक फिलिप जिम्बार्डो ने एक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रयोग आयोजित किया। उन्होंने सामान्य कॉलेज छात्रों के एक समूह को यादृच्छिक रूप से कैदियों और जेल गार्डों की भूमिकाएं सौंपीं। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि दी गई सामाजिक भूमिकाएं और अधिकार इंसानी व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
हालांकि, प्रयोग शुरू होने के कुछ ही दिनों के भीतर गार्ड की भूमिका निभा रहे छात्रों का व्यवहार अत्यंत आक्रामक और क्रूर हो गया, जबकि कैदी बने छात्र गंभीर मानसिक तनाव के शिकार होने लगे। योजना के अनुसार यह प्रयोग 14 दिनों तक चलना था, लेकिन स्थिति अनियंत्रित होने के कारण इसे मात्र 6 दिनों में ही समाप्त करना पड़ा। बाद में सामने आए रिकॉर्डिंग्स से पता चला कि शोधकर्ता ने स्वयं गार्डों को सख्त रवैया अपनाने के लिए प्रेरित किया था।
मिलग्राम का आज्ञाकारिता प्रयोग: जब आम नागरिक बने प्रताड़क
समान अवधि के दौरान स्टेनली मिलग्राम द्वारा आयोजित एक अन्य मनोवैज्ञानिक अध्ययन ने यह प्रदर्शित किया कि आम इंसान सत्ता के निर्देशों का पालन किस हद तक कर सकते हैं। इस प्रयोग में प्रतिभागियों को एक शिक्षक की भूमिका दी गई और उन्हें पास के कमरे में बैठे एक व्यक्ति द्वारा गलत उत्तर दिए जाने पर बिजली का झटका देने का निर्देश दिया गया।
प्रयोग के दौरान बिजली के झटके का वोल्टेज लगातार बढ़ाया जाता रहा। यद्यपि दूसरे कमरे से दर्दभरी आवाजें आ रही थीं और झटका संभावित रूप से जानलेवा स्तर तक पहुंच रहा था, फिर भी प्रयोगशाला में उपस्थित शोधकर्ता के लगातार निर्देश देने पर अधिकांश प्रतिभागियों ने बिजली का बटन दबाना जारी रखा। इस अध्ययन ने यह साबित किया कि अधिकारिक दबाव में व्यक्ति अपनी नैतिक चेतना को पीछे छोड़ सकता है।
ग्वाटेमाला में सिफलिस का गुप्त और जानबूझकर किया गया संक्रमण
वर्ष 1946 से 1948 के मध्य अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा ग्वाटेमाला में एक अत्यंत अनैतिक प्रयोग को अंजाम दिया गया। इस अध्ययन के दौरान ग्वाटेमाला के सैनिकों, कैदियों और मानसिक अस्पतालों में भर्ती मरीजों को उनकी जानकारी या सहमति के बिना सिफलिस और गोनोरिया जैसे यौन संचारित रोगों से संक्रमित किया गया।
इस शोध का प्राथमिक उद्देश्य विभिन्न पेनिसिलिन दवाओं की प्रभावशीलता की जांच करना था। यह गुप्त प्रयोग कई दशकों तक फाइलों में दबा रहा। वर्ष 2010 में जब एक इतिहासकार ने इन अभिलेखों को सार्वजनिक किया, तब अमेरिकी सरकार ने आधिकारिक रूप से ग्वाटेमाला की सरकार और वहां के लोगों से माफी स्वीकार की।
आइओवा का मॉन्स्टर स्टडी और अनाथ बच्चों पर मनोवैज्ञानिक अत्याचार
वर्ष 1939 में आइओवा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता वेंडेल जॉनसन और उनकी टीम ने एक अनाथालय के सामान्य बच्चों पर भाषा विकास से संबंधित एक प्रयोग किया। इस शोध में बच्चों के दो समूह बनाए गए, जिनमें से एक समूह के बच्चों को उनकी वाणी की कमियों के लिए लगातार अपमानित किया गया और उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि वे हकलाते हैं।
इस निरंतर नकारात्मक दबाव का परिणाम यह हुआ कि कई सामान्य बच्चे जीवन भर के लिए वाणी दोष और हीन भावना के शिकार हो गए। इस शोध के अमानवीय स्वरूप के कारण इसे मॉन्स्टर स्टडी का नाम दिया गया। वर्ष 2007 में इस प्रयोग के दुष्परिणाम झेलने वाले जीवित बचे पीड़ितों को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से वित्तीय मुआवजा प्रदान किया गया।
शीत युद्ध के दौरान किए गए परमाणु विकिरण प्रयोग
शीत युद्ध के शुरुआती दौर में, 1940 और 1950 के दशकों में, परमाणु हथियारों के प्रभाव को समझने के लिए अमेरिका में विभिन्न गोपनीय विकिरण अध्ययन आयोजित किए गए। इन अध्ययनों के तहत अस्पतालों में भर्ती अनभिज्ञ मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के शरीर में प्लूटोनियम तथा अन्य रेडियोएक्टिव पदार्थ इंजेक्ट किए गए।
मरीजों को यह आभास कराया जाता था कि उन्हें सामान्य चिकित्सीय उपचार दिया जा रहा है, जबकि वास्तव में शोधकर्ता उनके शरीर पर परमाणु विकिरण के दीर्घकालिक दुष्प्रभावों का अध्ययन कर रहे थे। इन प्रयोगों ने बाद में सरकारी शोध अभियानों की पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े किए।



















