पटना में किडनी मरीज आज भी डॉ. हेमंत कुमार को भगवान का दर्जा देते हैं, और यह तारीफ बेवजह नहीं है। मुंगेर जिले के जमालपुर से निकलकर आज वे देश के सबसे जाने-माने नेफ्रोलॉजिस्ट में गिने जाते हैं और उन्हें देश का प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान भी मिल चुका है। पटना के शेखपुरा में आज भी उनके नाम से एक क्लीनिक चलता है, जहां दूर-दूर से किडनी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं।
शुरुआती पढ़ाई और मुंगेर से पटना तक का सफर
डॉ. हेमंत की शुरुआती पढ़ाई जमालपुर के ईस्टर्न रेलवे बॉयज हाई स्कूल में हुई। मैट्रिक हो या इंटरमीडिएट, दोनों परीक्षाएं उन्होंने द्वितीय श्रेणी से पास कीं, यानी शुरुआत से ही कोई शानदार टॉपर वाली कहानी नहीं थी। इंटर के बाद उन्होंने मुंगेर के आरडी एंड डीजे कॉलेज में बॉटनी विषय से बीएससी में दाखिला लिया, लेकिन यह पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। यहीं से उनके जीवन का रुख बदला और वे आगे की पढ़ाई के लिए पटना आ गए, जहां उन्होंने मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने की ठानी।
मेडिकल डिग्रियों से नेफ्रोलॉजी तक का सफर
जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज से उन्होंने एमबीबीएस पूरा किया। इसके बाद पटना में उन्होंने मेडिसिन में एमडी की डिग्री हासिल की और साथ ही चेस्ट डिजीज में डिप्लोमा भी किया। लेकिन उनकी असली पहचान बीएचयू यानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बनी, जहां उन्होंने नेफ्रोलॉजी में डीएम की डिग्री ली। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि बिहार में नेफ्रोलॉजी में डीएम की डिग्री लेने वाले वे पहले डॉक्टर बने। बाद के वर्षों में उन्होंने आईजीआईएमएस और पीएमसीएच जैसे बड़े संस्थानों में नेफ्रोलॉजी विभाग का नेतृत्व भी किया।
किडनी मरीजों के लिए बड़ा योगदान
डॉ. हेमंत के प्रयासों की बदौलत ही पीएमसीएच में पहली बार 24 घंटे डायलिसिस की सुविधा शुरू हो सकी, जो उस दौर में बड़ी बात थी। इसके अलावा पटना के गार्डिनर अस्पताल समेत कई अस्पतालों में किडनी रोग के इलाज और निःशुल्क डायलिसिस सेवाओं को खड़ा करने में उनकी अहम भूमिका रही। बिहार में लगातार एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस यानी सीएपीडी तकनीक शुरू कराने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। नवजात शिशुओं से लेकर गर्भवती महिलाओं, कैंसर मरीजों, बुजुर्गों और गरीब मरीजों तक, हर वर्ग के लिए किडनी उपचार को सुलभ बनाने की दिशा में उन्होंने लगातार काम किया।
समाजसेवा, शिक्षा और शोध में भूमिका
डॉ. हेमंत सिर्फ एक डॉक्टर भर नहीं हैं, बल्कि एक समाजसेवी और शिक्षक की भूमिका भी उतनी ही गंभीरता से निभाते हैं। उन्होंने पाटलिपुत्र नेशनल किडनी फाउंडेशन की स्थापना की, जिसके जरिए वर्षों से विश्व किडनी दिवस पर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। बिहार में मृत व्यक्ति के अंगदान को बढ़ावा देने वाले प्रमुख लोगों में भी उनका नाम शामिल है। मेडिकल शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी उनका योगदान कम नहीं रहा। गर्भावस्था के दौरान होने वाली गंभीर किडनी बीमारी और नवजात शिशुओं की किडनी संबंधी दिक्कतों पर किए गए उनके शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा जा चुका है।
प्रशासनिक जिम्मेदारियां और राष्ट्रीय भूमिका
अपने लंबे करियर के दौरान डॉ. हेमंत ने कई अहम प्रशासनिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियां भी संभालीं। वे आईजीआईएमएस में उप चिकित्सा अधीक्षक रहे, परीक्षा नियंत्रक की भूमिका निभाई और संस्थान के गवर्निंग बोर्ड के सदस्य भी रहे। इसके अलावा वे इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के पूर्वी क्षेत्र के अध्यक्ष रहे और राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण से जुड़ी कई समितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी और इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी समेत कई प्रतिष्ठित संस्थाओं की फेलोशिप और लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
2025 में मिला पद्मश्री सम्मान और गोरखपुर एम्स की जिम्मेदारी
डॉ. हेमंत कुमार के लिए साल 2025 अब तक का सबसे यादगार साल साबित हुआ। 25 जनवरी 2025 को गरीब और जरूरतमंद किडनी मरीजों की सेवा के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। बताया जाता है कि वे देश के पहले नेफ्रोलॉजिस्ट हैं जिन्हें यह सम्मान मिला। इस सम्मान के करीब छह महीने बाद ही, 14 अगस्त 2025 को उन्हें गोरखपुर एम्स का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद आज भी पटना के शेखपुरा में उनका क्लीनिक चलता है, जहां वे मरीजों को देखने पहुंचते हैं।











