उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में युवा अब पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर शिक्षा और आधुनिक कृषि का अनोखा संगम पेश कर रहे हैं। गोंडा के एक प्रगतिशील युवा किसान हरिओम मिश्र ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ खेती के क्षेत्र में एक नई पहल की है। वह अपनी पढ़ाई का ध्यान रखने के दौरान खाली समय का सदुपयोग करते हुए अरवी, जिसे स्थानीय भाषा में घुईया भी कहा जाता है, की खेती कर रहे हैं। हरिओम ने अपनी लगभग दो बीघा जमीन पर अरवी की फसल बोई है। उनका मानना है कि सही योजना और कम पूंजी के साथ अगर खेती की जाए, तो यह पढ़ाई के साथ-साथ आमदनी का एक स्थायी साधन बन सकती है।
जैविक तकनीक और लागत नियंत्रण का मॉडल
खेती में मुनाफा कमाने के लिए हरिओम मिश्र ने लागत कम रखने पर विशेष ध्यान दिया है। दो बीघा खेत में अरवी की फसल तैयार करने के लिए उन्होंने अभी तक करीब 4 से 5 हजार रुपये ही खर्च किए हैं। इस खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह इसमें किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। हरिओम पूरी तरह से प्राकृतिक और जैविक खाद का उपयोग कर रहे हैं। जैविक तरीकों को अपनाने से एक तरफ जहां मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, वहीं दूसरी तरफ बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदने की मजबूरी खत्म हो जाती है, जिससे कुल लागत काफी घट जाती है।
अरवी एक ऐसी फसल है जिसकी भारतीय बाजारों में पूरे साल मांग बनी रहती है। लोग इसे दैनिक सब्जी के रूप में बेहद पसंद करते हैं। हरिओम बताते हैं कि मांग अच्छी होने के कारण फसल तैयार होने के बाद इसे बेचने के लिए बाजारों में भटकना नहीं पड़ता और व्यापारी आसानी से उत्पाद खरीद लेते हैं। उनका अनुमान है कि यदि मौसम अनुकूल रहा और फसल प्राकृतिक आपदाओं से बची रही, तो इस छोटी सी लागत से उन्हें बंपर कमाई और बेहतर मुनाफा हासिल होगा।
खेत की तैयारी और फसल प्रबंधन की वैज्ञानिक विधि
अरवी की बेहतर पैदावार लेने के लिए हरिओम मिश्र पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया का पालन करते हैं। बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई की जाती है ताकि मिट्टी एकदम भुरभुरी और हवादार हो जाए। इसके बाद स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण कंदों का चुनाव करके उनकी बुवाई की जाती है। पौधे के विकास के लिए मिट्टी में लगातार नमी बनाए रखना सबसे जरूरी माना जाता है। इसके अलावा, फसल को खरपतवार से बचाने के लिए समय-समय पर खेत की निराई-गुड़ाई भी की जाती है। इन बुनियादी बातों का ध्यान रखकर कम खर्च में भी स्वस्थ फसल हासिल की जा सकती है।
पढ़ाई के साथ कृषि का नया नजरिया
हरिओम मिश्र का कहना है कि खेती और पढ़ाई को अलग-अलग करके देखने की जरूरत नहीं है। अपनी पढ़ाई के दौरान उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों, नई पद्धतियों और बाजार के रुझानों को समझने का मौका मिलता है, जिसे वह तुरंत अपने खेत में आजमाते हैं। वह बताते हैं कि पढ़ाई से मिलने वाला ज्ञान उन्हें खेती में सही फैसले लेने में मदद करता है। हरिओम के अनुसार, आज के युवाओं को कृषि को सिर्फ एक पारंपरिक या मजबूरी का काम नहीं समझना चाहिए। अगर सही फसल चुनी जाए और आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया जाए, तो कृषि क्षेत्र में स्वरोजगार की अपार संभावनाएं हैं।
ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणादायक उदाहरण
पढ़ाई के साथ दो बीघा खेत में जैविक अरवी उगाने का हरिओम मिश्र का यह सफल प्रयास गोंडा और आसपास के क्षेत्रों के अन्य युवाओं के लिए एक मिसाल बन रहा है। उनका यह कदम संदेश देता है कि उच्च शिक्षा हासिल करने के साथ-साथ कृषि को भी एक सम्मानजनक और लाभदायक रोजगार के रूप में अपनाया जा सकता है। कम लागत, जैविक सुरक्षा और बेहतर बाजार मांग के बल पर युवा अपने गांव में ही रहकर स्वावलंबी बन सकते हैं।



















