संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को हुई एक वोटिंग ने दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले नक्शों की सदियों पुरानी एक खामी को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया. भारी बहुमत से पारित हुए इस प्रस्ताव का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि दुनिया के नक्शों में देशों और महाद्वीपों का आकार असलियत के जितना करीब दिखे. मतदान में 164 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला, अमेरिका ने इसका विरोध किया, जबकि छह देश वोटिंग से दूर रहे.
भारत ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, लेकिन साथ ही अपनी स्थिति साफ कर दी. भारत का कहना है कि इस समर्थन को किसी एक तय नक्शा तकनीक, मसलन इक्वल-एरिया मैप प्रोजेक्शन, के प्रचार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
भारतीय राजनयिक ने क्या कहा
भारतीय राजनयिक रघु पुरी ने इस मौके पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि प्रस्ताव को इस तरह पढ़ा जाना चाहिए कि इसे "समान क्षेत्रफल वाले नक्शा प्रोजेक्शन्स के व्यापक इस्तेमाल और विचार को बढ़ावा देने के रूप में समझा जाना चाहिए", न कि इक्वल अर्थ या किसी और खास प्रोजेक्शन तकनीक को आधिकारिक मान्यता देने के रूप में. उनके मुताबिक हर मैप प्रोजेक्शन किसी खास भौगोलिक जरूरत, जैसे आकार, दिशा या दूरी को बेहतर दिखाने के हिसाब से बनाया जाता है, इसलिए इस पूरे मसले पर भारत का रुख तकनीकी और पद्धतिगत रूप से तटस्थ है.
पुरी ने आगे यह भी बताया कि जब लक्ष्य महाद्वीपों का आपसी सापेक्ष आकार सही-सही दिखाना हो, तब इक्वल-एरिया तरीका काम का साबित होता है, क्योंकि इससे नक्शों में भूभाग के आकार को लेकर बनने वाली गलत धारणाएं कम होती हैं. भारत ने इसी सोच के आधार पर प्रस्ताव को समर्थन दिया है, मगर किसी एक कार्टोग्राफिक तरीके या प्रोजेक्शन को हर जगह अनिवार्य बनाने की मांग का समर्थन नहीं किया.
अफ्रीकी देशों ने यह मुद्दा क्यों उठाया
यह प्रस्ताव अफ्रीकी देशों की पहल पर सामने आया. इनकी सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि दुनिया भर में चलन में मौजूद नक्शे अफ्रीका महाद्वीप को उसके वास्तविक आकार से कहीं छोटा दिखाते हैं. प्रस्ताव में समान क्षेत्रफल वाले प्रोजेक्शन के ज्यादा व्यापक इस्तेमाल को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है, ताकि यह असंतुलन दूर हो सके.
मर्केटर प्रोजेक्शन की वो पुरानी पेचीदगी
इस पूरी बहस के केंद्र में साल 1569 में तैयार हुआ मर्केटर प्रोजेक्शन है. यह नक्शा तकनीक जहाजरानी और समुद्री नौवहन के लिए लंबे समय से बेहद उपयोगी मानी जाती रही है, लेकिन इसकी एक बड़ी सीमा है. भूमध्य रेखा से जितना दूर कोई क्षेत्र स्थित होता है, यह प्रोजेक्शन उसे असल आकार से उतना ही बड़ा दिखा देता है. यही वजह है कि यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे इलाके नक्शे पर वास्तविकता से काफी बड़े नजर आते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के नजदीक बसा अफ्रीका तुलना में छोटा दिखता है.
अफ्रीकी देशों का तर्क है कि यह सिर्फ नक्शानवीसी की एक तकनीकी चूक नहीं है. दशकों तक चली इस विकृति ने दुनिया भर के लोगों की सोच में अफ्रीका के वास्तविक आकार और वैश्विक अहमियत को लेकर एक गलत तस्वीर भी गढ़ दी है. इसी वजह से 'करेक्ट द मैप' मुहिम को महज एक तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व वाला कदम माना जा रहा है.
क्या अब सारे नक्शे तुरंत बदल जाएंगे
यह ध्यान रखना जरूरी है कि महासभा का यह प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है. इसका मतलब है कि दुनिया भर में स्कूलों, किताबों, दफ्तरों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल हो रहे मर्केटर आधारित नक्शों को फौरन बदलने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं बनती. प्रस्ताव का असल मकसद सिर्फ इतना है कि आने वाले समय में ज्यादा सटीक और अनुपात में संतुलित कार्टोग्राफिक तरीकों को धीरे-धीरे बढ़ावा मिले, और भारत ने इसी सीमित लेकिन साफ मकसद के आधार पर अपना वोट डाला है.




















