गणेश चतुर्थी का पावन त्योहार पूरे देश में भगवान गणेश के जन्मोत्सव के तौर पर अत्यंत भक्तिभाव और उल्लास से मनाया जाता है। श्रद्धालु अपने घरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और बड़े-बड़े सार्वजनिक पंडालों में विधिवत पूजा-अर्चना के साथ गणपति बप्पा को विराजमान करते हैं। इस बार यह पावन उत्सव 14 सितंबर दिन सोमवार को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर बप्पा की प्रतिमा स्थापित कर दस दिवसीय महोत्सव का शुभारंभ होता है। इस महापर्व का समापन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी यानी अनंत चतुर्दशी पर विशाल शोभायात्राओं और विसर्जन के साथ संपन्न होता है।
गणपति की पूजा परंपरा में केवल मूर्ति स्थापना ही पर्याप्त नहीं मानी जाती, बल्कि उसके साथ कलश स्थापित करना भी अनिवार्य माना गया है। सनातन परंपरा में कलश को दिव्य शक्तियों, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक पवित्रता का अधिष्ठान माना जाता है। भगवान गणेश स्वयं विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता हैं, जिनका स्मरण प्रत्येक शुभ कार्य से पहले सभी अड़चनों को दूर करने के लिए किया जाता है। ऐसे में मंगलमूर्ति के स्वागत के साथ कलश स्थापित करने की पूरी प्रक्रिया का ज्ञान होना हर भक्त के लिए जरूरी है।
गणेश पूजन में कलश स्थापना का वास्तविक महत्व
वैदिक मान्यताओं के अनुसार कलश को समस्त देवी-देवताओं का स्वरूप माना गया है। जब भी किसी पूजा का संकल्प लिया जाता है, तब सर्वप्रथम स्थल की शुद्धि कर कलश की स्थापना होती है। इसके लिए सामान्य तौर पर तांबे, पीतल अथवा मिट्टी से निर्मित कलश का उपयोग किया जाता है। इस कलश में भरा हुआ निर्मल जल जीवन, चेतना और ऊर्जा का संचार करता है, जबकि इसके मुख पर रखा जाने वाला नारियल पूर्णता, सिद्धि और कल्याण का प्रतीक है।
गणेशोत्सव के दौरान कलश को भगवान गणेश की प्रतिमा के बिल्कुल समीप रखा जाता है। कई स्थानों पर पूजा का शुभारंभ ही कलश स्थापना, देवी-देवताओं के आह्वान और संकल्प के साथ होता है। मान्यता है कि कलश की स्थापना पूरे पूजा स्थल को शुद्ध बनाकर वहां सकारात्मक और सात्विक ऊर्जा का आभामंडल तैयार करती है।
कलश स्थापना की सटीक विधि और जरूरी वस्तुएं
गणपति बप्पा के विराजने से पहले पूजा वेदी को भली-भांति स्वच्छ करके एक लकड़ी की चौकी पर कलश रखना चाहिए। सबसे पहले पूजा स्थल का शुद्धिकरण संपन्न किया जाता है। इसके पश्चात कलश में शुद्ध जल भरा जाता है। इस जल में विशेष रूप से पवित्र गंगाजल, अक्षत, सुपारी और सिक्का डाला जाता है।
जल और अन्य सामग्रियों से पूरित इस कलश के कंठ पर आम या अशोक के पत्ते सजाए जाते हैं। पत्तों के ऊपर एक पानी वाला नारियल स्थापित किया जाता है। कलश के ठीक पास भगवान गणेश की मंगलकारी मूर्ति प्रतिष्ठित की जाती है। इसके उपरांत कलश और श्रीगणेश दोनों का षोडशोपचार अथवा पंचोपचार विधि से पूजन किया जाता है। हालांकि स्थानीय रीति-रिवाजों और पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार कलश में रखी जाने वाली पूजन सामग्री में थोड़ा-बहुत अंतर भी देखने को मिल सकता है। श्रद्धापूर्वक की गई यह पूजा जीवन की सभी बाधाओं का नाश करती है।
गणेशजी के पूजन के मुख्य अंग
गणेश चतुर्थी पर भगवान के आगमन के साथ ही भक्तजन उनका प्रिय भोग और सामग्रियां अर्पित करते हैं। बप्पा की पूजा में दूर्वा यानी दूब घास, मोदक, बेसन या मोतीचूर के लड्डू और लाल पुष्प मुख्य रूप से अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है और पवित्र मंत्रों का जाप होता है। यह संपूर्ण अनुष्ठान केवल धार्मिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह परिवार में पारस्परिक सद्भाव, शांति और सकारात्मक तरंगों के संचार का आध्यात्मिक माध्यम है।
10 दिवसीय गणेश महोत्सव 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां
गणेश उत्सव के दस दिनों के दौरान नियमित पूजा, आरती और विसर्जन का कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित है
- 14 सितंबर 2026, सोमवार: गणपति स्थापना और गणेश चतुर्थी का मुख्य पर्व।
- 15 सितंबर 2026, मंगलवार: गणपति पूजा एवं दैनिक आरती।
- 17 सितंबर 2026, गुरुवार: नियमित गणपति पूजा और अनुष्ठान।
- 18 सितंबर 2026, शुक्रवार: भगवान गणेश का विशेष पूजन और अर्चन।
- 22 सितंबर 2026, मंगलवार: गणपति पूजा एवं संकीर्तन।
- 24 सितंबर 2026, गुरुवार: उत्सव का अंतिम दिन और विसर्जन की पूर्व तैयारियां।
- 25 सितंबर 2026, शुक्रवार: अनंत चतुर्दशी पर्व और विधिपूर्वक गणपति विसर्जन।

















