मध्य प्रदेश के सागर में इन दिनों सड़क किनारे एक 16 साल का लड़का हाथों की सफाई का ऐसा खेल दिखा रहा है कि देखने वाले दंग रह जाते हैं। स्कूलों और चाय की दुकानों के पास अक्सर छोटे बच्चे जादू जैसे खेल दिखाते नजर आते हैं, कोई पैसे दे दे तो ठीक, न दे तो वे अपना सामान समेटकर थैली में रखते हैं और चुपचाप अगले ठिकाने की तरफ बढ़ जाते हैं। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि ये बच्चे आखिर आते कहां से हैं, उन्हें यह हुनर किसने सिखाया और दिन भर की मेहनत में वे कितना कमा पाते हैं। सागर में चार दिनों से डेरा डाले तंजीम नाम के इस लड़के से बातचीत में इन्हीं सवालों के जवाब मिले।
पिता ने डेढ़ महीने में सिखाया हुनर
तंजीम राजस्थान के कोटा के पास स्थित बारां जिले के रहने वाले हैं। उनके परिवार में पांच भाई बहन हैं, लेकिन इनमें से किसी ने भी स्कूल का मुंह नहीं देखा, यहां तक कि इन्हें अपना नाम लिखना तक नहीं आता। पढ़ाई लिखाई न होने की वजह से नौकरी के रास्ते वैसे भी बंद जैसे थे, इसलिए पिता से मिला यह हुनर परिवार के लिए और भी कीमती साबित हुआ। तीन साल पहले तंजीम के पिता ने बेटे को हाथों की सफाई वाला यह खेल सिखाने की ठानी और करीब डेढ़ महीने की मेहनत के बाद तंजीम ने यह कला सीख ली। उस वक्त तंजीम की उम्र महज 13 साल थी। आज यही हुनर तंजीम की रोजी रोटी का जरिया बन चुका है।
राजस्थान से चलकर पहुंचे मध्य प्रदेश
खेल सीखने के शुरुआती महीनों में तंजीम राजस्थान के ही अलग अलग जिलों में घूमकर यह करतब दिखाया करते थे। इसके बाद धीरे धीरे उनका सफर बढ़ता गया और वे महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक पहुंच गए। जहां भी स्कूल, चाय की दुकानें और लोगों की आवाजाही ज्यादा हो, तंजीम वहीं कुछ दिन रुककर अपना खेल दिखाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। अब वे मध्य प्रदेश आ चुके हैं और पिछले चार दिनों से सागर में हैं। यहां वे अक्सर स्कूलों के पास और चौपाटी की चाय दुकानों के आसपास अपना खेल दिखाते हैं। देखने वाले लोग खुश होकर दस दस, बीस बीस रुपए दे देते हैं और इस तरह तंजीम एक दिन में करीब 500 से 1000 रुपए तक कमा लेते हैं।
चार पीढ़ियों से चली आ रही यह कलाकारी
तंजीम बताते हैं कि पहले उनके तीन भाई भी साथ में यह खेल दिखाने जाया करते थे, लेकिन शादी होने के बाद तीनों ने यह काम छोड़ दिया। अब सिर्फ पिता और तंजीम ही मिलकर यह कलाकारी दिखाते हैं। यह कोई नया काम नहीं बल्कि उनके खानदान का पुश्तैनी पेशा है, जो चार पीढ़ियों से चला आ रहा है।
क्या होता है इंद्रजाल?
तंजीम इस खेल को इंद्रजाल कहते हैं। हिंदी में इंद्रजाल शब्द का इस्तेमाल ऐसे भ्रम के लिए होता है जो देखने में एकदम जादू जैसा असली लगे, और तंजीम व उनके पिता ठीक यही असर पैदा करना चाहते हैं। इसमें असल में कोई जादू नहीं होता, बल्कि यह पूरी तरह हाथों की सफाई और बरसों की प्रैक्टिस से आई कलाकारी होती है। कलाकार जो भ्रम रचता है, देखने वाले को वह हूबहू सच लगने लगता है क्योंकि सामने बैठा व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि करतब कब और कैसे किया गया। यही वजह है कि लोगों को लगता है कि सच में जादू हो रहा है, जबकि असल में यह पीढ़ियों से निखरी हुई एक कला है।
मोबाइल फोन ने घटाई तमाशबीनों की भीड़
तंजीम यह भी बताते हैं कि पहले जब वे यह खेल दिखाते थे तो आसपास लोगों की खासी भीड़ जमा हो जाती थी। लेकिन अब धीरे धीरे यह भीड़ कम होती जा रही है। इसकी बड़ी वजह मोबाइल फोन है, जिसने बच्चों से लेकर युवाओं और बड़ों तक सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। भीड़ घटने का सीधा असर कमाई पर भी पड़ता है, और यह उस पुश्तैनी काम पर दबाव बढ़ा रहा है जो पहले ही चार कलाकारों से घटकर सिर्फ दो, यानी पिता और तंजीम तक सिमट चुका है।



















