बिहार के पूर्वी चंपारण में कृषि आज भी जीविका का मुख्य माध्यम बनी हुई है। आधुनिक युग में युवा अक्सर शहरों की ओर पलायन करना या कॉर्पोरेट जगत में करियर बनाना बेहतर समझते हैं, लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं जो एक अलग राह दिखाते हैं। पन्नापुर गांव निवासी श्रेष्ठ नारायण सिंह एक ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और सरकारी नौकरी के अवसर भी मिले, लेकिन उन्होंने उन विकल्पों को छोड़कर खेती को ही अपनी जीवनशैली बना लिया।
इंजीनियरिंग के बाद खेती को चुना रास्ता
श्रेष्ठ नारायण सिंह की जीवन यात्रा प्रेरणादायक है। अब वे 70 वर्ष के हो चुके हैं, फिर भी उनकी दिनचर्या में कोई कमी नहीं आई है। गांव के लोग बताते हैं कि वे आज भी भोर में 4 बजे उठकर अपने खेतों और घर के कामों में जुट जाते हैं। खुद श्रेष्ठ नारायण सिंह का कहना है कि उन्होंने तकनीकी शिक्षा ली थी, परंतु उन्हें कभी नौकरी करने में रुचि महसूस नहीं हुई। उन्होंने सरकारी पद ठुकराकर कृषि को अपनाया क्योंकि उनका मानना है कि यदि खेती को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सही जानकारी के साथ किया जाए, तो यह किसी भी अन्य पेशे से कहीं अधिक बेहतर और फायदेमंद है।
प्रकृति के करीब और स्वस्थ जीवन
श्रेष्ठ नारायण सिंह स्वयं को एक प्रकृति प्रेमी मानते हैं। उनका मानना है कि दशकों तक खेतों में शारीरिक परिश्रम करने और खुले वातावरण में रहने के कारण ही वे आज 70 साल की उम्र में भी पूरी तरह स्वस्थ और बीमारी मुक्त हैं। उनका जीवन यह साबित करता है कि प्रकृति के साथ जुड़ाव और कड़ी मेहनत स्वास्थ्य के लिए कितनी जरूरी है।
सफलता और आत्मनिर्भरता का सफर
अपनी खेती के दम पर श्रेष्ठ नारायण सिंह ने न केवल पांच बेटियों की शादी की जिम्मेदारी निभाई, बल्कि अपने एक बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना भी पूरा किया। वे मुख्य रूप से सब्जियों की खेती करते हैं, जिसमें बैंगन, करेला और आलू प्रमुख फसलें हैं। इसके अलावा वे हल्दी, अदरक, मिर्च और लहसुन जैसी फसलों का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर करते हैं। युवा किसानों के लिए उनका खास संदेश है कि रासायनिक उर्वरकों की जगह मवेशियों से मिलने वाली प्राकृतिक खाद का अधिक से अधिक उपयोग करें, जो मिट्टी की उर्वरता और फसल की गुणवत्ता बनाए रखने में सहायक होती है।













