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मुंगेर के एक छात्र ने कैसे खड़ा किया बिहार में किडनी इलाज का पूरा नेटवर्क, अब मिला है पद्मश्री सम्मानसक्सेस स्टोरी
3 घंटे पहले· 2

मुंगेर के एक छात्र ने कैसे खड़ा किया बिहार में किडनी इलाज का पूरा नेटवर्क, अब मिला है पद्मश्री सम्मान

मुंगेर के जमालपुर से निकलकर पटना पहुंचे डॉ. हेमंत कुमार आज देश के जाने-माने नेफ्रोलॉजिस्ट हैं, जिन्हें जनवरी 2025 में पद्मश्री सम्मान मिला और अगस्त 2025 में गोरखपुर एम्स का अध्यक्ष बनाया गया।

रिया मेननरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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पटना में किडनी मरीज आज भी डॉ. हेमंत कुमार को भगवान का दर्जा देते हैं, और यह तारीफ बेवजह नहीं है। मुंगेर जिले के जमालपुर से निकलकर आज वे देश के सबसे जाने-माने नेफ्रोलॉजिस्ट में गिने जाते हैं और उन्हें देश का प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान भी मिल चुका है। पटना के शेखपुरा में आज भी उनके नाम से एक क्लीनिक चलता है, जहां दूर-दूर से किडनी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं।

शुरुआती पढ़ाई और मुंगेर से पटना तक का सफर

डॉ. हेमंत की शुरुआती पढ़ाई जमालपुर के ईस्टर्न रेलवे बॉयज हाई स्कूल में हुई। मैट्रिक हो या इंटरमीडिएट, दोनों परीक्षाएं उन्होंने द्वितीय श्रेणी से पास कीं, यानी शुरुआत से ही कोई शानदार टॉपर वाली कहानी नहीं थी। इंटर के बाद उन्होंने मुंगेर के आरडी एंड डीजे कॉलेज में बॉटनी विषय से बीएससी में दाखिला लिया, लेकिन यह पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। यहीं से उनके जीवन का रुख बदला और वे आगे की पढ़ाई के लिए पटना आ गए, जहां उन्होंने मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने की ठानी।

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मेडिकल डिग्रियों से नेफ्रोलॉजी तक का सफर

जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज से उन्होंने एमबीबीएस पूरा किया। इसके बाद पटना में उन्होंने मेडिसिन में एमडी की डिग्री हासिल की और साथ ही चेस्ट डिजीज में डिप्लोमा भी किया। लेकिन उनकी असली पहचान बीएचयू यानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बनी, जहां उन्होंने नेफ्रोलॉजी में डीएम की डिग्री ली। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि बिहार में नेफ्रोलॉजी में डीएम की डिग्री लेने वाले वे पहले डॉक्टर बने। बाद के वर्षों में उन्होंने आईजीआईएमएस और पीएमसीएच जैसे बड़े संस्थानों में नेफ्रोलॉजी विभाग का नेतृत्व भी किया।

किडनी मरीजों के लिए बड़ा योगदान

डॉ. हेमंत के प्रयासों की बदौलत ही पीएमसीएच में पहली बार 24 घंटे डायलिसिस की सुविधा शुरू हो सकी, जो उस दौर में बड़ी बात थी। इसके अलावा पटना के गार्डिनर अस्पताल समेत कई अस्पतालों में किडनी रोग के इलाज और निःशुल्क डायलिसिस सेवाओं को खड़ा करने में उनकी अहम भूमिका रही। बिहार में लगातार एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस यानी सीएपीडी तकनीक शुरू कराने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। नवजात शिशुओं से लेकर गर्भवती महिलाओं, कैंसर मरीजों, बुजुर्गों और गरीब मरीजों तक, हर वर्ग के लिए किडनी उपचार को सुलभ बनाने की दिशा में उन्होंने लगातार काम किया।

समाजसेवा, शिक्षा और शोध में भूमिका

डॉ. हेमंत सिर्फ एक डॉक्टर भर नहीं हैं, बल्कि एक समाजसेवी और शिक्षक की भूमिका भी उतनी ही गंभीरता से निभाते हैं। उन्होंने पाटलिपुत्र नेशनल किडनी फाउंडेशन की स्थापना की, जिसके जरिए वर्षों से विश्व किडनी दिवस पर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। बिहार में मृत व्यक्ति के अंगदान को बढ़ावा देने वाले प्रमुख लोगों में भी उनका नाम शामिल है। मेडिकल शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी उनका योगदान कम नहीं रहा। गर्भावस्था के दौरान होने वाली गंभीर किडनी बीमारी और नवजात शिशुओं की किडनी संबंधी दिक्कतों पर किए गए उनके शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा जा चुका है।

प्रशासनिक जिम्मेदारियां और राष्ट्रीय भूमिका

अपने लंबे करियर के दौरान डॉ. हेमंत ने कई अहम प्रशासनिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियां भी संभालीं। वे आईजीआईएमएस में उप चिकित्सा अधीक्षक रहे, परीक्षा नियंत्रक की भूमिका निभाई और संस्थान के गवर्निंग बोर्ड के सदस्य भी रहे। इसके अलावा वे इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के पूर्वी क्षेत्र के अध्यक्ष रहे और राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण से जुड़ी कई समितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी और इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी समेत कई प्रतिष्ठित संस्थाओं की फेलोशिप और लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

2025 में मिला पद्मश्री सम्मान और गोरखपुर एम्स की जिम्मेदारी

डॉ. हेमंत कुमार के लिए साल 2025 अब तक का सबसे यादगार साल साबित हुआ। 25 जनवरी 2025 को गरीब और जरूरतमंद किडनी मरीजों की सेवा के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। बताया जाता है कि वे देश के पहले नेफ्रोलॉजिस्ट हैं जिन्हें यह सम्मान मिला। इस सम्मान के करीब छह महीने बाद ही, 14 अगस्त 2025 को उन्हें गोरखपुर एम्स का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद आज भी पटना के शेखपुरा में उनका क्लीनिक चलता है, जहां वे मरीजों को देखने पहुंचते हैं।

इसका आप पर असर

यह खबर सीधे तौर पर किडनी के मरीजों और उनके परिवारों से जुड़ी है।

  • भारत में: डॉ. हेमंत जैसे डॉक्टरों के काम से देशभर में किडनी रोग और डायलिसिस को लेकर जागरूकता बढ़ती है, खासकर गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए सस्ते इलाज के मॉडल तैयार करने में मदद मिलती है।
  • पटना और बिहार में: पीएमसीएच जैसे सरकारी अस्पतालों में 24 घंटे डायलिसिस और सीएपीडी जैसी सुविधाएं मिलने से बिहार के किडनी मरीजों को निजी अस्पतालों की महंगी फीस से राहत मिली है, और गोरखपुर एम्स में उनकी नई भूमिका से आसपास के इलाकों के मरीजों को भी फायदा मिल सकता है।

प्रेरणा और सीख

डॉ. हेमंत कुमार की कहानी बताती है कि शुरुआती नंबर या एक अधूरा कोर्स किसी के भविष्य को तय नहीं करता।

  • दूसरी श्रेणी से पास होना बाधा नहीं बना: मैट्रिक और इंटर में द्वितीय श्रेणी के बावजूद उन्होंने मेहनत से आगे की राह बनाई।
  • अधूरी पढ़ाई को नई दिशा में बदला: बीएससी बॉटनी की पढ़ाई अधूरी छूटने पर उन्होंने हार मानने के बजाय मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने का रास्ता चुना।
  • लगातार उच्च शिक्षा हासिल की: एमबीबीएस से लेकर एमडी, डिप्लोमा और फिर बीएचयू से नेफ्रोलॉजी में डीएम तक, उन्होंने सीखना कभी बंद नहीं किया।
  • सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं रहे: मरीजों का इलाज करने के साथ-साथ उन्होंने फाउंडेशन बनाकर जागरूकता, अंगदान और शोध पर भी काम किया।
  • सफलता के बाद भी जमीन से जुड़े रहे: पद्मश्री और गोरखपुर एम्स की बड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद भी वे आज भी पटना के अपने क्लीनिक में मरीज देखते हैं।

सवाल-जवाब

डॉ. हेमंत कुमार कौन हैं?
वे मुंगेर के जमालपुर से निकले देश के जाने-माने नेफ्रोलॉजिस्ट हैं, जिन्हें पद्मश्री सम्मान मिल चुका है।
उन्हें पद्मश्री सम्मान कब मिला?
25 जनवरी 2025 को गरीब और जरूरतमंद किडनी मरीजों की सेवा के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
उन्हें गोरखपुर एम्स का अध्यक्ष कब बनाया गया?
पद्मश्री मिलने के करीब छह महीने बाद, 14 अगस्त 2025 को उन्हें गोरखपुर एम्स का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
उन्होंने नेफ्रोलॉजी में डीएम की डिग्री कहां से ली?
उन्होंने बीएचयू यानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से नेफ्रोलॉजी में डीएम की डिग्री हासिल की और बिहार के पहले ऐसे डॉक्टर बने।
उनका क्लीनिक कहां है?
उनका क्लीनिक आज भी पटना के शेखपुरा में उनके नाम से चलता है।
पीएमसीएच में उनकी क्या भूमिका रही?
उनके प्रयासों से पीएमसीएच में पहली बार 24 घंटे डायलिसिस की सुविधा शुरू हुई और उन्होंने वहां नेफ्रोलॉजी विभाग का नेतृत्व भी किया।
उन्होंने किन मरीजों के लिए खासतौर पर काम किया?
उन्होंने नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, कैंसर मरीजों, बुजुर्गों और गरीब मरीजों के लिए किडनी उपचार को सुलभ बनाने पर काम किया।
रिया मेनन
लेखक के बारे मेंरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता अमृतसर
विशेषज्ञताफूड लेखन, रेसिपी, पाककला रुझान, कुकिंग टिप्स, रेस्तराँ रिव्यू, वैश्विक व्यंजन, घरेलू खाना, फूड संस्कृति, लाइफस्टाइल फूड कंटेंट, पाकशास्त्र

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला के रुझानों, रेसिपी, रेस्तराँ संस्कृति, फूड रिव्यू और खाना बनाने की टिप्स को कवर करती हैं। वे फूड प्रेमियों और घरेलू रसोइयों के लिए दिलचस्प सामग्री साझा करती हैं।

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला पत्रकारिता, रेसिपी विकास, फूड संस्कृति, रेस्तराँ रुझानों और लाइफस्टाइल कुकिंग कंटेंट में विशेषज्ञता रखती हैं। वे रोज़मर्रा के घरेलू खाने के विचारों और पारंपरिक रेसिपी से लेकर आधुनिक फ़्यूज़न व्यंजनों, फूड नवाचारों और डाइनिंग अनुभवों तक — सब कुछ कवर करती हैं। सहज और दिलचस्प कहानी कहने पर ज़ोर देते हुए रिया वैश्विक व्यंजनों, मौसमी रेसिपी, खाना बनाने की तकनीकों और फूड से जुड़े लाइफस्टाइल रुझानों की पड़ताल करती हैं। उनका काम पाठकों को नए व्यंजन खोजने, अपनी कुकिंग बेहतर बनाने और फूड व पाकशास्त्र की बदलती दुनिया से अपडेट रहने में मदद करता है।

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