बहराइच के पयागपुर के एक छोटे से गांव में जन्मे आनंद सिंह भदौरिया आज पूरे जिले में एक पहचाना हुआ नाम बन चुके हैं। कड़ी मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने पढ़ाई से लेकर कारोबार तक हर मोर्चे पर खुद को साबित किया। लेकिन उनकी असली पहचान सिर्फ कामयाबी नहीं है, बल्कि वह अंदाज़ है जिसमें वह सफल होने के बाद भी अपने गांव और अपने लोगों के बीच लौट आए। यही वजह है कि आज उनकी चर्चा बहराइच से बाहर दूसरे राज्यों तक होती है।
पढ़ाई और कारोबार का सफर
आनंद सिंह भदौरिया ने इंजीनियरिंग की डिग्री ली और फिर MBA की पढ़ाई पूरी की। इसी काबिलियत के बूते वह एक बड़े बिजनेसमैन बने और अपने इलाके का नाम रोशन किया। शिक्षा और मेहनत ने उन्हें वह मुकाम दिलाया, जहां से वह चाहते तो किसी बड़े शहर में आराम की ज़िंदगी बिता सकते थे। लेकिन उन्होंने रास्ता बिल्कुल अलग चुना।
सफलता के बाद अपनों के बीच वापसी
ऊंचाई छूने के बाद आनंद एक बार फिर अपनी मिट्टी की ओर लौट आए। उन्होंने तय किया कि अब वह अपने गांव में रहकर ही अपने माता-पिता और क्षेत्र के लोगों की सेवा करेंगे। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों की मदद करनी शुरू कर दी। आज वह समय-समय पर अपने घर पर ही जनता दरबार लगाते हैं, जहां लोग अपनी परेशानियां लेकर पहुंचते हैं। चाहे कोई स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कत हो, पढ़ाई की ज़रूरत हो या कोई और परेशानी, वह किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते और जितना संभव हो सके, मदद करते हैं। इसी सादगी और सेवाभाव की वजह से गांव लौटने पर उन्हें लोगों का अपार प्यार मिला।
बीस साल की नौकरी और गांव के हालात
पयागपुर के जगता जलालपुर लौकाही चौराहा के रहने वाले आनंद बीस सालों तक नौकरी करते रहे, लेकिन जब उन्होंने अपने गांव के हालात देखे तो उनका मन पसीज गया और वह सेवा के काम में जुट गए। वह कहते हैं कि आज उनके भीतर जो भी सेवाभाव और प्रेरणा है, वह उनके गुरु और माता-पिता के आदर्शों का ही नतीजा है। अपनी इस शालीनता, शिक्षा और सफलता का पूरा श्रेय वह अपने माता-पिता और गुरु शिवपाल सिंह भदौरिया को देते हैं।
बच्चे गीली मिट्टी जैसे
आनंद अपनी सोच को एक सीधी मिसाल से समझाते हैं। उनके शब्दों में, बच्चे गीली मिट्टी और मोम की तरह होते हैं, उन्हें जिस भी सांचे में ढाला जाए, वैसे ही ढल जाते हैं। मुझे भी मेरे माता-पिता और गुरु ने हमेशा दूसरों की सेवा करना सिखाया। शायद यही वजह है कि आज सफलता पाने के बाद भी मैं इन्हीं ग्रामीणों के बीच रहता हूं। ईश्वर अगर मुझे और आगे पहुंचाएगा, तो यह सेवाभाव दिन-प्रतिदिन इसी तरह बढ़ता जाएगा।











