उत्तर प्रदेश का गोरखपुर शहर अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर के साथ-साथ मिट्टी से बनने वाली टेराकोटा कला के लिए पूरे देश में मशहूर है। केंद्र और राज्य सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना के जरिए यहां की मूर्तियों और सजावटी सामान को एक नया बाजार मिला है, जिससे स्थानीय कारीगर आत्मनिर्भर बन रहे हैं। इस शिल्प में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से उभरकर सामने आ रही है। गोरखपुर की रहने वाली सुशीला ऐसी ही एक महिला कारीगर हैं, जो बाजार के रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक तरीके से टेराकोटा का रंग खुद घर पर तैयार कर रही हैं।
आम की छाल और मिट्टी से प्राकृतिक रंग बनाने की प्रक्रिया
सुशीला मिट्टी की सुंदर मूर्तियां और सजावटी उत्पाद तैयार करती हैं, लेकिन उनकी पहचान इस बात में है कि वह मूर्तियों पर चढ़ाया जाने वाला रंग बाजार से नहीं खरीदतीं। वह घर पर ही आम की लकड़ी की शाखाओं और छाल का उपयोग करके जैविक रंग तैयार करती हैं। इस पारंपरिक प्रक्रिया की शुरुआत आम की डालियों और छाल को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने से होती है। इसके बाद इस छाल को मिट्टी के साथ मिलाकर कई घंटों तक कूटा जाता है, ताकि दोनों चीजें एक-दूसरे में अच्छी तरह रच-बस जाएं।
कूटे गए इस गीले मिश्रण को खुले स्थान में धूप में फैला दिया जाता है और घंटों तक अच्छी तरह सुखाया जाता है। धूप में सुखाने की यह चरणबद्ध प्रक्रिया रंग को मजबूती देने और प्राकृतिक गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।
बाल्टी में घोल से लेकर मूर्तियों पर टेराकोटा रंग की फिनिशिंग
जब यह प्राकृतिक मिश्रण पूरी तरह सूखकर तैयार हो जाता है, तब इसे दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। सुशीला सूखे हुए मिश्रण को एक बाल्टी में डालती हैं और पानी के साथ मिलाकर अच्छी तरह घोलती हैं। इसके बाद इस घोल से गोल आकार की सामग्री तैयार की जाती है। इसी तैयार मिश्रण को मिट्टी की बनी मूर्तियों और सजावटी सामान पर चढ़ाया जाता है।
इस घरेलू प्रक्रिया से तैयार रंग मूर्तियों को वही विशिष्ट और गहरा टेराकोटा रंग प्रदान करता है, जिसके लिए गोरखपुर की शिल्पकारी पूरे देश में पहचानी जाती है। इस विधि से न तो महंगे केमिकल वाले रंगों को खरीदने की जरूरत पड़ती है और न ही बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है।
पारंपरिक कला का संरक्षण और महिलाओं की आत्मनिर्भरता
सुशीला की यह मेहनत दर्शाती है कि कैसे स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक समझ के बल पर रोजगार के नए रास्ते खोले जा सकते हैं। मिट्टी और आम की छाल के इस अनूठे संगम के माध्यम से वह न केवल अपनी खूबसूरत कलाकृतियों को निखार रही हैं, बल्कि पर्यावरण-अनुकूल तरीकों से इस पुरानी परंपरा को जीवित रख रही हैं। ओडीओपी योजना के तहत उनका यह प्रयास स्थानीय कला को वैश्विक पहचान देने के साथ-साथ अन्य महिलाओं के लिए भी स्वरोजगार और सम्मान की प्रेरणा बन रहा है।



















