देवघर के एक गांव में मशीन ने बदली किस्मत, यूट्यूब देखकर शुरू हुआ पत्तल-दोना का कारोबारसक्सेस स्टोरी
2 घंटे पहले· 2

देवघर के एक गांव में मशीन ने बदली किस्मत, यूट्यूब देखकर शुरू हुआ पत्तल-दोना का कारोबार

देवघर के राकुडीह गांव में रहने वाले 29 वर्षीय मृत्युंजय राउत ने यूट्यूब देखकर पत्तल-दोना बनाने का कारोबार शुरू किया और आज पूरा परिवार इसी से अपनी आजीविका चला रहा है.

गांव में रहकर भी अच्छी कमाई की जा सके, ऐसा कोई कारोबार खोजना ज्यादातर युवाओं के लिए आसान नहीं होता. देवघर प्रखंड के राकुडीह गांव के 29 वर्षीय मृत्युंजय राउत ने इस समस्या का हल यूट्यूब पर ढूंढ निकाला और आज वही यूट्यूब से सीखा हुआ कारोबार उनके पूरे परिवार की कमाई का जरिया बन चुका है.

यूट्यूब से मिला आइडिया, नौकरी की जगह चुना खुद का काम

दो साल पहले मृत्युंजय ने अपने भविष्य को लेकर एक बड़ा फैसला लिया. नौकरी की तलाश में शहर-शहर भटकने के बजाय उन्होंने खुद का रोजगार खड़ा करने की ठानी. दिलचस्प बात यह है कि उन्हें पत्तल और दोना बनाने का आइडिया किसी सरकारी योजना या ट्रेनिंग सेंटर से नहीं, बल्कि यूट्यूब पर वीडियो देखकर मिला. उन्होंने इंटरनेट पर मशीन की कीमत, कच्चे माल की उपलब्धता और बाजार में इसकी मांग को लेकर पूरी जानकारी जुटाई. जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने ज्यादा देर नहीं की और सीधे इस काम में उतर गए. उनका मानना था कि मेहनत और लगन से काम किया जाए तो गांव में रहकर भी अच्छी कमाई संभव है.

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धनबाद से खरीदी मशीन, करीब एक लाख रुपये में खड़ा हुआ यूनिट

मृत्युंजय ने झारखंड के धनबाद जिले से करीब 50 हजार रुपये में पत्तल-दोना बनाने की मशीन खरीदी. इसके बाद कच्चे माल पर करीब 50 हजार रुपये और खर्च किए. यानी कुल मिलाकर लगभग एक लाख रुपये की शुरुआती लागत से उन्होंने अपने घर में ही एक छोटा-सा उत्पादन यूनिट तैयार कर लिया. शुरुआत में मशीन चलाना सीखने और अपने लिए बाजार तैयार करने में उन्हें थोड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे काम रफ्तार पकड़ने लगा. पिछले दो साल से वह लगातार पत्तल और दोना तैयार कर रहे हैं और इसी कारोबार से घर का पूरा खर्च चल रहा है.

शादी के सीजन में होती है सबसे ज्यादा कमाई

मृत्युंजय के मुताबिक इस कारोबार में सबसे ज्यादा मुनाफा शादी-विवाह के सीजन में होता है. लग्न शुरू होते ही पत्तल और दोना की मांग कई गुना बढ़ जाती है और कई ग्राहक तो पहले से ही ऑर्डर देकर माल बुक करा लेते हैं. ऐसे व्यस्त समय में मशीन को लगातार चलाना पड़ता है, ताकि तय समय पर सभी ऑर्डर पूरे किए जा सकें. इस दौरान मेहनत भले ही ज्यादा बढ़ जाए, लेकिन उसी अनुपात में कमाई भी बढ़ती है. मृत्युंजय कहते हैं कि अगर इस कारोबार को पूरी लगन और सही तरीके से किया जाए, तो गांव में रहकर भी सम्मानजनक कमाई करना बिल्कुल संभव है.

मां-बेटे की जोड़ी, पूरे परिवार की भागीदारी वाला कारोबार

इस कारोबार की खास बात यह है कि इसमें पूरा परिवार साथ मिलकर काम करता है. मृत्युंजय की 62 वर्षीय मां भी इस काम में बराबर की हिस्सेदार हैं. वह घर में बैठकर पत्तल और दोना तैयार करने में मदद करती हैं, जबकि मृत्युंजय तैयार माल को बाजार तक पहुंचाकर बेचने का जिम्मा संभालते हैं. उनकी मां का कहना है कि पहले घर पर खाली समय यूं ही निकल जाता था, लेकिन अब उसी समय का इस्तेमाल इस काम में हो रहा है. इससे घर बैठे आमदनी भी हो रही है और परिवार को आर्थिक मजबूती भी मिल रही है. यह मां-बेटे की जोड़ी आज गांव के कई लोगों के लिए मिसाल बन चुकी है.

गांव के युवाओं के लिए बनी नई उम्मीद

मृत्युंजय का मानना है कि आज के दौर में गांव के युवाओं को सिर्फ नौकरी के पीछे भागने के बजाय छोटे-छोटे कारोबार पर भी ध्यान देना चाहिए. अगर सही जानकारी, थोड़ी-सी पूंजी और मेहनत करने का जज्बा हो, तो गांव में रहकर भी सम्मानजनक कमाई की जा सकती है. पत्तल-दोना बनाने का यह कारोबार इसी बात का उदाहरण है, जिसने एक साधारण परिवार की जिंदगी बदल दी. यही वजह है कि आसपास के कई युवा अब मृत्युंजय के पास मशीन की कीमत, लागत और इस कारोबार की बारीकियां जानने पहुंच रहे हैं. गांव में शुरू हुआ यह छोटा-सा स्टार्टअप आज दूसरों के लिए भी रोजगार की नई उम्मीद बनकर उभर रहा है.

सवाल-जवाब

यह कारोबार कौन चला रहा है और वे कहां के रहने वाले हैं?
देवघर प्रखंड के राकुडीह गांव के रहने वाले 29 वर्षीय मृत्युंजय राउत यह कारोबार चला रहे हैं.
मृत्युंजय को इस कारोबार का आइडिया कहां से मिला?
उन्हें पत्तल और दोना बनाने का आइडिया यूट्यूब पर वीडियो देखकर मिला, किसी ट्रेनिंग सेंटर या सरकारी योजना से नहीं.
मशीन और कारोबार शुरू करने में कुल कितना खर्च आया?
करीब 50 हजार रुपये की मशीन धनबाद जिले से खरीदी गई और करीब 50 हजार रुपये कच्चे माल पर खर्च हुए, यानी कुल लागत लगभग एक लाख रुपये रही.
यह मशीन कहां से खरीदी गई थी?
यह पत्तल-दोना बनाने की मशीन झारखंड के धनबाद जिले से खरीदी गई थी.
इस कारोबार में सबसे ज्यादा कमाई कब होती है?
मृत्युंजय के मुताबिक सबसे ज्यादा कमाई शादी-विवाह के सीजन में होती है, जब पत्तल-दोना की मांग कई गुना बढ़ जाती है.
इस काम में परिवार की क्या भूमिका है?
मृत्युंजय की 62 वर्षीय मां घर पर बैठकर पत्तल-दोना तैयार करने में मदद करती हैं, जबकि मृत्युंजय तैयार माल बाजार में बेचते हैं.
मृत्युंजय यह कारोबार कब से कर रहे हैं?
उन्होंने दो साल पहले यह कारोबार शुरू किया था और तभी से लगातार इसे चला रहे हैं.

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