बहराइच जिले के हुजूरपुर क्षेत्र के गौरिया गांव की रहने वाली संगीता मौर्य आज अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। संगीता ऊन की मदद से तरह-तरह के आकर्षक हस्तशिल्प उत्पाद तैयार कर रही हैं, जिनकी बाजार में काफी मांग है। उनके द्वारा बनाए गए खूबसूरत कछुए, प्यारी मधुमक्खियां और रंग-बिरंगे गुलदस्ते लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं। ये हस्तनिर्मित उत्पाद न केवल देखने में बेहद सुंदर लगते हैं, बल्कि घरों की सजावट में भी चार चांद लगा देते हैं। संगीता की यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।
स्वयं सहायता समूह से शुरू हुआ सफर
संगीता मौर्य का यह सफर इतना आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि जब वह शुरुआत में महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं, तब उन्हें काम के बारे में ज्यादा समझ नहीं थी। शुरुआती दो साल तक वह समूह की गतिविधियों को समझने का प्रयास करती रहीं। धीरे-धीरे जब उन्हें सारी व्यवस्था समझ में आ गई, तो उन्हें समूह की बुक्कीपर (लेखा-जोखा रखने वाली) की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद वह समूह सखी बनीं और आज वह न केवल खुद आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, बल्कि अपने साथ-साथ अन्य ग्रामीण महिलाओं को भी आगे बढ़ाने और उन्हें सशक्त बनाने का काम कर रही हैं।
यूट्यूब और पारंपरिक कला का अनोखा संगम
समूह से जुड़ने के बाद संगीता के मन में अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने का विचार आया। उन्होंने कुछ अलग करने की ठानी और इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया। उन्होंने यूट्यूब पर ऊन से खिलौने और सजावटी सामान बनाने के वीडियो देखना शुरू किया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी मां और दादी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पारंपरिक बुनाई के तरीकों को भी इसमें शामिल किया। इस तरह आधुनिक और पारंपरिक कला के मेल से उन्होंने अद्भुत उत्पाद बनाने शुरू कर दिए। आज वह ऊन के सुंदर खिलौने, गुलदस्ते और सजावटी सामान बहुत ही कम समय में तैयार कर लेती हैं।
लागत से दोगुना मुनाफा और ऑनलाइन बिक्री
संगीता मौर्य ने अपने इन उत्पादों की बिक्री के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों का सहारा लिया है। उनके उत्पादों को ऑनलाइन भी खरीदा जा सकता है। इसके अलावा, यदि कोई ग्राहक व्यक्तिगत रूप से इन सामानों को खरीदना चाहता है, तो वह बहराइच जिले के हुजूरपुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले गौरिया गांव में जाकर सीधे संगीता से संपर्क कर सकता है। इस व्यवसाय में मुनाफे की बात करें तो संगीता ने बताया कि इसमें लगभग 50 प्रतिशत तक का शानदार मार्जिन मिलता है। उदाहरण के लिए, जो सामान ₹50 की लागत में बनकर तैयार होता है, वह बाजार में ₹100 में बेहद आसानी से बिक जाता है।
हाथों की कारीगरी और मेहनत की कीमत
इन मनमोहक उत्पादों को तैयार करने में महिलाओं को कई घंटों की कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। संगीता ने बताया कि इन सामानों को बनाने के लिए किसी भी तरह की मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। महिलाएं अपने हाथों से सूई और धागे की मदद से इनकी बुनाई करती हैं। अलग-अलग डिजाइन और आकार के हिसाब से हर उत्पाद को बनाने में अलग-अलग समय लगता है। इन सामानों की कीमत का निर्धारण भी इसी आधार पर किया जाता है। इसमें लगने वाली सामग्री की लागत और बनाने में लगे समय (मेहनताना) को जोड़कर ही अंतिम मूल्य तय किया जाता है, जिससे महिलाओं को उनकी मेहनत का सही दाम मिल सके।











