प्रशासनिक तंत्र की वास्तविक सार्थकता तब सिद्ध होती है जब पद पर बैठा अधिकारी नियमों के दायरे से बाहर आकर किसी बेसहारा जीवन में उम्मीद का नया चिराग जला दे। छत्तीसगढ़ कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. संजय अलंग ने बिलासपुर में जिला कलेक्टर के पद पर रहते हुए एक ऐसी ही दिल को छू लेने वाली मानवीय मिसाल पेश की है। शहर की सेंट्रल जेल के एक सामान्य निरीक्षण के दौरान उनकी मुलाकात 6 साल की एक ऐसी मासूम बच्ची से हुई, जो बिना किसी अपराध के जेल की सलाखों के बीच अपना बचपन बिताने पर मजबूर थी। बच्ची की दर्दभरी कहानी सुनने के बाद कलेक्टर साहब ने न केवल उसकी शिक्षा की जिम्मेदारी उठाई, बल्कि स्वयं उसके स्थानीय अभिभावक (Local Guardian) बनकर उसका दाखिला शहर के नामी जैन इंटरनेशनल स्कूल में कराया, जहां उसे 12वीं तक की मुफ्त शिक्षा और हॉस्टल की सुविधा मिली है।
जेल की सलाखों के पीछे बीता मासूमियत का सफर
बिलासपुर की सेंट्रल जेल में हुई यह मुलाकात अचानक नहीं थी, बल्कि कलेक्टर डॉ. संजय अलंग वहां बंद कैदियों की समस्याओं और जेल की व्यवस्थाओं का रूटीन निरीक्षण करने पहुंचे थे। निरीक्षण के दौरान जब वह बैरकों का जायजा ले रहे थे, तब उनकी नजर सलाखों के पीछे खेल रही 6 साल की एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी। एक इतने छोटे बच्चे को जेल परिसर के तनावपूर्ण माहौल में देखकर उन्होंने तुरंत जेल अधिकारियों से बच्ची के बारे में जानकारी मांगी। पूछताछ में जो सच निकलकर सामने आया, उसने वहां मौजूद हर व्यक्ति का कलेजा कंपा दिया।
जब यह मासूम बच्ची महज 15 दिन की थी, तब पीलिया (Jaundice) जैसी गंभीर बीमारी के कारण उसकी मां का देहांत हो गया था। बच्ची के पिता एक संगीन कानूनी मामले में अदालत द्वारा दी गई सजा काट रहे थे। घर-परिवार में बाहर कोई ऐसा रिश्तेदार या नजदीकी व्यक्ति नहीं था जो इस नवजात शिशु की देखभाल कर सके। लाचारी और मजबूरी के चलते पिता को अपनी 15 दिन की दुधमुंही बच्ची को अपने साथ जेल ही ले जाना पड़ा। नतीजतन, जिस उम्र में बच्चे बाहर की खुली हवा, खिलौनों और मां-बाप के प्यार के बीच बड़े होते हैं, उस उम्र में यह मासूम बिना किसी कसूर के जेल की काली दीवारों और सलाखों के बीच पलती रही।
'साहब, मुझे बड़े स्कूल में पढ़ना है' और नियम
बच्ची की दुखद पृष्ठभूमि जानने के बाद कलेक्टर डॉ. संजय अलंग ने बेहद दुलार और आत्मीयता से उसे अपने पास बुलाया। उन्होंने बच्ची से बातचीत की और उससे पूछा कि वह बड़ी होकर क्या करना चाहती है या उसकी क्या इच्छा है। मासूम बच्ची ने बड़ी सहजता और मासूमियत से कलेक्टर की आंखों में देखते हुए कहा, "साहब, मुझे बड़े स्कूल में पढ़ना है।" बच्ची के मुख से निकले इन चंद शब्दों ने आईएएस अफसर के संवेदनशील मन को अंदर तक झकझोर दिया।
जेल प्रशासन की अपनी सीमाएं होती हैं। जेल के भीतर बंदियों के छोटे बच्चों के लिए केवल प्राथमिक खेलकूद और बुनियादी पढ़ाई-लिखाई की ही बहुत सीमित व्यवस्था हो पाती है। इसके अलावा, जेल नियमों के अनुसार 6 वर्ष की आयु पूरी कर चुके किसी भी बच्चे को जेल के भीतर रखना कानूनी रूप से अनुचित और उसके मानसिक व मनोवैज्ञानिक विकास के लिए बेहद हानिकारक माना जाता है। बच्ची के अंदर पढ़ाई की तीव्र तड़प और सरकारी नियमों की अनिवार्यता को देखते हुए कलेक्टर डॉ. संजय अलंग ने उसी क्षण यह पक्का संकल्प ले लिया कि वह इस बच्ची के सपनों को टूटने नहीं देंगे और उसकी पढ़ाई की हर संभव व्यवस्था करेंगे।
जैन इंटरनेशनल स्कूल में दाखिला और 100% स्कॉलरशिप
जेल का निरीक्षण संपन्न करके अपने कलेक्ट्रेट कार्यालय लौटते ही डॉ. संजय अलंग ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने शहर के प्रमुख और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के प्रबंधकों से संपर्क साधा और बच्ची की पूरी स्थिति उनके सामने रखी। कलेक्टर साहब की इस अनूठी और मानवीय पहल से प्रभावित होकर बिलासपुर के प्रसिद्ध 'जैन इंटरनेशनल स्कूल' का प्रबंधन तुरंत आगे आया। स्कूल प्रबंधन ने बच्ची की पूरी जिम्मेदारी उठाने का निर्णय लिया।
जैन इंटरनेशनल स्कूल की ओर से घोषणा की गई कि बच्ची को कक्षा 1 से लेकर 12वीं तक की पूरी पढ़ाई, पाठ्य पुस्तकें, यूनिफॉर्म, हॉस्टल में रहने की सुविधा और भोजन पूरी तरह नि:शुल्क (100% स्कॉलरशिप) प्रदान किया जाएगा। दाखिले की आधिकारिक और कागजी प्रक्रियाओं को पारदर्शी तरीके से पूरा करने के लिए कलेक्टर डॉ. संजय अलंग ने स्वयं आगे बढ़कर बच्ची के आधिकारिक स्थानीय अभिभावक (Local Guardian) के रूप में कागजातों पर हस्ताक्षर किए और प्रथम कक्षा में उसका दाखिला सुनिश्चित कराया।
अंधेरे से नए सवेरे की ओर बढ़ता कदम और व्यापक प्रभाव
जेल की घुटनभरी और संकीर्ण दुनिया से बाहर निकलकर जब बच्ची ने पहली बार जैन इंटरनेशनल स्कूल का हरा-भरा विशाल मैदान, सुंदर सजे-धजे क्लासरूम और नए-नए खिलौने देखे, तो उसकी आंखें असीम खुशी और कौतूहल से चमक उठीं। जब उसे नया स्कूल बैग, नई किताबें और सुंदर यूनिफॉर्म सौंपी गई, तो उसके चेहरे पर आई मुस्कान ने वहां मौजूद अधिकारियों और स्कूल कर्मचारियों को भावुक कर दिया। अपनी मासूम बेटी को जेल की सलाखों से मुक्त होकर एक सुरक्षित, सम्मानित और उज्ज्वल भविष्य की ओर कदम बढ़ाते देख जेल में बंद उसके सजायाफ्ता पिता की आंखों से भी खुशी के आंसू छलक पड़े।
आईएएस डॉ. संजय अलंग की यह दूरदर्शी और संवेदनशीलता से भरी पहल केवल एक बच्ची को स्कूल भेजने तक सीमित नहीं रही। इस घटना से प्रेरणा लेकर बिलासपुर जिले के कई अन्य सामाजिक संगठन भी आगे आए। बिलासपुर जेल प्रशासन ने भी एक स्थायी व्यवस्था बनाते हुए अन्य बंदियों के बच्चों को बेहतर शिक्षा और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में ठोस कदम उठाने शुरू किए हैं। आज वह बच्ची जेल की कड़वी यादों को पीछे छोड़कर अपने नए स्कूल और हॉस्टल के खुशहाल वातावरण में एक आम बच्चे की तरह स्वतंत्रता से अपने सुनहरे भविष्य के सपने बुन रही है।


















