मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में महिला किसान अब बड़ी संख्या में जैविक खेती की तरफ रुख कर रही हैं, क्योंकि यह तरीका कम लागत में भी अच्छा मुनाफा दे रहा है। बुरहानपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर बख्खारी गांव की रहने वाली रतना मेढ़े इसी बदलाव की मिसाल बन गई हैं। दसवीं तक पढ़ाई करने वाली रतना आज साढ़े तीन एकड़ जमीन पर जैविक तरीके से खेती करके हर साल तीन से चार लाख रुपये कमा रही हैं।
पहले सिर्फ केले की खेती, अब बदली तस्वीर
रतना के परिवार में पहले केवल केले की खेती होती थी और उसमें पेस्टिसाइड का इस्तेमाल किया जाता था। रतना खुद घर तक सीमित रहती थीं और घर से बाहर निकलकर कोई काम नहीं करती थीं। बदलाव तब आया जब रतना स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह के जरिए उन्हें जैविक खेती की जानकारी मिली और उन्होंने इसका प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने खेती में पेस्टिसाइड का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया और जैविक तरीके अपनाना शुरू किया।
साढ़े तीन एकड़ में कई फसलें, रोज होती है कमाई
प्रशिक्षण के बाद रतना बीते दो सालों से अपनी साढ़े तीन एकड़ जमीन पर जैविक खेती कर रही हैं। उन्होंने अपने खेत में केला, बैंगन, मूंग की फली और चोली के अलावा लौकी, गिलकी और चवले की फली सहित कई तरह की सब्जियां लगा रखी हैं। इतनी विविधता की वजह से उनके खेत से हर दिन कोई न कोई फसल तैयार होकर बिकती है, जिससे उन्हें रोजाना आमदनी होती रहती है। यही वजह है कि सालभर में उनकी कुल कमाई तीन से चार लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
कृषि वैज्ञानिकों और सोशल मीडिया से सीखी बारीकियां
रतना ने जैविक खेती की बारीकियां किसी बड़े संस्थान से नहीं, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों की सलाह और सोशल मीडिया की मदद से सीखी हैं। वह अपने खेत में ही खाद तैयार करती हैं और यही खाद अपने पौधों को देती हैं। पेस्टिसाइड का इस्तेमाल उन्होंने पूरी तरह जीरो कर दिया है। इसका नतीजा यह है कि कम लागत में भी उनकी फसल का उत्पादन अच्छा हो रहा है और बाजार में उन्हें फसल का भाव भी बेहतर मिल रहा है।
गांव में बनीं मॉडल किसान, प्रशासन ने किया सम्मानित
रतना की मेहनत और सफलता को देखते हुए गांव में उन्हें अब मॉडल किसान के तौर पर जाना जाता है। जिला प्रशासन भी रतना के काम को पहचान देते हुए उन्हें सम्मानित कर रहा है। रतना बताती हैं कि उन्होंने दसवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है और उसके बाद पढ़ाई जारी नहीं रख पाईं, लेकिन स्वयं सहायता समूह से जुड़ने और जैविक खेती अपनाने के फैसले ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी है। आज वह सिर्फ अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि गांव की दूसरी महिलाओं के लिए भी एक उदाहरण बन गई हैं कि कम पढ़ाई और सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और सही मार्गदर्शन से बेहतर कमाई की जा सकती है।











