जीवन में बड़ी चुनौतियों का सामना करते हुए अक्सर लोग पारिवारिक व्यस्तताओं अथवा स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के चलते अपने सपनों से पीछे हट जाते हैं। इसके विपरीत, कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जो सबसे विषम परिस्थितियों को ही अपनी सफलता का माध्यम बना लेते हैं। भारतीय प्रशासनिक और पुलिस सेवा के इतिहास में एक ऐसा ही नाम मंजिल सैनी का है। उन्होंने शारीरिक थकान और गर्भावस्था के संवेदनशील दौर के बीच देश की सबसे प्रतिष्ठित संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की और पहले ही प्रयास में शानदार सफलता प्राप्त कर इतिहास रच दिया। वह भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होने वाली देश की पहली विवाहित महिला अधिकारी बनीं। अपराध पर अपने सख्त नियंत्रण और निर्भीक फैसलों के चलते कानून-व्यवस्था के गलियारों में उन्हें 'लेडी सिंघम' के नाम से भी जाना जाता है।
सेंट स्टीफंस से दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तक की शिक्षा
मंजिल सैनी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि प्रारंभ से ही असाधारण उपलब्धियों से भरी रही है। उनका जन्म वर्ष 1975 में देश की राजधानी दिल्ली में हुआ था। मेधावी छात्रा के रूप में उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर सेंट स्टीफंस कॉलेज में प्रवेश लिया, जहाँ से उन्होंने भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) विषय में अपनी डिग्री पूरी की।
विज्ञान के क्षेत्र में स्नातक करने के बाद उन्होंने प्रतिष्ठित संस्थान 'दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' का रुख किया। यहाँ उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने अपनी शैक्षणिक प्रतिभा का लोहा मनवाया और पूरे संस्थान में शीर्ष स्थान हासिल करते हुए गोल्ड मेडल प्राप्त किया। उनकी लगन और विषयों पर गहरी पकड़ ने उन्हें उस दौर में भी बाकी विद्यार्थियों से अलग पहचान दिलाई।
कॉर्पोरेट क्षेत्र में तीन साल का कार्य और जीवन की नई दिशा
शिक्षा पूरी करने के तुरंत बाद मंजिल सैनी ने कॉर्पोरेट जगत में कदम रखा। उन्होंने लगभग 3 वर्षों तक एक कॉर्पोरेट कंपनी में पेशेवर रूप से काम किया। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्ययन के दौरान ही उनकी मुलाकात अपने एक सहपाठी से हुई थी। दोनों के बीच मित्रता धीरे-धीरे प्रगाढ़ हुई और बाद में दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया।
एक स्थापित निजी नौकरी और पारिवारिक जीवन की स्थिरता के बावजूद, उनके भीतर देश सेवा और प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए समाज में बदलाव लाने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। कॉर्पोरेट सेक्टर के आराम को छोड़कर सार्वजनिक सेवा के कठिन मार्ग को चुनना एक साहसिक फैसला था, जिसने उनके जीवन की पूरी दिशा ही बदल दी।
साल 2005 में मातृत्व और सिविल सेवा परीक्षा की दोहरी चुनौती
वर्ष 2005 में मंजिल सैनी गर्भवती थीं। सामान्य तौर पर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अत्यधिक आराम और शारीरिक तनाव से दूर रहने की आवश्यकता होती है। हार्मोनल बदलाव, निरंतर थकान और आने वाले शिशु की देखभाल की जिम्मेदारियों के बीच किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना आसान नहीं होता।
मंजिल सैनी ने इस संवेदनशील अवस्था को बाधा मानने के बजाय मानसिक अनुशासन की परीक्षा माना। उन्होंने गर्भावस्था के कठिन महीनों में निरंतर अध्ययन किया और यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में शामिल हुईं। अपने पहले ही प्रयास में उन्होंने इस प्रतिष्ठित परीक्षा को पास किया। इसके साथ ही वह भारतीय पुलिस सेवा में चयनित होने वाली भारत की पहली शादीशुदा महिला अधिकारी बनीं। उन्हें उत्तर प्रदेश कैडर आवंटित किया गया, जिसके बाद उनका प्रशासनिक सफर शुरू हुआ।
मुरादाबाद में पहली तैनाती और कुख्यात किडनी रैकेट का पर्दाफाश
आईपीएस अधिकारी के रूप में मंजिल सैनी की पहली नियुक्ति उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में बतौर सहायक पुलिस अधीक्षक (असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट) हुई। यहाँ सेवा के शुरुआती दौर में ही उन्होंने ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। वर्ष 2008 में उन्होंने उत्तर प्रदेश और गुरुग्राम क्षेत्र में फैले एक अंतरराज्यीय अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़ किया।
इस संगठित अपराध तंत्र में गरीब और लाचार मजदूरों को रोजगार का झूठा प्रलोभन दिया जाता था। इसके बाद उन्हें नशीले इंजेक्शन देकर बेहोश किया जाता और उनकी सहमति के बिना उनकी किडनी निकाल ली जाती थी। इन अंगों को देश-विदेश के संपन्न मरीजों को भारी कीमतों पर बेचा जाता था। इस रैकेट की जड़ें बहुत गहरी थीं। मंजिल सैनी की सक्रियता और सख्त कार्रवाई के दम पर इस संवेदनशील मामले का पर्दाफाश हुआ, जिसके बाद पुलिस महकमे और आम जनता के बीच उनके साहसी नेतृत्व को देखते हुए उन्हें 'लेडी सिंघम' कहा जाने लगा। इसके उपरांत उन्होंने मुजफ्फरनगर, मथुरा, बदायूं और इटावा जैसे संवेदनशील जनपदों में बतौर पुलिस प्रमुख (एसएसपी/एसपी) कानून व्यवस्था को बेहद मजबूती से संभाला।
लखनऊ की पहली महिला एसएसपी और राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक
मई 2016 में मंजिल सैनी के प्रशासनिक जीवन में एक नया अध्याय जुड़ा जब उन्हें उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) नियुक्त किया गया। राज्य के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी महिला पुलिस अधिकारी को लखनऊ जिले की कानून-व्यवस्था की बागडोर सौंपी गई थी। राजधानी में अपनी तैनाती के दौरान उन्होंने वीआईपी सुरक्षा, यातायात और अपराध नियंत्रण में कई कड़े कदम उठाए।
वर्ष 2017 में मेरठ जनपद में डॉक्टर श्रीकांत का अपहरण कर लिया गया था। अपराधियों के चंगुल से डॉक्टर को सुरक्षित निकालने के लिए एक बेहद जोखिम भरा पुलिस ऑपरेशन चलाया गया था। इस खतरनाक मुठभेड़ के दौरान दिखाए गए असाधारण साहस और रणनीतिक कौशल के लिए वर्ष 2024 में उन्हें 'राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक' से अलंकृत किया गया। यह वीरता सम्मान हासिल करने वाली वह उत्तर प्रदेश कैडर की दूसरी महिला आईपीएस अधिकारी बनीं।
श्रवण साहू हत्याकांड और प्रशासनिक जवाबदेही की मिसाल
लखनऊ में तैनाती के दौरान फरवरी 2017 में एक गंभीर आपराधिक घटना घटी। अपने बेटे की हत्या के मामले में मुख्य गवाह रहे बुजुर्ग कारोबारी श्रवण साहू की अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। श्रवण साहू ने अपनी जान को खतरा बताते हुए पुलिस से लगातार सुरक्षा गार्ड्स (गनर्स) उपलब्ध कराने की गुहार लगाई थी, परंतु समय रहते उन्हें सुरक्षा नहीं मिल सकी थी।
इस दुखद घटना के पश्चात तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी ने स्वयं सार्वजनिक रूप से मीडिया के समक्ष आकर यह स्वीकार किया कि यह पुलिस प्रशासन की तरफ से हुई एक गंभीर विफलता थी। बाद में इस पूरे प्रकरण की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई, जिसमें सुरक्षा में हुई इस कोताही के लिए उनकी जिम्मेदारी तय की गई और विभागीय कार्रवाई भी अमल में लाई गई। विषम परिस्थितियों में प्रशासनिक चूक को खुले तौर पर स्वीकार करना और विपरीत समय में भी व्यवस्था के प्रति जवाबदेह बने रहना उनके पेशेवर जीवन की एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है।



















