भारत के एशियाई खेलों के सफर में 100 पदकों की दीवार सात दशकों से अधिक समय तक बनी रही. नई दिल्ली वाली पहली मेजबानी ने 1951 में शुरुआत की थी, लेकिन महामारी के कारण 2023 में आयोजित ग्वांग्झू 2022 संस्करण में 107 पदक आने के बाद यह मानसिक सीमा टूटी. इन सालों में भारत ने कुल 779 पदक जोड़े.
नई दिल्ली 1951 ने दी एशियाई खेलों को दिशा
मार्च 1951 की ठंडी दोपहर नई दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में खेल इतिहास का अहम मुकाम था. आजादी के चार साल बाद और विभाजन के दुख के बीच भारत ने पहले एशियाई खेलों की जिम्मेदारी संभाली. मेजबानी करना ही पर्याप्त नहीं था; नए गणतंत्र ने इन खेलों की भावना को भी आकार दिया.
एवर ऑनवर्ड को आदर्श वाक्य बनाकर भारत ने 11 एशियाई देशों को एक साथ लाया. इस आयोजन से सहभागिता, खेलभावना, भाईचारे और मानवीय हौसले का संदेश गया. संकेत साफ था कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत अपनी पहचान प्रतिस्पर्धिता और साहस से बनाएगा.
सचिन नाग ने 100 मीटर फ्रीस्टाइल स्विमिंग में स्वर्ण जीता. लावी पिंटो ने उसी आयोजन में नए सिंथेटिक ट्रैक पर 100 मीटर और 200 मीटर दौड़ में दो स्वर्ण अपने नाम किए. ये प्रदर्शन केवल तालिका में जोड़े गए पदक नहीं थे; लंबे समय तक दबी रही राष्ट्रीय ऊर्जा के बाहर आने का संकेत थे कि देश अब दौड़ने, कूदने और विश्व मंच पर अपना स्थान बनाने के लिए तैयार है.
पिछले एशियाई खेलों में भारत का पदक योग 100 से ज्यादा रहा था. इसलिए अब इतिहास को देखते समय 1951 की शुरुआत और 2023 की 107 पदकों वाली उपलब्धि को एक ही लंबी यात्रा के दो अहम पड़ाव माना जाता है.
पाकिस्तान और ब्रैडमैन से जुड़े अलग खेल नतीजे
इस अवधि के अन्य खेल संदर्भों में इंग्लैंड ने अपने घर में इतिहास रचा और पाकिस्तान का सूपड़ा साफ कर दिया. आखिरी टेस्ट 8 विकेट से जीतकर इंग्लैंड ने सीरीज 3-0 से अपने नाम कर ली.
टेस्ट श्रृंखला के 5 सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाजों में दो के पास 900 से अधिक रन हैं. इसी दौर में 96 साल से पुराना ब्रैडमैन का विश्व कीर्तिमान अभी भी कायम है.
संघर्ष के दशकों में चमके बड़े प्रदर्शन
शुरुआती उत्साह के बाद भी भारत का रास्ता हर दशक में आसान नहीं रहा. एशियाई खेल प्रशंसकों के लिए उम्मीद और अधूरे सपनों का मिश्रण बने रहे. देश ने कुछ बेहद खास उपलब्धियां देखीं, लेकिन लंबे समय तक कुल पदक संख्या बड़े स्तर तक नहीं पहुंच पाई.
टोक्यो 1958 में मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख के नाम से जाना गया और उन्होंने 200 मीटर तथा 400 मीटर दौड़ में दोहरा स्वर्ण जीता. सियोल 1986 में पीटी उषा ने चार स्वर्ण पदक जीतकर असाधारण प्रदर्शन किया. भारतीय हॉकी टीमों ने भी उस दौर में कड़े मुकाबले दिए और यही प्रतियोगी भावना उस समय की पहचान बनी.
ये सफलताएं मुश्किल समय में रोशनी की तरह थीं, फिर भी वर्षों तक भारत का कुल पदक योग 20, 30 या 40 के आसपास ही सिमटा रहा. सात दशकों से अधिक के लेखे में कुल 779 पदक आए, जिनमें 183 स्वर्ण, 239 रजत और 357 कांस्य शामिल हैं. यह हिसाब शुरुआती संघर्ष, सीमित संसाधनों और लगातार कोशिश करने वाले जज्बे को भी बयान करता है.
2023 से पहले 100 पदकों का संकल्प मजबूत हुआ
ग्वांग्झू 2022 संस्करण महामारी के कारण 2023 में आयोजित हुआ. इस बार भारतीय खेलों को देखने का नजरिया पहले से अलग था. पुरानी हिचकिचाहट पीछे छूटी और खिलाड़ियों तथा तैयारी के माहौल में नया आत्मविश्वास दिखा.
चीन रवाना होने से पहले प्रशिक्षण शिविरों में एक नारा प्रमुख था: इस बार, 100 पार. कई विश्लेषक इस लक्ष्य को वास्तविकता से परे मान रहे थे, क्योंकि 2018 जकार्ता खेलों में भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 70 पदकों तक था. 100 से ज्यादा पदक उस समय मुख्य रूप से चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी खेल ताकतों से जोड़े जाते थे.
कई खेलों में प्रदर्शन ने बदल दिखाई
ग्वांग्झू में सफलता किसी एक विधा तक सीमित नहीं रही. मुकाबलों के दौरान लगातार तिरंगा लहराया और राष्ट्रगान सुनाई देता रहा. एथलीटों ने अलग अलग मैदानों पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देकर भारत के पदक समीकरण को व्यापक बना दिया.
ड्रेसॉज स्पर्धा में चार युवा घुड़सवार स्वर्ण से लौटे और इस जीत ने 41 साल के सूखे को समाप्त किया. निशानेबाजी में नई पीढ़ी ने मजबूत एकाग्रता और सटीकता दिखाई. दोनों प्रदर्शन बताते थे कि पदक की संभावना अब कुछ चुनिंदा खेलों तक सीमित नहीं रही.
बैडमिंटन में सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने चीन, मलेशिया और कोरिया की उन जोड़ियों को हराया, जिन्हें लंबे समय से मजबूत माना जाता था. जीत के साथ दोनों ने ऐतिहासिक पुरुष युगल खिताब अपने नाम किया. यह भारत के लिए पारंपरिक ताकतों को चुनौती देने का अहम पल था.
ट्रैक एंड फील्ड में नीरज चोपड़ा लगातार दूसरी बार एशियाई खेलों के स्वर्ण तक पहुंचे. तीरंदाजी, कुश्ती और अन्य खेलों में भी भारतीय प्रदर्शन शानदार रहा. इस तरह पदकों की बढ़ोतरी केवल एक खेल के सहारे नहीं हुई.
107 पदकों ने बदला भारतीय खेलों का आंकलन
प्रतियोगिताओं के अंत में भारत के नाम 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य पदक आए. इन तीनों को मिलाकर कुल योग 107 बना और भारत पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा. 100 पदकों की सीमा, जो लंबे समय से मन पर भारी थी, अंततः पार हो गई.
ग्वांग्झू एशियाई खेल भारतीय खेलों के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुए. यहां से राष्ट्रीय प्रदर्शन की चर्चा केवल सहभागिता तक नहीं रही, बल्कि वैश्विक मंच पर एक मजबूत पहचान बनाने तक पहुंची. 107 पदकों ने सात दशकों के संघर्ष को एक नए आत्मविश्वास में बदल दिया.
आइची-नागोया अब अगली कसौटी
अब ध्यान जापान में होने वाले आइची-नागोया खेलों पर केंद्रित है और खेल प्रेमी भारतीय दल को देख रहे हैं. हंगझोऊ की सफलता ने दिखा दिया कि भारत 100 पदकों की सीमा पार कर सकता है. आइची-नागोया में असली परीक्षा यह होगी कि 107 पदकों वाली उपलब्धि को नए सफर की शुरुआत साबित किया जाए, न कि अंतिम मंजिल.



















