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मुरादाबाद में अकेले दम पर तालाब लीज पर लेकर मछली पालन कर रहीं प्रियंका, हर महीने कमा रहीं मुनाफासक्सेस स्टोरी
21 अक्तू॰ 2026, 10:33 am (8 दिन पहले)· 2

मुरादाबाद में अकेले दम पर तालाब लीज पर लेकर मछली पालन कर रहीं प्रियंका, हर महीने कमा रहीं मुनाफा

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में प्रियंका ने समूह की महिलाओं के हटने के बाद भी हार नहीं मानी और तीन तालाब पट्टे पर लेकर पांच से छह प्रजातियों की मछलियों का सफल पालन शुरू किया।

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में स्वरोजगार के जरिए अपनी पहचान बनाने की दिशा में महिलाएं तेजी से आगे कदम बढ़ा रही हैं। मुरादाबाद जिले में रहने वाली प्रियंका ने पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर जलीय कृषि यानी मछली पालन को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाया है। पिछले दो वर्षों से वह इस क्षेत्र में लगातार मेहनत कर रही हैं और अपने परिवार को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही हैं। आज वह गांव में तीन अलग-अलग तालाबों का संचालन कर रही हैं, जिनमें विभिन्न किस्मों की मछलियों का संवर्धन किया जा रहा है।

समूह के टूटने के बाद भी नहीं डिगा हौसला

मछली पालन के इस सफर की शुरुआत प्रियंका ने राधा रानी समूह की अध्यक्ष के तौर पर की थी। उनका विचार था कि स्वयं सहायता समूह की बाकी महिलाओं के साथ मिलकर सामूहिक स्तर पर काम किया जाए। योजना बनाकर काम तो शुरू हुआ, लेकिन समय बीतने के साथ समूह की अन्य महिलाओं ने एक-एक करके उनका साथ छोड़ दिया। इस मोड़ पर पूरा प्रोजेक्ट बंद होने की कगार पर पहुंच सकता था, परंतु प्रियंका ने पीछे हटने के बजाय अकेले ही इस व्यवसाय को संभालने का फैसला किया।

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उन्होंने स्वतंत्र रूप से गांव के जलस्रोतों को व्यवस्थित करने की दिशा में कदम बढ़ाया। इसके लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर पांच वर्ष और दस वर्ष की अवधि के लिए तालाबों को पट्टे पर लिया। कानूनी और प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन तालाबों को मछली पालन योग्य बनाने की थी।

तालाबों की सफाई और शुरुआती पूंजी निवेश

पट्टे पर मिले तालाबों की स्थिति शुरुआत में जलीय खेती के अनुकूल नहीं थी। प्रियंका ने मजदूरों और संसाधनों की मदद से तालाबों से पुरानी जमी हुई गाद, सड़ी हुई मिट्टी और कचरे को बाहर निकलवाया। तली की संपूर्ण सफाई कराने के बाद उनमें शुद्ध पानी भरवाया गया। जल भराव की प्रक्रिया पूरी होने पर उन्होंने बाहर से उन्नत नस्ल के मछलियों के छोटे बच्चे लाकर इन तालाबों में छोड़े।

पूरे उद्यम को खड़ा करने में शुरुआती खर्च काफी अधिक रहा। तालाबों का लीज शुल्क चुकाने, उनकी सफाई कराने, उन्नत बीज खरीदने, चारे और दवाओं की व्यवस्था करने में कुल मिलाकर चार से पांच लाख रुपये की लागत आई। शुरुआत में अनुभव की कमी होने की वजह से उन्हें कुछ नुकसान भी उठाना पड़ा। कड़ाके की ठंड के मौसम में कई मछलियां असमय मर गईं, जिससे उन्हें समझ आया कि मौसम और पानी की गुणवत्ता पर लगातार निगरानी रखना कितना जरूरी है।

पानी की गुणवत्ता और रोग प्रबंधन

मछलियों के स्वास्थ्य और तीव्र विकास के लिए प्रियंका हर दिन समय पर दाना डालने और पानी की स्थिति की जांच करने का काम खुद देखती हैं। गांव के कुछ तालाबों में पानी का संतुलन और गुणवत्ता हमेशा मुफीद नहीं रहती, इसलिए उन्होंने अपनी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए निजी तालाबों का सहारा भी लिया है। जलीय जीवों में बीमारियों की रोकथाम और उपचार के लिए वह स्थानीय बाजारों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे नोएडा से आवश्यक दवाइयां मंगवाती हैं।

तालाब पर ही सीधे बिक्री से निश्चित आमदनी

प्रियंका को अपनी उपज बेचने के लिए किसी थोक मंडी या खुदरा बाजार के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। फसल तैयार होने पर वह स्थानीय मछुआरों को सीधे तालाब पर ही बुला लेती हैं। मछुआरे खुद जाल डालकर मछलियां निकालते हैं और उन्हें ले जाते हैं। तालाब के किनारे से ही यह बिक्री अस्सी से सौ रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर हो जाती है।

इस व्यापारिक मॉडल से मध्यस्थों का दखल खत्म हुआ है और समय की भी बचत होती है। इस पूरे व्यवसाय से वार्षिक आधार पर लाखों रुपये का कारोबार होता है। सभी परिचालन खर्च और लागत निकालने के बाद प्रियंका हर महीने दस हजार से पंद्रह हजार रुपये के आसपास शुद्ध बचत आसानी से कर लेती हैं, जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण सुगमता से चल रहा है।

तालाबों में पाली जा रही मछलियों की किस्में

तालाब के पानी और गहराई के हर स्तर का समुचित उपयोग करने के लिए प्रियंका पांच से छह तरह की मछलियों का मिश्रित पालन कर रही हैं। इनमें मुख्य रूप से रोहू, सिल्वर कार्प और चाइनीज कार्प जैसी प्रजातियां शामिल हैं। विभिन्न प्रजातियां तालाब के अलग-अलग हिस्सों में मिलने वाले भोजन का उपभोग करती हैं, जिससे मछलियों का शारीरिक विकास तेज होता है। प्रियंका का अगला लक्ष्य अपने उत्पादन को और अधिक व्यवस्थित करना है, ताकि आने वाले समय में अपने लाभ को और ऊंचा ले जाया जा सके।

सवाल-जवाब

प्रियंका ने मछली पालन के लिए तालाब कितने समय के पट्टे पर लिए हैं?
उन्होंने मुरादाबाद के गांव में स्थित तालाबों को पांच और दस वर्ष की अवधि के लिए पट्टे पर लिया है।
इस व्यवसाय को शुरू करने में कितनी लागत आई थी?
तालाब की सफाई, पट्टा शुल्क, मछली के बच्चे, चारा और दवाइयों की व्यवस्था करने में कुल चार से पांच लाख रुपये का खर्च आया था।
प्रियंका अपने तालाबों में किन प्रजातियों की मछलियां पालती हैं?
वह रोहू, सिल्वर कार्प, चाइनीज कार्प सहित पांच से छह अलग-अलग प्रजातियों की मछलियों का पालन करती हैं।
मछलियों की बिक्री किस भाव पर और कहां की जाती है?
मछलियां सीधे तालाब पर मछुआरों को अस्सी से सौ रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेची जाती हैं।
इस उद्यम से प्रियंका को हर महीने कितना मुनाफा होता है?
खर्च निकालने के बाद उन्हें हर महीने करीब दस से पंद्रह हजार रुपये की नियमित बचत होती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Divya Reddy@divya-reddy·8 दिन पहले

अकेले इतना बड़ा जोखिम उठाना सच में बहुत हिम्मत का काम है। क्या उन्हें इसके लिए बैंक से कोई लोन मिला था या सारा पैसा खुद ही लगाना पड़ा?

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·8 दिन पहले

दिव्या जी, मुद्रा लोन जैसी सरकारी योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं के लिए ऐसे जोखिम उठाना काफी आसान कर दिया है।

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