बिहार की सांस्कृतिक परंपराओं और लोक कला की जड़ों में अद्भुत जीवटता छिपी हुई है। बेगूसराय जिले के मटिहानी प्रखंड अंतर्गत आने वाले बाढ़ प्रभावित क्षेत्र नयागांव के अमितेश कुमार दीपू उर्फ टिंकू का जीवन इसी जीवटता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। कभी बिना किसी मानदेय के गांवों की धार्मिक रामधुनी में सीताराम का जाप करने वाले इस कलाकार ने अपनी लगन के दम पर इलाके में एक सम्मानित लोक गायक के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि अगर कला के प्रति अटूट निष्ठा हो, तो गांव की संकरी गलियों से शुरू हुआ सफर भी सफलता की नई इबारत लिख सकता है।
धार्मिक आयोजनों और बाढ़ के संघर्ष से हुई सफर की शुरुआत
अमितेश कुमार दीपू के इस सुरीले सफर का आगाज साल 1993-94 के आसपास हुआ था। उस दौर में वह अपने गांव में आयोजित होने वाले रामधुनी कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लिया करते थे। रामधुनी को पूरी तरह से एक धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन माना जाता था, इसलिए इसमें प्रस्तुति देने वाले बाल अथवा युवा कलाकारों को कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता था। अमितेश ने भी संगीत के प्रति अपने स्वाभाविक प्रेम के कारण बिना किसी फीस की परवाह किए मुफ्त में गाना शुरू किया। धीरे-धीरे रामधुनी के इन मंचों से उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और उन्होंने गायकी को ही अपने जीवन का ध्येय बनाने का फैसला किया।
ग्रामीण इलाके में हर साल आने वाली बाढ़ ने अमितेश के परिवार के सामने गंभीर आर्थिक चुनौतियां खड़ी कर दी थीं। ऐसी विषम परिस्थितियों में अमितेश के लिए इन धार्मिक कार्यक्रमों में जाना एक मजबूरी भी बन गया। बाढ़ के समय जब जीविका के साधन सीमित हो जाते थे, तब इन आयोजनों के अंत में आशीर्वाद या भेंट के रूप में मिलने वाली महज 100 रुपये की छोटी सी राशि भी उनके और उनके परिवार के लिए बहुत बड़ा संबल साबित होती थी। इस शुरुआती तंगी और निरंतर संघर्ष ने उनके इरादों को और मजबूत किया।
20 से अधिक गांवों में मांग और कार्यक्रमों का विस्तार
समय के साथ अमितेश की आवाज की मिठास और लोक शैली की सादगी लोगों के दिलों को छूने लगी। शुरुआती संघर्ष के दिनों से बाहर निकलकर उनकी पहचान एक परिपक्व लोक गायक के रूप में बनने लगी। धीरे-धीरे उन्हें शुभ अवसरों पर आमंत्रित किया जाने लगा। अब केवल रामधुनी तक सीमित न रहकर शादी-विवाह, मुंडन, जनेऊ, श्राद्ध कर्म और विभिन्न अन्य पारंपरिक संस्कार संबंधी कार्यक्रमों में भी उनकी गायकी की भारी मांग होने लगी।
आज स्थिति यह है कि बेगूसराय के मटिहानी प्रखंड और उसके आसपास के करीब 20 से अधिक गांवों में अमितेश कुमार दीपू के लोक गायकी के कार्यक्रमों का आयोजन नियमित रूप से होता है। हर मंगल कार्य में लोग उनकी उपस्थिति को बेहद शुभ और आनंददायक मानते हैं, जिससे उनकी कला का प्रसार लगातार नए इलाकों में हो रहा है।
कमाई का सशक्त जरिया और वित्तीय आत्मनिर्भरता
अमितेश की गायकी की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही उनके आर्थिक जीवन में भी व्यापक परिवर्तन आया है। अब आयोजकों को उनके कार्यक्रमों के लिए काफी समय पहले से ही एडवांस बुकिंग करानी पड़ती है। वर्तमान समय में वह एक एकल कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए लगभग 25 हजार से 30 हजार रुपये तक का शुल्क लेते हैं। इसके अलावा, मंच पर प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं और आयोजकों से मिलने वाले पुरस्कारों से भी उनकी अतिरिक्त आय हो जाती है।
एक कार्यक्रम के आयोजन में होने वाले सभी आवश्यक खर्चों को घटाने के बाद भी अमितेश आसानी से 10 हजार से 15 हजार रुपये तक की बचत कर लेते हैं। महीने में कार्यक्रमों की कुल संख्या के आधार पर उनकी कुल मासिक आय 50 हजार रुपये से भी अधिक तक पहुंच जाती है। जो सफर 100 रुपये के आशीर्वाद से शुरू हुआ था, वह आज एक समृद्ध और आत्मनिर्भर व्यावसायिक करियर में बदल चुका है।
युवा पीढ़ी के लिए संदेश और 33 वर्षों का अनुभव
संगीत के क्षेत्र में 33 साल से भी अधिक का लंबा समय बिता चुके अमितेश कुमार दीपू का मानना है कि पारंपरिक लोक कला और संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं। यदि इसमें पूरी निष्ठा, निरंतर अभ्यास और पेशेवर दृष्टिकोण जोड़ा जाए, तो यह ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार और सम्मानजनक आजीविका का एक बड़ा माध्यम बन सकता है।
अपने तीन दशकों से लंबे इस सफर को याद करते हुए वह बताते हैं कि उनके लिए सबसे बड़े गर्व और खुशी की बात यह है कि कभी जिस कला को मुफ्त में प्रस्तुत करना पड़ता था, आज उसी कला का आनंद लेने के लिए लोग महीनों पहले से बुकिंग करते हैं। गांव की गलियों की रामधुनी से शुरू होकर सफलता के इस मुकाम तक पहुंचने की उनकी यह कहानी हर उस युवा के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो सीमित साधनों के बावजूद अपने सपनों को साकार करना चाहता है।



















