भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर देशभर के घरों और भव्य पूजा पंडालों में विघ्नहर्ता भगवान गणेश के स्वागत की तैयारियां पूरी की जा चुकी हैं। देवों में प्रथम पूज्य माने जाने वाले गणपति बप्पा के आगमन को लेकर भक्तों में अपार उल्लास देखा जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चतुर्थी के पावन दिन विधि-विधान से भगवान गणेश की आराधना करने से जीवन के समस्त संकट कट जाते हैं तथा घर-परिवार में सुख, शांति और वैभव का वास होता है। इस वर्ष का उत्सव ज्योतिषीय दृष्टि से भी असाधारण माना जा रहा है क्योंकि इस बार कई दुर्लभ राजयोग और शुभ नक्षत्र संयोग एक साथ निर्मित हो रहे हैं।
चतुर्थी तिथि का समय विस्तार और उदया तिथि का निर्धारण
पंचांग गणना के अनुसार, चतुर्थी तिथि की शुरुआत 14 सितंबर को सुबह लगभग 7 बजकर 6 मिनट से हो रही है। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 15 सितंबर को सुबह लगभग 7 बजकर 44 मिनट पर होगा। सनातन परंपरा में धार्मिक पर्वों और अनुष्ठानों के निर्धारण में उदया तिथि को प्राथमिक आधार माना जाता है। इसी शास्त्रीय गणना के अनुरूप उदया तिथि की मान्यता को देखते हुए गणेश चतुर्थी का पावन पर्व पूरे श्रद्धा भाव से मनाया जा रहा है। भक्त अपने घरों में मिट्टी के बप्पा को विराजमान करने के लिए निर्धारित समय का विशेष ध्यान रख रहे हैं।
दोपहर में गणपति स्थापना की परंपरा और मध्याह्न काल का महत्व
गणेश प्रतिमा की स्थापना और पूजन के लिए दोपहर के समय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। पौराणिक आख्यानों और मान्यताओं के अनुसार, विघ्नहर्ता भगवान गणेश का प्राकट्य दोपहर के काल में हुआ था। यही कारण है कि शास्त्रीय नियमों में मध्याह्न काल को प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और दैनिक आराधना के लिए सर्वाधिक फलदायी माना गया है। ज्योतिषीय गणनाओं के मुताबिक, मध्याह्न की इस पावन वेला में की गई उपासना सीधे फलित होती है और साधक को मनवांछित सिद्धि प्रदान करती है।
पूजा के लिए 2 घंटे 28 मिनट का सटीक शुभ समय
गणपति पूजन के लिए निर्धारित समय चक्र सुबह 11:01 बजे से प्रारंभ होकर दोपहर 1:29 बजे तक प्रभावी रहेगा। इस प्रकार श्रद्धालुओं को प्रतिमा स्थापना और संपूर्ण विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन संपन्न करने के लिए कुल 2 घंटे और 28 मिनट की शुभ समयावधि प्राप्त हो रही है। जानकारों का कहना है कि इसी समयावधि के भीतर कलश स्थापना, बप्पा की चौकी सजाना और आह्वान करना सबसे मंगलकारी रहता है।
ब्रह्म, इंद्र और रवि योग के साथ हंसराज और मालव्य राजयोग का प्रभाव
इस बार गणेश चतुर्थी पर ग्रहों और नक्षत्रों की चाल बेहद कल्याणकारी स्थितियां बना रही है। पंचांग के अनुसार, इस दिन ब्रह्म योग, इंद्र योग और रवि योग विद्यमान रहेंगे। इसके साथ ही बृहस्पति देव के अपनी उच्च राशि में विराजमान होने से प्रतिष्ठित हंसराज योग का निर्माण हो रहा है। वहीं दैत्यगुरु शुक्र के अपनी स्वराशि तुला में संचरण करने से विख्यात मालव्य राजयोग घटित हो रहा है। इन योगों का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व इस प्रकार आंका गया है
- ब्रह्म योग: शास्त्रों में इस योग को किसी भी नए संकल्प और मांगलिक कार्य के शुभारंभ के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
- इंद्र योग: धार्मिक कृत्यों, अनुष्ठानों और देव पूजा में इंद्र योग की उपस्थिति कार्य को निर्विघ्न सिद्धि प्रदान करती है।
- रवि योग: यह योग वातावरण से समस्त नकारात्मक ऊर्जा और अशुभ प्रभावों का शमन कर प्रयासों में विजय दिलाता है।
- हंसराज योग: देवगुरु के प्रभाव से बनने वाले इस योग में साधना करने से जीवन के पूर्व संचित दोषों का निवारण होता है।
- मालव्य राजयोग: शुक्र के स्वराशि प्रभाव से बनने वाला यह राजयोग परिवार में भौतिक सुख, ऐश्वर्य, मानसिक शांति और समृद्धि की वृद्धि करता है।
भाद्रपद चतुर्थी का पौराणिक संदर्भ और विसर्जन परंपरा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के पावन अवसर पर ही माता पार्वती ने अपने संकल्प से भगवान श्री गणेश को प्रकट किया था। समस्त देवगणों में उन्हें प्रथम पूज्य का आसन दिया गया है, जिसके चलते किसी भी नए उपक्रम, गृह प्रवेश, व्यापार या धार्मिक अनुष्ठान के आरंभ में सबसे पहले गणेश जी का स्मरण और वंदन किया जाता है। चतुर्थी पर भक्त अपने घरों में बप्पा को लाकर बैठाते हैं, उनकी दैनिक सेवा करते हैं और अपनी कुल परंपरा के अनुसार निर्धारित समयावधि पूरी होने के बाद भावपूर्ण विदाई देते हुए प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। लोक आस्था है कि विदा होते समय गणपति अपने भक्तों के सारे कष्ट और विघ्न अपने संग ले जाते हैं और बदले में अनंत शुभता का वरदान दे जाते हैं।



















