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बिहार के देवमुनि: 50 की उम्र में रोज़ 10 किलोमीटर पैदल चलकर ₹500 की कमाई, बक्से में चनाचूर और कंधों पर पूरे परिवार का बोझसक्सेस स्टोरी
14 जून 2026, 6:53 am (45 दिन पहले)· 1

बिहार के देवमुनि: 50 की उम्र में रोज़ 10 किलोमीटर पैदल चलकर ₹500 की कमाई, बक्से में चनाचूर और कंधों पर पूरे परिवार का बोझ

जहानाबाद के हुलासगंज के रहने वाले करीब 50 साल के देवमुनि हर सुबह बक्से में 100 फाइल चनाचूर लेकर निकलते हैं और गली-गली घूमकर ₹10 के लिफाफे बेचते हैं, जिससे रोज़ाना करीब ₹500 की कमाई होती है।

बचपन की कुछ चीज़ें वक्त के साथ भले धुंधली पड़ जाएं, लेकिन सामने आते ही पुरानी यादें फिर ताज़ा हो जाती हैं। ऐसी ही एक चीज़ है चनाचूर — और बिहार के जहानाबाद ज़िले में एक शख़्स आज भी उसी पुराने, परंपरागत अंदाज़ में लोगों तक इसे पहुँचा रहा है। बक्से के भीतर कागज़ के बंद लिफाफों में चनाचूर भरकर वह सुबह-सुबह घर से निकल पड़ते हैं और गली, मोहल्ले से लेकर भीड़भाड़ वाली जगहों तक घूम-घूमकर बेचते हैं।

कौन हैं देवमुनि

यह काम करते हैं हुलासगंज प्रखंड के रहने वाले देवमुनि, जिनकी उम्र करीब 50 साल है। उनके परिवार में इससे पहले भी कई लोग इसी पेशे से जुड़े रहे हैं। हर दिन वह एक पेटी में 100 फाइल चनाचूर भरकर बाहर निकलते हैं। सुबह 8 बजे तक घर से रवाना हो जाते हैं और दोपहर तक बिक्री पूरी कर वापस लौटते हैं। एक लिफाफा चनाचूर की कीमत वह 10 रुपए रखते हैं।

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घर से दुकान तक, सबकुछ अपने हाथों से

देवमुनि का दिन सबसे पहले चनाचूर तैयार करने से शुरू होता है। इसे बनाने में परिवार के लोग भी उनका हाथ बँटाते हैं। माल तैयार होते ही वह उसे बक्से में पैक करते हैं और बेचने के लिए निकल पड़ते हैं। दिनभर की इसी बिक्री से जो आमदनी होती है, उसी से उनके घर का गुज़ारा चलता है। उन्हें देखकर लोगों को अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं।

खानदानी पेशा, जिसमें सिर्फ़ मेहनत की पूँजी है

देवमुनि TrendKia को बताते हैं कि परिवार की आर्थिक हालत ठीक न होने के कारण वह ज़्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए। चनाचूर बेचना उनके परिवार की खानदानी परंपरा रही है — उनके पिता भी जीवनभर यही काम करते रहे, और अब वही ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर है। यह पूरा काम शारीरिक मेहनत के दम पर ही चलता है। हर रोज़ चने से चनाचूर बनाते हैं, उसे बक्से में भरते हैं और बिक्री के लिए घर से बाहर निकल जाते हैं। रोज़ाना 100 फाइल लेकर निकलते हैं, जिनमें से करीब 50 बिक जाती हैं — और इतने से ही उनका खर्च निकल आता है। हालाँकि इसके लिए उन्हें बहुत लंबी दूरी पैदल नापनी पड़ती है।

हर दिन 10 किलोमीटर की पैदल यात्रा

देवमुनि बताते हैं कि हर दिन वह कम से कम 10 किलोमीटर पैदल चलते हैं, और इसी मेहनत से रोज़ाना करीब 500 रुपए तक की कमाई हो पाती है। यही आमदनी पूरे घर-परिवार को चलाती है। वह कहते हैं कि बच्चा भी कुछ नहीं कर सका, इसलिए घर की पूरी ज़िम्मेदारी अब भी उन्हीं को सँभालनी पड़ रही है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर भी थकने लगा है, फिर भी जब तक चल पा रहे हैं, तब तक वह इसी काम को आगे बढ़ाते रहना चाहते हैं।

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