आमतौर पर एक शिक्षक की भूमिका स्कूल की चारदीवारी और सिलेबस तक सीमित मानी जाती है, लेकिन राजस्थान के एक व्यक्ति ने पढ़ाने के पेशे को एक बड़े सामाजिक बदलाव का जरिया बना दिया है। उदयपुर में तैनात सरकारी स्कूल के टीचर दुर्गाराम मुवाल ने अपना पूरा जीवन समाज के सबसे उपेक्षित और कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है। वह सिर्फ उन बच्चों को नहीं पढ़ाते जो आसानी से स्कूल आ सकते हैं, बल्कि वह खुद उन जगहों पर जाते हैं जहां मासूम बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं। सड़क पर भीख मांगने वाले और खतरनाक काम करने वाले हजारों बच्चों को खोजकर उन्होंने उन्हें शिक्षा से जोड़ने का बीड़ा उठाया है। उनकी इस निस्वार्थ सेवा की गूंज पूरे देश में सुनाई दी है, जिसके चलते उन्हें भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ा सम्मान भी मिल चुका है।
जमीनी स्तर पर बाल मजदूरी के खिलाफ जंग
बीते कई सालों से दुर्गाराम मुवाल बाल शोषण के खिलाफ सबसे अगली पंक्ति में खड़े होकर लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी कार्यप्रणाली बहुत ही स्पष्ट और असरदार है। वह शहर और उसके आसपास के इलाकों में घूम-घूम कर ऐसे बच्चों की पहचान करते हैं, जो स्कूल जाने की उम्र में काम के बोझ तले दबे हैं। हाइवे के ढाबों, होटलों और फैक्ट्रियों में बर्तन मांजते या भारी काम करते बच्चों को देखकर वह अनदेखा नहीं करते। इन मासूमों को उस दलदल से निकालने के लिए वह प्रशासन और संबंधित सरकारी विभागों के साथ मिलकर एक पूरी योजना तैयार करते हैं। उनकी इस सक्रियता और मजबूत नेटवर्क का ही नतीजा है कि अब तक 3000 से ज्यादा बच्चों को बाल मजदूरी के अंधेरे कुएं से सफलतापूर्वक बाहर निकाला जा चुका है।
सिर्फ दाखिला नहीं, बल्कि पूरा मानसिक विकास
किसी भी बच्चे को कारखाने से छुड़ा लेना दुर्गाराम मुवाल के मिशन का केवल पहला कदम होता है। रेस्क्यू अभियान के बाद उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता इन बच्चों का स्कूलों में दाखिला करवाना होती है, ताकि वे मुख्यधारा की शिक्षा का हिस्सा बन सकें। हालांकि, उनका काम कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद खत्म नहीं होता। वह इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि मजदूरी के बुरे माहौल से निकलकर आए बच्चों को स्कूल के वातावरण में ढलने में बहुत मुश्किलें आती हैं। इसी वजह से वह इन बच्चों के व्यक्तित्व के विकास और उनके भीतर अनुशासन पैदा करने पर बहुत गहराई से काम करते हैं। इस तरह की खास देखभाल से यह सुनिश्चित होता है कि बच्चे न सिर्फ क्लास में बैठें, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़े।
अपनी आधी कमाई बच्चों पर लुटाने का जज्बा
इस पूरी मुहिम का सबसे हैरान करने वाला पहलू वह भारी आर्थिक त्याग है, जो दुर्गाराम मुवाल हर महीने करते हैं। गरीबी के कारण स्कूल न जा पाने वाले इन बच्चों के पास पढ़ाई का बुनियादी सामान भी नहीं होता। इस कमी को दूर करने के लिए यह जुनूनी शिक्षक अपनी हर महीने की सैलरी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा सीधा इन बच्चों के लिए दान कर देता है। इस पैसे का इस्तेमाल बच्चों के लिए किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म और दूसरी जरूरी शिक्षण सामग्री खरीदने में किया जाता है। मुवाल यह सुनिश्चित करते हैं कि पैसों की कमी के कारण किसी भी होनहार बच्चे की पढ़ाई बीच में न छूटे। उनका यह त्याग इस मजबूत सोच पर टिका है कि कोई भी समाज तभी सच में बदल सकता है, जब वहां का हर एक बच्चा पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बने और अपने पैरों पर खड़ा हो।
लगातार निगरानी और हमेशा साथ निभाने का वादा
बाल मजदूरी से छुड़ाए गए बच्चों के दोबारा उसी दलदल में फंसने का खतरा हमेशा बना रहता है। इस चुनौती से निपटने के लिए दुर्गाराम मुवाल एक बेहद सख्त निगरानी व्यवस्था अपनाते हैं। वह बच्चों का एडमिशन करवाकर उन्हें उनके हाल पर नहीं छोड़ते, बल्कि समय-समय पर स्कूलों में जाकर उनकी प्रगति की जानकारी लेते हैं। वह लगातार यह जांचते हैं कि बच्चा पढ़ाई में कैसा कर रहा है और कहीं वह वापस मजदूरी की तरफ तो नहीं जा रहा। मुवाल मानते हैं कि पढ़ाई केवल डिग्री हासिल करने का कोई साधन नहीं है, बल्कि यह इंसान की जिंदगी की दिशा को पूरी तरह से बदलने वाला सबसे बड़ा हथियार है। यही सोच उन्हें रोज नए बच्चों को खोजने और उनकी जिंदगी संवारने की ऊर्जा देती है।
पूरे देश के लिए बनी एक बड़ी मिसाल
राजस्थान की धरती से शुरू हुई इस शानदार पहल की तारीफ आज सिर्फ उदयपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा देश उनके काम का लोहा मान रहा है। दुर्गाराम मुवाल की मेहनत का असली फल तब देखने को मिलता है, जब उनके द्वारा सालों पहले बचाए गए बच्चे आज उच्च शिक्षा के संस्थानों में पहुंच रहे हैं। अच्छी पढ़ाई और हुनर हासिल करने के बाद, ये युवा अब अपने-अपने परिवारों की खराब आर्थिक स्थिति को सुधारने में बहुत बड़ा योगदान दे रहे हैं। उदयपुर के इस शिक्षक की कहानी यह साबित करती है कि अगर एक इंसान सच्ची लगन के साथ कुछ ठान ले, तो वह केवल एक क्लासरूम नहीं, बल्कि पूरे समाज की तस्वीर हमेशा के लिए बदल सकता है।



















