सतना जिले के कृपालपुर गांव में एक ऐसी पुस्तकालय है, जहां पिछले 27-28 सालों से हजारों बच्चों को बिल्कुल मुफ्त में पढ़ने की सुविधा मिल रही है। आज के दौर में जब स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग तक हर जगह खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, तब यह जगह आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण इलाकों के छात्रों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यहां न तो सदस्यता के लिए कोई लंबा फॉर्म भरना पड़ता है और न ही कोई कागजी झंझट झेलना पड़ता है, सिर्फ एक पहचान पत्र दिखाकर कोई भी छात्र यहां बैठकर पढ़ाई कर सकता है, शांत माहौल में समय बिता सकता है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जरूरी किताबें भी मुफ्त में इस्तेमाल कर सकता है।
1998 में हुई थी शुरुआत, तब से लगातार बढ़ता गया दायरा
कृपालपुर की इस पुस्तकालय का नाम अमर शहीद लाल पद्मधर सिंह पुस्तकालय है और इसकी नींव 12 अगस्त 1998 को रखी गई थी। उस वक्त इसका मकसद सिर्फ इतना था कि गांव के गरीब और जरूरतमंद बच्चों तक पढ़ाई के अच्छे संसाधन पहुंचाए जा सकें, ताकि पैसों की कमी किसी के सपनों के आड़े न आए। पिछले लगभग तीन दशकों में यह छोटी सी पहल धीरे-धीरे बड़ा रूप ले चुकी है और आज पूरे इलाके के लिए ज्ञान का एक बड़ा केंद्र बन गई है। यहां बच्चों के लिए बाल साहित्य से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी वाली किताबें, सामान्य ज्ञान की किताबें, साहित्य और आजकल की ई-बुक्स तक हर तरह की सामग्री मौजूद है, ताकि बदलते परीक्षा पैटर्न के हिसाब से भी छात्र खुद को तैयार रख सकें। यही वजह है कि यहां स्कूली बच्चों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं तक, हर उम्र के विद्यार्थी पढ़ने पहुंचते हैं।
महीने में 400 से 500 छात्र, अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा जुड़े
नगर निगम में कार्यरत संजय दहिया बताते हैं कि ज्यादा से ज्यादा छात्रों को मौका देने के लिए यह पुस्तकालय दो शिफ्टों में चलती है, पहली शिफ्ट सुबह 7 बजे से दोपहर 12 बजे तक और दूसरी शाम 4 बजे से 6 या 7 बजे तक चलती है। एक समय में यहां 20 से 25 बच्चे एक साथ बैठकर पढ़ाई कर सकते हैं, ताकि हर किसी को बैठने और ध्यान लगाकर पढ़ने की जगह मिल सके। हर महीने करीब 400 से 500 विद्यार्थी इस पुस्तकालय का रुख करते हैं और पिछले 27-28 सालों में डेढ़ लाख से ज्यादा छात्र यहां से पढ़कर अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, जो अपने आप में इस पहल की सफलता की बड़ी मिसाल है। समाजसेवियों और नगर निगम के सहयोग से यहां 500 से ज्यादा जरूरी किताबें और पढ़ाई की दूसरी सामग्री जुटाई गई है, जिसकी वजह से छात्रों को अलग से महंगी किताबें खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और उनके परिवार पर पढ़ाई का आर्थिक बोझ भी कम होता है।
आसपास के गांवों के लिए बड़ी राहत
इस पुस्तकालय का सबसे ज्यादा फायदा आसपास के गांवों में रहने वाले छात्रों को मिल रहा है। मरौहा, माधवगढ़, कृपालपुर, माटेहना और सज्जनपुर जैसे गांवों से छात्र-छात्राएं रोज नियमित रूप से यहां पढ़ने आते हैं। मरौहा गांव की रहने वाली अर्पिता कुशवाहा डिग्री कॉलेज से बीए पास कर चुकी हैं और अभी इसी पुस्तकालय में बैठकर मध्य प्रदेश पुलिस जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना है कि पहले बेहतर पढ़ाई के लिए शहर तक जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव के पास ही सारी जरूरी किताबें और शांत माहौल मिल जाता है। इससे समय और पैसा दोनों बचता है और साथ ही तैयारी भी पहले से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से हो पाती है, क्योंकि रोज शहर आने-जाने में जो घंटों बर्बाद होते थे, अब वे पढ़ाई में लग जाते हैं।
सिर्फ परीक्षा की तैयारी नहीं, पढ़ने की आदत भी बन रही मजबूत
यह पुस्तकालय केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों में किताबें पढ़ने की आदत डालने का भी काम कर रही है। छोटे बच्चों के लिए यहां बाल साहित्य रखा गया है, युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें और ई-बुक्स उपलब्ध हैं, जबकि बड़ी उम्र के लोगों के लिए अखबार और मैगजीन पढ़ने की भी सुविधा दी गई है। यानी एक ही जगह पर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सबके लिए कुछ न कुछ मौजूद है। यही वजह है कि यह पुस्तकालय हर आयु वर्ग के लोगों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है और गांव के माहौल में शिक्षा की एक मजबूत और स्थायी नींव तैयार कर रही है।











