भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति संप्रदाय का अत्यंत विशिष्ट स्थान रहा है, जहां परम सत्ता को जगज्जननी के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब देवी सती ने अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ कुंड में देहत्याग किया था, तब शोकमग्न भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड में तांडव करने लगे थे। सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी के पार्थिव देह को विभिन्न खंडों में विभाजित कर दिया। देवी पुराण, शिवचरित्र तथा तंत्रचूड़ामणि जैसे प्रतिष्ठित ग्रंथों में इक्यावन अथवा बावन प्रमुख शक्तिपीठों का उल्लेख प्राप्त होता है। भारतीय उपमहाद्वीप में पश्चिम बंगाल वह पावन भूभाग है, जहां इन शक्तिपीठों का सबसे सघन जमावड़ा देखने को मिलता है। यही भौगोलिक और आध्यात्मिक सघनता इस क्षेत्र को सदियों से गूढ़ तांत्रिक साधना, तंत्र विज्ञान और गुप्त उपासना पद्धतियों का वैश्विक गढ़ बनाती आई है।
पूर्व मेदिनीपुर का कपालिनी मंदिर और तामलुक की विरासत
दक्षिण बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में रूपनारायण नदी के समीप स्थित तामलुक नगर प्राचीन काल से ही शक्ति आराधना का केंद्र रहा है। पौराणिक आख्यानों के मुताबिक यहां देवी सती की बाईं एड़ी का पतन हुआ था। इस तीर्थ स्थल पर जगन्माता को देवी कपालिनी अथवा भीमरूपा के रूप में पूजा जाता है, जिन्हें स्थानीय श्रद्धालु वर्गा भीमा के नाम से भी पुकारते हैं। यहां भगवान महादेव 'सर्वानंद' भैरव के रूप में विराजमान होकर शक्ति की रक्षा करते हैं। कपालिनी शब्द का मूल अर्थ खप्पर अथवा नरमुंड धारण करने वाली पराम्बा से है। साधकों का ऐसा विश्वास है कि देवी के इस उग्र और करुणामयी स्वरूप की उपासना करने से जीवन की समस्त नकारात्मक ऊर्जाएं भस्म हो जाती हैं तथा साधक को अदम्य साहस, निर्भयता और आंतरिक बल की प्राप्ति होती है।
हुगली की पवित्र भूमि पर प्रतिष्ठित रत्नावली पीठ
हुगली जिले के अंतर्गत आने वाला रत्नावली शक्तिपीठ साधकों के लिए अत्यंत पूजनीय तीर्थ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर सती का दायां कंधा गिरा था। इस पावन पीठ पर आदिशक्ति को 'कुमारी' अथवा 'आनंदमयी' नाम से वंदनीय माना गया है, जबकि उनके साथ भगवान शिव 'भैरव' स्वरूप में स्थित हैं। यहां की आराधना पद्धति में देवी के कौमार्य भाव और आनंद स्वरूप का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिसके कारण गृहस्थ और संन्यासी दोनों ही वर्ग अपनी आत्मिक शांति की कामना से यहां शीश नवाते हैं।
मुर्शीदाबाद का ऐतिहासिक किरीटेश्वरी धाम
मुर्शीदाबाद जिले के किरीटकोण ग्राम में स्थापित किरीटेश्वरी शक्तिपीठ की गणना अत्यंत जागृत पीठों में की जाती है। इस स्थान पर सती का मुकुट अथवा किरीट गिरा था, जिसके कारण इस क्षेत्र को किरीटपीठ कहा गया। यहां मुख्य विग्रह के रूप में मां विमला देवी की प्रतिष्ठा है, जिनके साथ देवाधिदेव महादेव संभर्ध्व अथवा काल भैरव के रूप में संबद्ध हैं। तंत्र शास्त्रों में मां विमला की आराधना के लिए 'ॐ ह्रीं विमलायै नमः' बीज मंत्र का विधान बताया गया है। इस मंत्र के नियमित जप से साधकों के चित्त की मलिनता दूर होती है और उन्हें उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियां प्राप्त होती हैं।
जलपाईगुड़ी के सघन वनों में मां भ्रामरी का वास
उत्तरी बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में बोडा मंडल के अंतर्गत सालबाढ़ी ग्राम में मां भ्रामरी देवी का मंदिर स्थित है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थल तीस्ता नदी के निकटवर्ती घने जंगलों के बीच एक शांत और सुरम्य वातावरण में बना हुआ है। पौराणिक विवरणों के अनुसार यहां देवी सती का बायां पैर गिरा था। इस शक्तिपीठ में पराशक्ति 'भ्रामरी' रूप में पूजी जाती हैं और उनके संग भैरव 'ईश्वर' नाम से प्रतिष्ठित हैं। देवी भ्रामरी को मां कालिका अथवा भद्रकाली का वह विशिष्ट स्वरूप माना गया है, जो असंख्य काले भ्रमरों से घिरी रहती हैं। प्रकृति की गोद में स्थित होने के कारण यहां का वातावरण उच्च कोटि के ध्यान और एकांत साधना के सर्वथा अनुकूल माना जाता है।
वर्धमान जिले के केतुग्राम में स्थित बहुला शक्तिपीठ
वर्धमान जिले का केतुग्राम क्षेत्र मां बहुला के पावन धाम के लिए विख्यात है। माना जाता है कि इस पवित्र धरा पर दक्षकुमारी सती की बाईं भुजा गिरी थी। इस शक्तिपीठ में देवी की वंदना 'मां बहुला' के रूप में होती है, जबकि भैरव स्वरूप शिव को 'भीरुक' नाम से जाना जाता है, जिन्हें सर्वसिद्धि प्रदाता माना गया है। इस मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है कि सच्चे अंतःकरण से की गई प्रार्थना से जीवन के सभी दारिद्र्य और अवरोध समाप्त हो जाते हैं तथा साधक को मानसिक स्थिरता एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है।
उजानी का मंगल चंद्रिका पीठ और तांत्रिक अनुष्ठान
वर्धमान जिले के ही उजानी गांव में देवी मंगल चंद्रिका का अत्यंत प्राचीन शक्तिपीठ अवस्थित है। इस स्थल पर सती की दाहिनी कलाई का पतन हुआ था। यहां शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा को 'मंगल चंडी' के रूप में पूजा जाता है और उनके रक्षक भैरव 'कपिलांबर' कहलाते हैं। लोक मान्यता के अनुसार मंगल चंडी की नियमित अर्चना से पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं, घर में सुख शांति का वास होता है और सभी प्रकार के अमंगलों का नाश होता है। यह क्षेत्र विशेष रूप से गुप्त तांत्रिक अनुष्ठानों, षटकर्म और विशिष्ट कामनापरक साधनाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है।
बीरभूम के वक्रेश्वर में भ्रूमध्य का पतन स्थल
पश्चिम बंगाल का बीरभूम जिला शक्ति साधना की दृष्टि से भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण जिला माना जाता है। बीरभूम में पापहर नदी के पावन तट पर वक्रेश्वर शक्तिपीठ स्थापित है। ग्रंथों के अनुसार यहां सती के दोनों नेत्रों के बीच का भाग यानी भ्रूमध्य अथवा उनका दिव्य 'मन' गिरा था। इस पीठ पर देवी को 'महिषासुरमर्दिनी' तथा भगवान शिव को 'वक्रनाथ' कहा जाता है। चूंकि भ्रूमध्य आज्ञा चक्र का प्रतीक है, इसलिए कुंडलिनी जागरण और यौगिक क्रियाओं के अभ्यासी साधक इस भूमि को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
नलहाटी का चमत्कारी कंठ पीठ
बीरभूम जिले के नलहाटी कस्बे में स्थित नलहाटी शक्तिपीठ की महिमा अद्भुत है। यहां देवी सती का कंठ अथवा श्वासनली गिरी थी। इस पावन धाम में देवी 'कालिका' रूप में तथा भैरव 'योगीश' रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित माता के मुख के निचले भाग में एक नाला या कंठ का स्थान बना हुआ है। यहां एक विस्मयकारी मान्यता प्रचलित है कि उस कंठ भाग में चाहे जितना भी जल अर्पित किया जाए, वह स्थल कभी जलमग्न नहीं होता और न ही कभी सूखता है। अर्पित करते समय श्रद्धालुओं को जल निगलने जैसी ध्वनि का आभास होता है, जो आज भी कौतूहल का विषय बना हुआ है।
लाभपुर का अट्टहास और विशाल प्राकृतिक शिला की पूजा
बीरभूम के लाभपुर क्षेत्र में फुल्लारा देवी शक्तिपीठ स्थित है, जिसे तांत्रिक परंपरा में अट्टहास पीठ भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि यहां सती का निचला ओंठ गिरा था। इस तीर्थ में देवी 'फुल्लरा' और महादेव 'विश्वेश' रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर का सबसे विशिष्ट पहलू यह है कि यहां किसी तराशी हुई मानवरूपी प्रतिमा की पूजा नहीं होती, बल्कि गर्भगृह में पंद्रह से अठारह फीट लंबी एक विशालकाय प्राकृतिक पाषाण शिला स्थापित है, जिसे ही साक्षात भगवती का स्वरूप मानकर सिंदूर और वस्त्रों से अलंकृत किया जाता है।
सैंथिया का नंदीपुर पीठ और कछुआ शिला
बीरभूम के सैंथिया कस्बे में स्थित नंदीपुर शक्तिपीठ में सती का कंठहार गिरा था। यहां देवी को 'नंदिनी' और भगवान शिव को 'नंदिकेश्वर' भैरव के नाम से पूजा जाता है। एक विशाल वटवृक्ष की घनी छाया में स्थित इस मंदिर में देवी का विग्रह कछुए के आकार की एक पाषाण शिला के रूप में दिखता है। इस पाषाण पर सिंदूर का गहरा लेप रहता है, जिसके ऊपर एक भव्य चांदी का मुकुट और सोने की बनी तीन दिव्य आंखें सुसज्जित की गई हैं। कछुए की यह आकृति कूर्म पीठ का प्रतीक मानी जाती है, जो स्थिर साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।
क्षीरग्राम की युगाद्या देवी और क्षीरडिघी का रहस्य
वर्धमान जिले के क्षीरग्राम में युगाधा शक्तिपीठ प्रतिष्ठित है, जहां सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहां अधिष्ठात्री देवी को 'युगाद्या' अथवा 'भूतधात्री' और भैरव को 'क्षीर कंठक' कहा जाता है। इस पीठ से जुड़ी एक दुर्लभ परंपरा यह है कि देवी की मूल मूर्ति मंदिर के गर्भगृह में हमेशा नहीं रखी जाती, बल्कि वह पास ही स्थित 'क्षीरडिघी' नामक पवित्र सरोवर के अथाह जल में सुरक्षित रखी जाती है और विशेष वार्षिक उत्सवों पर ही उसे जल से बाहर निकाला जाता है।
कोलकाता का विश्वप्रसिद्ध कालीघाट शक्तिपीठ
महानगर कोलकाता में आदि गंगा के तट पर स्थित कालीघाट शक्तिपीठ विश्व भर के शाक्त भक्तों की आस्था का मुख्य केंद्र है। परंपरा के अनुसार यहां सती के दाएं पैर की उंगलियों का पतन हुआ था। इस महान पीठ पर भगवती 'कालिका' रूप में और उनके भैरव 'नकुलेश्वर' रूप में पूजे जाते हैं। कालीघाट का तांत्रिक और आध्यात्मिक प्रभाव इतना व्यापक है कि देश-विदेश से लाखों साधक अपनी साधना की सिद्धि के लिए यहां वर्ष भर आते रहते हैं।



















