खेत में महीनों का पसीना बहाकर तैयार की गई फसल अगर कुछ ही घंटों में छुट्टा मवेशियों या जंगली जानवरों के पैरों तले रौंद दी जाए, तो किसान की कमर टूट जाती है। राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में यह एक पुरानी और विकराल समस्या रही है। हाड़ कंपाने वाली ठंड हो या तपती रातें, काश्तकारों को लाठी हाथ में लेकर अपनी बोआई की चौकीदारी करनी पड़ती थी। जरा सी आंख झपकी नहीं कि नीलगाय और बेसहारा पशुओं का झुंड पूरी हरियाली लील जाता था। धौलपुर जिले के पिपरौवा गांव में रहने वाले प्रगतिशील काश्तकार रामवीर सिंह भी सालों तक इसी संकट से जूझते रहे। कई मौकों पर उनकी पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता था और खेती की बुनियादी लागत निकालना भी दूभर हो जाता था। लेकिन अब तारबंदी के एक मजबूत कदम ने उनकी खेती की तस्वीर पूरी तरह बदल कर रख दी है।
पिपरौवा के खेत पर बिछा 400 मीटर लंबा सुरक्षा घेरा
छुट्टा जानवरों और नीलगायों की लगातार बर्बादी से परेशान होकर रामवीर सिंह ने स्थायी समाधान तलाशना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने कृषि विभाग का दरवाजा खटखटाया और सरकार की तारबंदी योजना के अंतर्गत अपना औपचारिक आवेदन पेश किया। प्रशासनिक स्तर पर कागजी औपचारिकताएं पूरी होने और विभाग से हरी झंडी मिलने के बाद उन्होंने अपने खेत के चारों तरफ लगभग 400 मीटर लंबी मजबूत तारबंदी करवाई। लोहे के मजबूत खंभों पर कांटेदार तारों और जालियों की यह सुरक्षित दीवार उनके खेत के लिए ऐसा मजबूत सुरक्षा घेरा बन गई, जिसे पार करना आवारा पशुओं के लिए नामुमकिन हो गया। इस बाड़बंदी का नतीजा यह हुआ कि बाहर से आने वाले जानवरों की घुसपैठ पूरी तरह बंद हो गई और उनकी फसल बिना किसी रुकावट के सुरक्षित रूप से लहलहाने लगी।
कृषि विभाग से मिली 40 हजार रुपये की सीधी वित्तीय राहत
खेत की इतनी लंबी चारदीवारी पर कंटीले तार खिंचवाना किसी भी सामान्य काश्तकार के लिए एक बड़ा माली खर्च साबित होता है। योजना के दिशा-निर्देशों के मुताबिक कृषि विभाग ने रामवीर सिंह को इस कार्य के लिए 40,000 रुपये का अनुदान जारी किया। इस वित्तीय मदद ने उनके कंधे से तारबंदी की लागत का भारी बोझ हल्का कर दिया। इस सुरक्षा बंदोबस्त के बाद के अनुभव साझा करते हुए रामवीर सिंह बताते हैं कि फसल का नुकसान रुकने से कुल कृषि उपज में जोरदार उछाल आया है। पहले जो हिस्सा मवेशी खा जाते थे या बर्बाद कर देते थे, वह पूरी उपज अब सुरक्षित मंडी तक पहुंच रही है। पैदावार बढ़ने का सीधा असर उनकी पारिवारिक आमदनी पर दिखा और उनका घरेलू बजट काफी मजबूत हुआ है। पिपरौवा और आसपास के इलाकों के दूसरे काश्तकार भी अब इस बदलाव को देखकर खासे प्रभावित हैं और रामवीर सिंह स्वयं किसानों से विभागीय योजनाओं में आवेदन करने का आग्रह कर रहे हैं।
किसानों के लिए क्या है तारबंदी योजना का बुनियादी ढांचा
राजस्थान सरकार की यह पहल उन किसानों के लिए सहारा बनी है जो जंगली जानवरों और आवारा पशुओं के आतंक से खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे थे। योजना का केंद्रीय लक्ष्य राज्य के खेतों को पशुओं के नुकसान से सुरक्षित बनाकर कृषि पैदावार को बढ़ावा देना है। इसके तहत खेत की बाहरी सीमा पर कंटीले तार अथवा मजबूत जाली लगाने पर होने वाले कुल खर्च का एक तय हिस्सा सरकारी सहायता के रूप में सीधे लाभार्थी को उपलब्ध कराया जाता है। इससे किसान को अपनी जेब से पूरी रकम नहीं लगानी पड़ती और उनकी मेहनत का एक-एक दाना सुरक्षित रहता है।
सब्सिडी का वर्गीकरण और आर्थिक मदद का पूरा गणित
कृषि विभाग ने सहायता राशि का बंटवारा किसानों के जोत आकार और उनके आवेदन के तरीके के हिसाब से श्रेणीवार तय किया है, ताकि जरूरतमंद तबके को ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके
- सामान्य वर्ग के काश्तकार: सामान्य श्रेणी के किसानों को कुल प्रमाणित व्यय का 50 प्रतिशत या फिर अधिकतम 40,000 रुपये का अनुदान दिया जाता है, इनमें से जो भी रकम कम हो वही मान्य होती है।
- लघु एवं सीमांत काश्तकार: कम जोत वाले छोटे और सीमांत किसानों को अतिरिक्त राहत देते हुए कुल खर्च का 60 प्रतिशत अथवा अधिकतम 48,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता मुहैया कराई जाती है।
- सामूहिक या समूह आवेदन: यदि कई किसान मिलकर एक समूह के रूप में आवेदन करते हैं, तो उन्हें इस व्यवस्था के तहत सर्वाधिक 70 प्रतिशत अथवा अधिकतम 56,000 रुपये तक की सब्सिडी प्रदान की जाती है।
- लंबाई की निर्धारित सीमा: सरकारी नियमों के तहत अनुदान का यह प्रावधान अधिकतम 400 रनिंग मीटर लंबाई की तारबंदी तक ही लागू रहता है।
योजना में शामिल होने की पात्रता और जरूरी दस्तावेज
इस व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए आवेदक किसान के पास कम से कम 0.5 हेक्टेयर यानी करीब 2 बीघा कृषि योग्य जमीन का स्वामित्व होना जरूरी है। यदि कई किसान मिलकर सामूहिक आवेदन का लाभ लेना चाहते हैं, तो यह शर्त रखी गई है कि उन सभी किसानों के खेत आपस में सटे हुए यानी एक ही चक या स्थान पर होने चाहिए। सबसे आवश्यक नियम यह है कि कोई भी किसान अपनी मर्जी से पहले काम शुरू न करे; कृषि विभाग से औपचारिक स्वीकृति पत्र मिलने के उपरांत ही तारबंदी का निर्माण कार्य कराया जाना अनिवार्य है। दस्तावेज के तौर पर आवेदक के पास आधार कार्ड, जन आधार कार्ड, जमीन की अद्यतन जमाबंदी नकल, खेत का अधिकृत नक्शा और बैंक पासबुक की प्रति उपलब्ध होनी चाहिए।




















