मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में पनागर कस्बे के रहने वाले सक्षम जैन ने यह साबित कर दिया है कि सही सोच और मेहनत के दम पर एक साधारण शुरुआत भी बड़े मुकाम तक पहुंच सकती है। सक्षम जैन आज अपने खजांची हथकरघा उद्योग के जरिए हर महीने लाखों रुपये का कारोबार कर रहे हैं और उनके बनाए प्राकृतिक कॉटन उत्पादों की मांग पूरे देश में फैली हुई है।
दस साल पहले एक मशीन से हुई थी शुरुआत
सक्षम जैन बताते हैं कि करीब 10 साल पहले उन्होंने यह काम शुरू किया था, तब उनके पास सिर्फ एक ही हथकरघा मशीन थी। शुरुआत में संसाधन सीमित थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे धीरे काम को आगे बढ़ाते गए। बुनाई की बारीकियां सीखने के लिए वे सागर जिले के बीना वारा इलाके गए और वहां खास प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने पनागर में अपनी यूनिट खड़ी की, जिसे उन्होंने खजांची हथकरघा नाम दिया।
हथकरघा विभाग की मदद से मिली रफ्तार
सक्षम के मुताबिक इस कारोबार को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में जबलपुर के जिला हथकरघा कार्यालय का बड़ा हाथ रहा है। विभाग ने उन्हें करीब 24-24 हजार रुपये कीमत की दो आधुनिक मशीनें मुहैया कराईं। इसी मदद के बल पर सक्षम न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर बने, बल्कि आसपास के इलाके की कई महिलाओं को भी रोजगार दे पाए। सरकार की कौशल उन्नयन योजना में प्रशिक्षित महिलाओं को भी यहां काम मिला है, जिससे क्षेत्र की महिलाएं अब खुद कमाई कर आर्थिक रूप से मजबूत बन रही हैं।
बिना केमिकल रंग और बिजली के तैयार होते हैं उत्पाद
खजांची हथकरघा में साड़ी, सूट, शर्टिंग, तौलिया और चादरें प्राकृतिक कॉटन धागों से बनाई जाती हैं। इनमें जैक्वार्ड साड़ी, बूटी साड़ी और महेश्वरी साड़ी के खास डिजाइन शामिल हैं। इन सभी उत्पादों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन्हें बनाने में न तो कोई रासायनिक रंग इस्तेमाल होता है और न ही बिजली की जरूरत पड़ती है। एक साड़ी को हाथ से पूरी तरह तैयार करने में चार से आठ दिन तक लग जाते हैं। कीमत की बात करें तो यह 1,200 रुपये से शुरू होकर 15,000 रुपये तक जाती है।
दिल्ली से बैंगलोर तक फैली मांग
इन उत्पादों को जबलपुर के अलावा दिल्ली, बैंगलोर, पुणे, इंदौर और सागर जैसे बड़े शहरों में भी जमकर खरीदा जा रहा है। इन शहरों के बाजारों में अच्छी खासी बिक्री होने से यह कारोबार लगातार बड़ा होता जा रहा है।
पिता की किराना दुकान से निकलकर बना लाखों का कारोबार
सक्षम जैन का परिवार पहले किराना दुकान चलाया करता था, जिसकी कमाई सीमित थी। आज वही सक्षम अपने उद्योग से हर महीने 50 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक कमा ले रहे हैं। उनके पूरे कारोबार का मासिक आंकड़ा अब 5 से 7 लाख रुपये के बीच पहुंच गया है। इतना ही नहीं, यहां काम करने वाले कारीगर और कर्मचारी भी हर महीने 18 हजार रुपये से 25 हजार रुपये के बीच कमाई कर रहे हैं। इससे कई परिवारों की आर्थिक हालत सुधरी है और उनके घरों में खुशहाली लौटी है।



















